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सूरजपुर/रायपुर@वीआईपी दौरे और प्रशासनिक कार्यक्रमों ने छीनी साप्ताहिक छुट्टी,न प्रतिपूरक अवकाश मिलता,न अतिरिक्त भुगतान-कर्मचारियों में बढ़ता असंतोष

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  • न प्रतिपूरक अवकाश मिलता,न अतिरिक्त भुगतान-कर्मचारियों में बढ़ता असंतोष
  • कागजों में छुट्टी, हकीकत में ड्यूटी…अवकाश दिवस पर भी काम को मजबूर कर्मचारी
  • रविवार भी नहीं आराम…प्रोटोकॉल ड्यूटी ने छीनी सरकारी कर्मचारियों की छुट्टी
  • अवकाश या औपचारिकता? छुट्टी के दिन भी काम में जुटे शासकीय कर्मचारी
  • वीआईपी दौरे पर भारी कर्मचारियों का अवकाश,नहीं मिलता कोई अतिरिक्त लाभ
  • अवकाश दिवस पर बढ़ते प्रशासनिक कार्यक्रम,कर्मचारियों पर बढ़ा दबाव
  • साप्ताहिक छुट्टी बन रही औपचारिकता,प्रोटोकॉल ड्यूटी से जूझ रहे कर्मचारी
  • अवकाश और कार्य के बीच संतुलन बिगड़ा,व्यवस्था पर उठे सवाल
  • सरकारी नौकरी या 24म7 सेवा? अवकाश बना मजाक
  • प्रोटोकॉल के आगे बेबस अवकाशः छुट्टी के दिन भी काम करने को मजबूर कर्मचारी
  • सरकारी कर्मचारियों की छुट्टी पर ‘डाका’,नहीं मिल रहा प्रतिपूरक लाभ
  • अवकाश दिवस और प्रोटोकॉल ड्यूटी : कागजों में छुट्टी, हकीकत में काम का दबाव


