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कोरिया@ कोरिया मॉडल पर सवाल, जल योजना या नया नाम? 5% मॉडल,100% बहस

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  • मन की बात” में कोरिया मॉडल:जल संरक्षण की सफलता या अधूरी तस्वीर?
  • मोर गांव,मोर पानी बना आवा पानी झोंकी:समान उद्देश्य, अलग दावे, कई सवाल
  • कोरिया का 5% जल मॉडल चर्चा में: जमीनी हकीकत और दावों के बीच अंतर
  • जल संरक्षण की दो योजनाएं,एक बहस:क्या नया है कोरिया मॉडल में?
  • मन की बात” में सराहना,जमीन पर सवाल,कोरिया जल मॉडल की पड़ताल
  • दावों का मॉडल या हकीकत का संकट? कोरिया जल अभियान पर उठे सवाल
  • नाम बदला, काम वही?‘मोर पानी’ से ‘5% मॉडल’ तक का सफर सवालों में
  • जल संरक्षण या प्रेजेंटेशन?‘5% मॉडल’ पर उठे कई प्रतिशत सवाल
  • कोरिया जल मॉडल पर मंथन:सफलता का दावा या आंकड़ों का खेल?
  • राज्य की योजना, जिले का मॉडल:जल संरक्षण पर नई बहस


-रवि सिंह-
कोरिया ,31 मार्च 2026(घटती-घटना)।
छत्तीसगढ़ में जल संरक्षण को लेकर पिछले कुछ वर्षों में कई स्तरों पर पहलें शुरू हुई हैं, वर्ष 2022 में राज्य सरकार द्वारा शुरू किया गया मोर गांव,मोर पानी अभियान और वर्ष 2025 में कोरिया जिले में प्रारंभ हुई आवा पानी झोंकी योजना,जिसे बाद में 5 प्रतिशत जल संरक्षण मॉडल के रूप में प्रचारित किया गया, अब एक साथ चर्चा के केंद्र में हैं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मन की बात कार्यक्रम में कोरिया मॉडल का उल्लेख होने के बाद यह बहस और तेज हो गई है कि क्या यह वास्तव में एक नया और प्रभावी मॉडल है या पहले से चल रही योजना का ही परिवर्तित रूप है? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मन की बात कार्यक्रम में कोरिया जिले के 5 प्रतिशत जल संरक्षण मॉडल को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किए जाने के बाद अब इस मॉडल की जमीनी सच्चाई को लेकर सवाल उठने लगे हैं,स्थानीय स्तर पर चर्चा इस बात को लेकर है कि कार्यक्रम में दिखाए गए दृश्य और वास्तविक स्थिति में काफी अंतर दिखाई दे रहा है। बताया जा रहा है कि जिले में 5 प्रतिशत मॉडल के तहत कई ग्राम पंचायतों के किसानों के खेतों में बनाए गए गड्ढों का कार्य हाल ही में,लगभग 20 से 25 दिनों के भीतर कराया गया है,ऐसे में वर्तमान समय में, जब ग्रीष्म ऋ तु की शुरुआत हो चुकी है और हाल के दिनों में वर्षा नहीं हुई है, तो इन गड्ढों में पानी भरा हुआ दिखाना सवालों के घेरे में आ गया है,स्थानीय लोगों का कहना है कि जब जिले के बड़े तालाब, नदी और जल स्रोत सूखने की स्थिति में हैं,तब छोटे आकार के गड्ढों में जल भराव का दृश्य वास्तविकता से मेल नहीं खाता, इसी आधार पर यह सवाल उठ रहा है कि क्या प्रस्तुत किए गए वीडियो और चित्र हालिया हैं या पुराने है?
