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कोरिया/एमसीबी@ UGC की फर्जी यूनिवर्सिटी सूची से खुलासा, एमसीबी-कोरिया में फर्जी डिग्री पर नौकरी का मामला उजागर

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  • फर्जी विश्वविद्यालय की डिग्री से नौकरी, सत्यापन पर उठे गंभीर सवाल
  • फर्जी संस्था से पढ़े शिक्षाकर्मी, फिर भी सेवा में—ब्यों चुप हैं जिम्मेदार?
  • यूजीसी ने 32 संस्थानों को बताया अवैध, फिर भी जारी है डिग्री का उपयोग
  • शिकायत के बावजूद हुआ सत्यापन, अधिकारियों की भूमिका पर संदेह
  • अंकसूची में रजिस्ट्रेशन नंबर नहीं,फिर भी नौकरी जारी
  • अन्य जिलों में कार्रवाई, एमसीबी-कोरिया में अब तक चुप्पी


कोरिया/एमसीबी,02 अप्रैल 2026 (घटती-घटना)।
भारत में उच्च शिक्षा की गुणवत्ता और मानकों को सुनिश्चित करने वाली संस्था university Grants Commission ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण खुलासा करते हुए देशभर के 32 संस्थानों को फर्जी विश्वविद्यालय घोषित किया है। आयोग ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि इन संस्थानों द्वारा प्रदान की गई डिग्रियां किसी भी प्रकार की नौकरी या उच्च शिक्षा के लिए मान्य नहीं हैं, यूजीसी ने यह भी बताया कि इन संस्थानों को न तो केंद्र सरकार और न ही किसी राज्य सरकार से मान्यता प्राप्त है। इसके बावजूद ये संस्थान वर्षों से छात्रों को गुमराह कर डिग्रियां जारी कर रहे थे।
यूजीसी द्वारा फर्जी विश्वविद्यालयों की सूची जारी करना एक महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन इसका प्रभाव तभी दिखेगा जब जमीनी स्तर पर भी सख्ती से नियमों का पालन किया जाए,एमसीबी और कोरिया जिले का यह मामला प्रशासनिक जवाबदेही, शिक्षा की गुणवत्ता और पारदर्शिता से जुड़ा हुआ है, अब देखना यह होगा कि संबंधित विभाग इस पर क्या कार्रवाई करता है और क्या वास्तव में दोषियों को जिम्मेदार ठहराया जाता है या नहीं।
अन्य जिलों में कार्रवाई, एमसीबी-कोरिया में चुप्पी
जानकारी के अनुसार छत्तीसगढ़ के अन्य जिलों में फर्जी डिग्री धारकों के खिलाफ कार्रवाई की गई है, कई मामलों में नियुक्तियां रद्द की गई हैं और जांच भी शुरू की गई है, इसके विपरीत एमसीबी और कोरिया जिले में अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है। इससे यह सवाल उठता है कि क्या यहां प्रशासनिक स्तर पर उदासीनता है या फिर किसी प्रकार का दबाव या संरक्षण।
फर्जी डिग्री के आधार पर नौकरीः नियमों का उल्लंघन
नियमों के अनुसार यदि कोई व्यक्ति फर्जी या अमान्य डिग्री के आधार पर नौकरी करता है, तो यह सेवा नियमों का उल्लंघन है, ऐसे मामलों में नियुक्ति रद्द की जा सकती है और वेतन की वसूली भी की जा सकती है, इसके अलावा संबंधित अधिकारियों पर भी कार्रवाई संभव है, यदि यह साबित हो जाए कि उन्होंने जानबूझकर नियमों की अनदेखी की।
यूजीसी की छात्रों को सख्त चेतावनी
यूजीसी ने छात्रों और अभिभावकों को स्पष्ट सलाह दी है कि किसी भी विश्वविद्यालय या संस्थान में प्रवेश लेने से पहले उसकी मान्यता अवश्य जांच लें, आयोग ने यह भी कहा है कि फर्जी संस्थानों के झांसे में आने से बचें और केवल मान्यता प्राप्त संस्थानों से ही शिक्षा प्राप्त करें।
शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल
यह पूरा मामला केवल एक जिले या राज्य तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश की शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़ा करता है, जब फर्जी संस्थान खुलेआम डिग्रियां बांट रहे हों और प्रशासनिक स्तर पर उन पर कार्रवाई न हो, तो यह स्थिति चिंताजनक हो जाती है।
मान्यता का नियम और कानूनी प्रावधान