-रवि सिंह-
सूरजपुर/रायपुर,02 अप्रैल 2026 (घटती-घटना)।
कागजों में सप्ताह में दो दिन अवकाश और वर्षभर में तय छुट्टियों की व्यवस्था भले ही कर्मचारियों के हित में बनाई गई हो,लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि छत्तीसगढ़ में बड़ी संख्या में शासकीय कर्मचारी ऐसे हैं जिनके लिए अवकाश सिर्फ कैलेंडर तक सीमित रह गया है और छुट्टी के दिन भी उन्हें प्रोटोकॉल ड्यूटी निभानी पड़ रही है। शासकीय कर्मचारियों को सप्ताह में दो दिन का अवकाश देने की व्यवस्था इस सोच के साथ लागू की गई थी कि कर्मचारी अपने शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को संतुलित रख सकें,परिवार को समय दे सकें और बेहतर कार्यक्षमता के साथ शासन के कार्यों को पूरा कर सकें,इसके साथ ही वर्षभर में विभिन्न राष्ट्रीय पर्व,महापुरुषों की जयंती, धार्मिक त्यौहार और अन्य सामान्य अवकाश भी निर्धारित किए गए हैं, कागजों में यह व्यवस्था बेहद संतुलित और कर्मचारी हितैषी दिखाई देती है,लेकिन यदि जमीनी स्तर पर इसकी वास्तविकता को देखा जाए तो स्थिति इससे बिल्कुल उलट नजर आती है,प्रदेश में बड़ी संख्या में ऐसे शासकीय कर्मचारी हैं जिनके लिए अवकाश का मतलब सिर्फ कैलेंडर तक सीमित रह गया है।
सबसे अधिक प्रभावित विभाग
जनसंपर्क विभाग की चुनौती जनसंपर्क विभाग इस पूरे तंत्र का सबसे अधिक प्रभावित हिस्सा बनकर उभरा है, इस विभाग की जिम्मेदारी होती है कि वह सभी विभागों से जानकारी एकत्र कर उसे मीडिया तक पहुंचाए, लेकिन समस्या यह है कि अवकाश के दिन अधिकांश शासकीय कार्यालय बंद रहते हैं, ऐसे में जानकारी जुटाना कठिन हो जाता है,फिर भी जनसंपर्क अधिकारियों से त्वरित जानकारी की अपेक्षा की जाती है, इस विरोधाभासी स्थिति में जनसंपर्क अधिकारी लगातार दबाव में रहते हैं।
कलेक्ट्रेट और मैदानी अमले की स्थिति
कलेक्ट्रेट कार्यालय और मैदानी अमले के कर्मचारियों को भी भारी दबाव का सामना करना पड़ता है,वीआईपी दौरे के दौरान व्यवस्थाओं की निगरानी,अधिकारियों के निर्देशों का पालन, स्थल निरीक्षण जैसे कार्य अवकाश दिवस पर भी करने पड़ते हैं, इन कर्मचारियों के लिए सप्ताहांत का कोई निश्चित अर्थ नहीं रह गया है।
क्या मिलता है अवकाश दिवस पर कार्य का लाभ?- यह सबसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील प्रश्न है कि जब कर्मचारी अवकाश के दिन कार्य करते हैं,तो उन्हें क्या अतिरिक्त लाभ मिलता है? सैद्धांतिक रूप से कर्मचारियों को निम्न लाभ मिलना चाहिए प्रतिपूरक अवकाश,अतिरिक्त भत्ता या ओवरटाइम लेकिन व्यवहारिक स्तर पर स्थिति अलग है,कई कर्मचारियों का कहना है कि उन्हें कोई स्पष्ट आदेश नहीं दिया जाता, प्रतिपूरक अवकाश अक्सर नहीं मिल पाता, अतिरिक्त भुगतान की व्यवस्था लगभग नगण्य है,इस प्रकार कर्मचारी बिना किसी अतिरिक्त लाभ के अवकाश दिवस पर कार्य करने को विवश हो जाते हैं।
राजनीतिक और प्रशासनिक सीमाओं का धुंधलापन
अवकाश दिवस पर आयोजित कई कार्यक्रम ऐसे होते हैं जिनमें प्रशासनिक आवश्यकता से अधिक राजनीतिक महत्व दिखाई देता है, मंत्रियों और जनप्रतिनिधियों के स्वागत, मंच संचालन और भीड़ प्रबंधन जैसे कार्यों में कर्मचारियों की भागीदारी अनिवार्य कर दी जाती है, इससे यह सवाल उठता है कि क्या शासकीय कर्मचारी राजनीतिक आयोजनों का हिस्सा बनने के लिए बाध्य हैं? क्या प्रशासनिक तंत्र का उपयोग इस प्रकार किया जाना उचित है? यह स्थिति प्रशासनिक निष्पक्षता पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा करती है।
स्वास्थ्य और पारिवारिक जीवन पर प्रभाव
लगातार बिना अवकाश काम करने का सीधा प्रभाव कर्मचारियों के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है, मानसिक तनाव बढ़ रहा है, शारीरिक थकान स्थायी रूप ले रही है,पारिवारिक जीवन प्रभावित हो रहा है कई मामलों में कर्मचारियों में उच्च रक्तचाप,हृदय रोग और तनाव संबंधी समस्याएं बढ़ती देखी जा रही हैं,आज स्थिति यह हो गई है कि कई कर्मचारी खुद को शासकीय सेवा में नहीं, बल्कि किसी निजी कॉर्पोरेट संस्थान में कार्यरत महसूस करते हैं, जहां कार्य का दबाव अधिक और व्यक्तिगत समय सीमित होता है।
नीतियों और
क्रियान्वयन के बीच अंतर