मन की बात में उल्लेख और राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने कार्यक्रम मन की बात के 132 वें एपिसोड में कोरिया जिले के इस मॉडल का उल्लेख करते हुए इसे जनभागीदारी आधारित जल संरक्षण का उदाहरण बताया, उन्होंने कहा कि जिले के किसान अपने खेतों के एक हिस्से में सोखता गड्ढे बनाकर भूजल स्तर सुधारने का प्रयास कर रहे हैं,इस उल्लेख के बाद यह योजना राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आ गई और इसे एक सफल प्रयोग के रूप में प्रस्तुत किया गया, लेकिन इसी के साथ स्थानीय स्तर पर सवाल भी उठने लगे कि क्या यह मॉडल वास्तव में उतना प्रभावी और व्यापक है, जितना प्रस्तुत किया जा रहा है।

आंकड़ों और दावों पर उठते प्रश्न
प्रशासन की ओर से इस योजना के तहत बड़ी संख्या में किसानों की भागीदारी और जल स्रोतों में वृद्धि जैसे दावे किए गए हैं, हालांकि, इन आंकड़ों के आधार और वैज्ञानिक प्रमाणों को लेकर स्पष्टता नहीं है, विशेषज्ञों का मानना है कि भूजल स्तर में किसी भी प्रकार की वृद्धि का आकलन करने के लिए लंबी अवधि की निगरानी आवश्यक होती है, एक वर्ष से कम समय में जल स्तर में वृद्धि का दावा करना सटीक निष्कर्ष नहीं माना जा सकता, इसके अलावा, गड्ढों के निर्माण की संख्या और उनके वास्तविक प्रभाव का कोई विस्तृत सार्वजनिक डेटा उपलब्ध नहीं होने से भी स्थिति स्पष्ट नहीं हो पाई है।
जमीनी स्थितिः दावे और वास्तविक अनुभव
योजना को लेकर जमीनी स्तर पर मिश्रित प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं, कुछ लोग इसे सकारात्मक पहल मानते हैं और भविष्य में इसके लाभ की संभावना देखते हैं, वहीं कई किसानों और ग्रामीणों ने इसके क्रियान्वयन को लेकर सवाल उठाए हैं, स्थानीय स्तर पर यह भी कहा जा रहा है कि गड्ढों का निर्माण हर जगह पूरी तरह स्वैच्छिक नहीं था और कुछ मामलों में प्रशासनिक दबाव की बात भी सामने आई है,कुछ किसानों का कहना है कि उन्हें अपने खर्च पर गड्ढे खुदवाने पड़े,जबकि योजना को जनभागीदारी आधारित बताया गया है, इसके अलावा यह भी सवाल उठ रहा है कि खेतों में बनाए गए बड़े गड्ढों से नमी कितने समय तक बनी रहेगी और क्या यह वास्तव में कृषि उत्पादकता बढ़ाने में मदद करेगा।
भूजल संरक्षण के लिए दीर्घकालीन उपायों की आवश्यकता
जल संरक्षण को लेकर प्रधानमंत्री द्वारा मन की बात में रूफ वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम को एक प्रभावी उपाय बताया गया है,इस संदर्भ में स्थानीय स्तर पर यह राय सामने आ रही है कि यदि वास्तव में भूजल स्तर को बढ़ाना है, तो पारंपरिक और वैज्ञानिक दोनों उपायों को प्राथमिकता देनी होगी, कोरिया जिले में पहले बड़ी संख्या में तालाब और कुएं मौजूद थे, जो वर्षा जल को संग्रहित कर धीरे-धीरे भूजल स्तर को बढ़ाने में सहायक होते थे, लेकिन समय के साथ इनका संरक्षण नहीं हो सका,कई स्थानों पर तालाबों को पाट दिया गया,वहीं कई कुएं उपयोग के अभाव में समाप्त हो गए,ऐसे में यह मांग उठ रही है कि जो जल स्रोत अभी भी बचे हुए हैं,उनका संरक्षण और पुनर्जीवन प्राथमिकता के आधार पर किया जाए,साथ ही,शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में रूफ वाटर हार्वेस्टिंग को अनिवार्य रूप से लागू करने की दिशा में ठोस नीति बनाई जाए।
कोरिया में आवा पानी झोंकीः स्थानीय पहल या नया मॉडल?