यूजीसी के नियमों के अनुसार केवल वही विश्वविद्यालय डिग्री प्रदान कर सकते हैं जो यूजीसी एक्ट 1956 की धारा 2(एफ) और 3 के अंतर्गत मान्यता प्राप्त हों, इसके अलावा किसी भी संस्था को ‘विश्वविद्यालय’ शब्द का उपयोग करने का अधिकार नहीं है, ऐसे में जो संस्थान इन नियमों का उल्लंघन करते हैं, वे पूरी तरह अवैध माने जाते हैं और उनसे प्राप्त डिग्रियां स्वतः ही निरस्त हो जाती हैं।
राज्यवार फर्जी विश्वविद्यालयों की स्थिति
यूजीसी द्वारा जारी सूची के अनुसार देश के कई राज्यों में फर्जी विश्वविद्यालय संचालित हो रहे हैं, इस सूची में सबसे अधिक 12 संस्थान दिल्ली से हैं। इसके अलावा उत्तर प्रदेश में 4 संस्थान चिन्हित किए गए हैं, अन्य राज्यों जैसे आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र, पुडुचेरी, पश्चिम बंगाल, अरुणाचल प्रदेश, हरियाणा, झारखंड और राजस्थान में भी फर्जी संस्थान पाए गए हैं, यह स्थिति दर्शाती है कि देश में उच्च शिक्षा के नाम पर बड़े पैमाने पर अनियमितताएं हो रही हैं।
एमसीबी और कोरिया जिले में सामने आया गंभीर मामला
छत्तीसगढ़ के मनेंद्रगढ़ चिरमिरी-भरतपुर (एमसीबी) और कोरिया जिले में इस मुद्दे से जुड़ा एक गंभीर मामला सामने आया है, खड़गवां विकासखंड में कार्यरत कुछ शिक्षाकर्मी भारतीय शिक्षा परिषद, लखनऊ से प्राप्त डीएड की डिग्री के आधार पर नौकरी कर रहे हैं, यह संस्था यूजीसी द्वारा घोषित फर्जी विश्वविद्यालयों की सूची में शामिल है, इसके बावजूद इस संस्था की डिग्री धारक शिक्षाकर्मी लंबे समय से सेवा में बने हुए हैं।
शिकायत के बावजूद हुआ डिग्री का सत्यापन
जानकारी के अनुसार इस मामले में 5 मई 2025 को संबंधित अधिकारियों को शिकायत पत्र भेजा गया था, जिसमें इस संस्था की वैधता पर सवाल उठाए गए थे। इसके बावजूद 26 जून 2025 को इस संस्था की अंकसूची का सत्यापन कर दिया गया,यह स्थिति कई गंभीर प्रश्न खड़े करती है,जब संस्था पहले से ही संदिग्ध और बाद में फर्जी घोषित हो चुकी है, तो उसके दस्तावेजों का सत्यापन किस आधार पर किया गया।
अंकसूची में रजिस्ट्रेशन नंबर तक नहीं…
मामले की गंभीरता इस बात से और बढ़ जाती है कि संबंधित डिग्री की अंकसूची में रजिस्ट्रेशन नंबर तक अंकित नहीं है,सामान्यतः किसी भी मान्यता प्राप्त संस्था द्वारा जारी प्रमाणपत्र में पंजीयन संख्या अनिवार्य होती है, जब संस्था को कोई वैध मान्यता नहीं है, तो रजिस्ट्रेशन नंबर का अभाव स्वाभाविक है, ऐसे में बिना रजिस्ट्रेशन नंबर की अंकसूची का सत्यापन होना प्रशासनिक प्रक्रिया पर सवाल खड़ा करता है।
शिक्षा विभाग की भूमिका संदिग्ध
इस पूरे मामले में जिला शिक्षा अधिकारी और विकासखंड शिक्षा अधिकारी की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं,शिकायत मिलने के बाद भी कार्रवाई नहीं करना और उल्टा दस्तावेजों का सत्यापन करना गंभीर लापरवाही या अन्य किसी कारण की ओर संकेत करता है, स्थानीय स्तर पर यह चर्चा है कि संबंधित अधिकारियों ने जानबूझकर इस मामले को नजरअंदाज किया। हालांकि इस संबंध में कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन परिस्थितियां संदेह पैदा करती हैं।
जांच और कार्रवाई की आवश्यकता
वर्तमान स्थिति को देखते हुए यह आवश्यक है कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष और उच्च स्तरीय जांच कराई जाए, इसमें यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि, फर्जी संस्था की डिग्री का सत्यापन किसने और कैसे किया, शिकायत के बावजूद कार्रवाई क्यों नहीं हुई, संबंधित शिक्षाकर्मियों की नियुक्ति किस आधार पर की गई, इसके आधार पर दोषियों पर सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए, ताकि भविष्य में इस प्रकार की घटनाएं न हों।


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