सरकार की नीतियों में कर्मचारियों के हितों का स्पष्ट उल्लेख होता है,लेकिन क्रियान्वयन के स्तर पर कई कमियां दिखाई देती हैं, अवकाश दिवस पर कार्यक्रमों की योजना बनाते समय कर्मचारियों के हितों पर विचार नहीं किया जाता,प्रतिपूरक अवकाश की व्यवस्था का पालन सुनिश्चित नहीं होता, जवाबदेही तय नहीं होने से स्थिति जस की तस बनी रहती है, इस अंतर के कारण कर्मचारियों में असंतोष बढ़ रहा है।
अवकाश दिवस पर बढ़ते प्रशासनिक कार्यक्रम
पिछले कुछ वर्षों में यह प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी है कि प्रशासनिक और प्रोटोकॉल से जुड़े कार्यक्रम अवकाश के दिनों में ही आयोजित किए जाते हैं, मुख्यमंत्री, मंत्री या वरिष्ठ अधिकारियों के दौरे अक्सर शनिवार या रविवार को रखे जाते हैं, जिससे कर्मचारियों की साप्ताहिक छुट्टी स्वतः समाप्त हो जाती है, हाल ही में सूरजपुर जिले में मुख्यमंत्री के आगमन के दौरान रविवार को बड़े स्तर पर प्रशासनिक तैयारियां की गईं, इस दौरान कलेक्ट्रेट, जनसंपर्क, राजस्व और अन्य विभागों के कर्मचारियों को पूरे दिन ड्यूटी करनी पड़ी, ऐसे उदाहरण सिर्फ एक जिले तक सीमित नहीं हैं, बल्कि पूरे प्रदेश में लगातार देखने को मिल रहे हैं।
कर्मचारियों की भूमिकाः सेवा या व्यवस्थापन?-
इन आयोजनों में कर्मचारियों की भूमिका केवल प्रशासनिक कार्यों तक सीमित नहीं रहती, उन्हें कार्यक्रम स्थल की तैयारी, मंच व्यवस्था, अतिथियों के स्वागत की व्यवस्था, भीड़ प्रबंधन, मीडिया समन्वय जैसे कार्यों में भी लगाया जाता है, ऐसी स्थिति में कई कर्मचारियों का मानना है कि वे शासकीय सेवा से अधिक ‘इवेंट मैनेजमेंट’ का कार्य कर रहे हैं, यह स्थिति तब और विचित्र हो जाती है जब कार्यक्रमों का स्वरूप पूरी तरह प्रशासनिक न होकर राजनीतिक महत्व का भी होता है।
क्या कहते हैं कर्मचारी?
कई कर्मचारियों का कहना है कि अवकाश उनके लिए ‘नाममात्र’ का रह गया है, छुट्टी के दिन भी उन्हें फोन या आदेश मिल जाते हैं, परिवार के साथ समय बिताने का अवसर नहीं मिल पाता कुछ कर्मचारियों ने यह भी बताया कि लगातार दबाव के कारण वे मानसिक रूप से थक चुके हैं, लेकिन मजबूरी में कार्य करना पड़ता है।
अवकाश का अधिकार या औपचारिकता?
शासकीय कर्मचारी शासन व्यवस्था की रीढ़ होते हैं,यदि उन्हें ही उनके मूल अधिकार—अवकाश—से वंचित किया जाएगा, तो इसका प्रभाव सीधे शासन की कार्यक्षमता पर पड़ेगा, आज आवश्यकता इस बात की है कि अवकाश को केवल औपचारिकता न मानकर उसे वास्तविक रूप से लागू किया जाए, कर्मचारियों को यह महसूस होना चाहिए कि उनकी मेहनत और उनके अधिकारों का सम्मान किया जा रहा है, अन्यथा ‘अवकाश’ केवल कागजों तक सीमित शब्द बनकर रह जाएगा और कर्मचारी लगातार बढ़ते दबाव के बीच अपने स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता से समझौता करने को मजबूर होते रहेंगे।

समाधान की दिशा में आवश्यक कदम स्थिति को सुधारने के लिए कुछ ठोस कदम उठाए जा सकते हैं…

  1. अवकाश दिवस पर कार्यक्रमों की सीमा तय हो
    अत्यंत आवश्यक परिस्थितियों को छोड़कर अवकाश के दिन कार्यक्रम आयोजित न किए जाएं।
  2. प्रतिपूरक अवकाश अनिवार्य किया जाए
    यदि कर्मचारी अवकाश दिवस पर कार्य करता है, तो उसे निश्चित रूप से बदले में अवकाश दिया जाए।
  3. अतिरिक्त भुगतान की व्यवस्था*
    अवकाश के दिन कार्य के लिए स्पष्ट ओवरटाइम या विशेष भत्ता निर्धारित किया जाए।
  4. कार्य का रोटेशन सिस्टम
    सभी कर्मचारियों पर समान रूप से भार बांटा जाए, ताकि कुछ ही लोग लगातार प्रभावित न हों।
  5. जवाबदेही तय की जाए यदि नियमों का उल्लंघन होता है, तो संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय हो।


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