इसी दौरान मार्च 2025 में कोरिया जिले में कलेक्टर संजय चंदन त्रिपाठी के नेतृत्व में आवा पानी झोंकी नामक एक नई पहल शुरू की गई,इस योजना का मुख्य उद्देश्य खेतों में ही वर्षा जल को रोककर भूजल स्तर को बढ़ाना और कृषि उत्पादकता में सुधार करना बताया गया, इस मॉडल के तहत किसानों को अपने खेत के लगभग 5 प्रतिशत हिस्से में गड्ढे बनाने के लिए प्रेरित किया गया,ताकि वर्षा जल खेत में ही ठहर सके और धीरे-धीरे जमीन में समाहित हो सके, बाद में इस पहल को 5 प्रतिशत जल संरक्षण मॉडल के नाम से प्रचारित किया गया, जिससे इसे एक विशिष्ट और अलग पहचान दी जा सके, योजना में पारंपरिक जल स्रोतों जैसे कुओं और छोटे तालाबों के पुनर्जीवन की बात भी शामिल की गई, साथ ही महिलाओं की भागीदारी को भी महत्वपूर्ण बताया गया, क्योंकि ग्रामीण जल प्रबंधन में उनकी भूमिका प्रमुख होती है।
मोर गांव,मोर पानी : राज्य स्तरीय अभियान की शुरुआत और विस्तार
छत्तीसगढ़ में जल संकट और भूजल स्तर में गिरावट को देखते हुए 22 मार्च 2022, विश्व जल दिवस के अवसर पर मोर गांव, मोर पानी अभियान की शुरुआत की गई थी, यह अभियान यूनिसेफ के सहयोग से जल जीवन मिशन के तहत संचालित किया गया और इसे राज्य के सभी जिलों में लागू किया गया, इस अभियान का उद्देश्य वर्षा जल के संरक्षण,उपयोग किए गए पानी के प्रबंधन और भूजल स्तर में सुधार के माध्यम से दीर्घकालीन जल सुरक्षा सुनिश्चित करना था,इसके तहत ग्रामीणों की भागीदारी से घरों,स्कूल व कार्यालय हेंडपंप के सामने सोख्ता गड्ढे बनाए गए,सोशल के माध्यम से जल साक्षरता बढ़ाई गई और पारंपरिक जल संरक्षण तकनीकों जैसे बोरी बंधान को प्रोत्साहित किया गया, वर्ष 2025 में इस अभियान को और गति देने के लिए तकनीकी हस्तक्षेप भी जोड़े गए, जीआईएस तकनीक और जलदूत ऐप के माध्यम से जल स्तर की निगरानी शुरू की गई,जिससे यह अभियान केवल जागरूकता तक सीमित न रहकर डेटा आधारित निगरानी की दिशा में आगे बढ़ा।
वर्षा और समय-सीमा का प्रभाव
जल संरक्षण से जुड़ी किसी भी योजना की सफलता काफी हद तक वर्षा पर निर्भर करती है,स्थानीय स्तर पर यह जानकारी सामने आई है कि कई स्थानों पर गड्ढों का निर्माण वर्षा ऋतु के बाद किया गया, जिससे तत्काल प्रभाव का आकलन करना संभव नहीं हो सका,यदि पर्याप्त वर्षा नहीं होती,तो गड्ढों में जल संचयन नहीं होगा और भूजल स्तर पर इसका प्रभाव भी सीमित रहेगा। इस कारण योजना के वास्तविक परिणाम सामने आने में समय लगना स्वाभाविक है।
पारंपरिक जल स्रोत बनाम नया मॉडल
योजना में पारंपरिक जल स्रोतों के पुनर्जीवन की बात जरूर कही गई है, लेकिन जमीनी स्तर पर इसका प्रभाव सीमित दिखाई देता है। आज के समय में कुओं का उपयोग कम हो रहा है और तालाबों का निर्माण भी सीमित स्तर पर हो रहा है, इसके विपरीत, खेतों में गड्ढे बनाने की गतिविधि अधिक दिखाई दी है, जिससे यह सवाल उठता है कि क्या पारंपरिक जल स्रोतों के संरक्षण पर पर्याप्त ध्यान दिया गया है।
पहल और प्रस्तुति के बीच संतुलन जरूरी
कोरिया जिले में जल संरक्षण को लेकर किए जा रहे प्रयास निश्चित रूप से महत्वपूर्ण हैं और इनका उद्देश्य भी दीर्घकालीन जल सुरक्षा से जुड़ा है, लेकिन वर्तमान स्थिति यह संकेत देती है कि जमीनी क्रियान्वयन,आंकड़ों की पारदर्शिता और वास्तविक प्रभाव इन सभी पहलुओं पर स्पष्टता आवश्यक है,यदि जल संरक्षण के प्रयासों को वास्तव में प्रभावी बनाना है, तो पारंपरिक जल स्रोतों का संरक्षण, रूफ वाटर हार्वेस्टिंग की अनिवार्यता और भूजल दोहन पर नियंत्रण जैसे उपायों को प्राथमिकता देनी होगी।
उपलब्धि, प्रयोग या अधूरी कहानी?
छत्तीसगढ़ में जल संरक्षण को लेकर किए जा रहे प्रयास निश्चित रूप से महत्वपूर्ण हैं और मोर गांव,मोर पानी तथा आवा पानी झोंकी जैसी पहलें इस दिशा में सकारात्मक कदम मानी जा सकती हैं, लेकिन कोरिया जिले के मॉडल को लेकर जो सवाल उठ रहे हैं, वे यह संकेत देते हैं कि किसी भी योजना की सफलता केवल प्रस्तुतीकरण से नहीं,बल्कि जमीनी प्रभाव और पारदर्शिता से तय होती है, यदि यह मॉडल वास्तव में प्रभावी है,तो इसके परिणाम समय के साथ स्पष्ट रूप से सामने आएंगे और यह अन्य क्षेत्रों के लिए भी उदाहरण बन सकता है, लेकिन यदि इसमें कमियां हैं, तो उन्हें स्वीकार कर सुधार करना भी उतना ही आवश्यक है।
समानता और अंतरः दो योजनाओं के बीच तुलना
मोर गांव, मोर पानी और आवा पानी झोंकी दोनों योजनाओं का मूल उद्देश्य जल संरक्षण है, लेकिन इनके क्रियान्वयन के स्तर और दृष्टिकोण में अंतर दिखाई देता है, राज्य स्तरीय अभियान मोर गांव, मोर पानी जहां व्यापक जनजागरूकता और सामुदायिक भागीदारी पर आधारित है, वहीं आवा पानी झोंकी खेत आधारित मॉडल के रूप में सामने आती है, जिसमें कृषि और जल संरक्षण को जोड़ने का प्रयास किया गया है, फिर भी, दोनों योजनाओं में सोख्ता गड्ढों के निर्माण और वर्षा जल को जमीन में समाहित करने की अवधारणा समान है, जिससे यह सवाल उठता है कि क्या यह वास्तव में नई योजना है या पहले से चल रही पहल का ही स्थानीय रूपांतरण।
डिस्क्लेमर
यह समाचार उपलब्ध आधिकारिक जानकारी, स्थानीय स्रोतों, क्षेत्रीय चर्चाओं एवं विभिन्न पक्षों से प्राप्त इनपुट के आधार पर तैयार किया गया है, इसमें शामिल कुछ बिंदु स्थानीय अनुभवों और दावों पर आधारित हैं, जिनकी स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि सभी स्तरों पर नहीं हुई है, समाचार का उद्देश्य विषय के सभी पहलुओं को संतुलित और तथ्यात्मक रूप में प्रस्तुत करना है, संबंधित विभाग या प्रशासन की आधिकारिक प्रतिक्रिया प्राप्त होने पर जानकारी को अद्यतन किया जाएगा।


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