
- रिकॉर्ड कुछ और, हकीकत कुछ और सिस्टम पूरी तरह मौन!
- शिवप्रसादनगर धान में घोटाला कार्रवाई रुकी या रुकवाई गई? सत्ता पर सवाल
- जब घोटाला बड़ा हो और कार्रवाई छोटी समझिए मामला ‘ऊपर’ तक है
- घोटालेबाज सुरक्षित, सिस्टम निष्क्रिय किसकी छाया में चल रहा धान खेल?
- सिस्टम फेल या सत्ता का खेल? सूरजपुर धान घोटाले में जिम्मेदारी क्यों गायब
- करोड़ों का घोटाला और राजनीतिक सन्नाटा: क्या संरक्षण ही सबसे बड़ा सच?
- घोटाला खुला, सच सामनेज् फिर भी बच गए खिलाड़ी! सूरजपुर में किसका संरक्षण?
- सूरजपुर धान घोटाला: दो महीने के खुलासों के बाद भी जिम्मेदार गायब, सिस्टम की चुप्पी पर खड़े होते बड़े सवाल
- 65 हजार मि्ंटल से 11 करोड़ तक का खेल, जांच में विरोधाभास, निलंबन के बाद भी उलझी कार्रवाईज्आखिर किसके संरक्षण में थमी जवाबदेही?
- तीन विभागों की तीन रिपोर्ट, एआई कैमरे की गवाही भी बेअसरज्कार्रवाई क्यों थमी और किसने ओढ़ा दी ‘संरक्षण की छतरी’?
-ओंकार पाण्डेय-
सूरजपुर,29 मार्च 2026(घटती-घटना)। शिवप्रसादनगर धान खरीदी केंद्र एक बार फिर सवालों के घेरे में है,जिले के सबसे चर्चित खरीदी केंद्रों में शामिल यह केंद्र अब पारदर्शिता के लिए नहीं,बल्कि कथित घोटालों और प्रशासनिक सन्नाटे के लिए जाना जा रहा है,आरोप है कि यहां वर्षों से धान माफिया का एक संगठित सिंडिकेट सक्रिय है,जिसकी जानकारी प्रशासन से लेकर स्थानीय तंत्र तक सभी को है, लेकिन कार्रवाई हर बार अधूरी रह जाती है।
बता दे की सूरजपुर जिले का धान खरीदी घोटाला अब केवल एक प्रशासनिक अनियमितता का मामला नहीं रहा, बल्कि यह पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली,राजनीतिक इच्छाशक्ति और जवाबदेही पर खड़ा एक बड़ा सवाल बन चुका है,जनवरी से फरवरी 2026 तक दो महीनों के दौरान लगातार सामने आए खुलासों ने यह स्पष्ट कर दिया कि मामला सीमित स्तर का नहीं, बल्कि गहराई तक फैले एक संगठित तंत्र का हिस्सा हो सकता है,इन दो महीनों में जो तथ्य सामने आए,वे चौंकाने वाले हैं, कागजों में दर्ज हजारों मि्ंटल धान,वास्तविक स्टॉक में अंतर,करोड़ों रुपये के संभावित नुकसान,जांच में विरोधाभास,और सबसे महत्वपूर्ण इतने सबके बावजूद जिम्मेदारी तय न होना, यह पूरा घटनाक्रम अब एक ऐसे प्रश्न में बदल चुका है,जिसका जवाब केवल प्रशासनिक प्रक्रिया से नहीं,बल्कि सिस्टम की नीयत से जुड़ा हुआ है।
बड़ा सवाल : सिस्टम चला कौन रहा है?
क्या प्रशासन खुद निर्णय ले रहा है या किसी बाहरी प्रभाव में काम कर रहा है…
यदि गड़बड़ी साबित हुई थी, तो दोषियों पर कार्रवाई क्यों नहीं? और यदि सब सही था, तो निलंबन क्यों हुआ…
जनवरी की शुरुआत : संदेह से घोटाले तक
दैनिक घटती-घटना ने 7 जनवरी 2026 को प्रकाशित पहली रिपोर्ट ने पूरे मामले की नींव रखी, शिवप्रसादनगर धान खरीदी केंद्र में कागजों में लगभग 65 हजार मि्ंटल धान दर्ज होने की बात सामने आई, लेकिन जमीनी स्थिति को लेकर गंभीर सवाल उठे,यह वह क्षण था जब पहली बार यह संदेह पैदा हुआ कि धान खरीदी व्यवस्था में कुछ बड़ा गड़बड़झाला हो सकता है,तीन दिन बाद,10 जनवरी को आई रिपोर्ट ने इस संदेह को और मजबूत कर दिया,इसमें एक तिकड़ी की भूमिका का उल्लेख किया गया,जिसने पूरे सिस्टम में संभावित मिलीभगत की ओर इशारा किया,यह अब व्यक्तिगत स्तर की गलती नहीं,बल्कि एक संगठित नेटवर्क का संकेत था,12 जनवरी को प्रकाशित रिपोर्ट ने इस मामले को निर्णायक मोड़ दिया,जब यह सवाल उठाया गया कि हजारों बोरी धान की कमी सामने आने के बावजूद प्रशासनिक चुप्पी क्यों है। यहीं से यह मामला केवल अनियमितता नहीं,बल्कि जवाबदेही का मुद्दा बन गया।
करोड़ों का खेल सामने,लेकिन कार्रवाई सीमित
दैनिक घटती-घटना 15 जनवरी 2026 को प्रकाशित रिपोर्ट में पहली बार बड़े आर्थिक आंकड़े सामने आए, 52,908 बोरियों के अंतर और लगभग 6.56 करोड़ रुपये के संभावित नुकसान की बात सामने आई, इस खुलासे ने पूरे मामले को स्थानीय स्तर से उठाकर एक बड़े आर्थिक घोटाले में बदल दिया,इसके बाद 17 जनवरी को यह सवाल उठाया गया कि जब जांच में गड़बड़ी सामने आ चुकी है,तो जिम्मेदार लोग अब भी अपने पदों पर क्यों बने हुए हैं,यह वह बिंदु था जहां प्रशासनिक जवाबदेही सीधे कटघरे में खड़ी हो गई, 18 जनवरी को प्रशासन की ओर से नोटिस जारी किए गए और जांच तेज करने की बात कही गई,लेकिन यह कार्रवाई सतही प्रतीत हुई,लोगों के बीच यह धारणा बनी रही कि यह केवल दबाव कम करने का प्रयास है,न कि वास्तविक कार्रवाई।
जनवरी का अंत : घोटाले का विस्तार
दैनिक घटती घटना 23 जनवरी 2026 को प्रकाशित रिपोर्ट में यह दावा किया गया कि धान खरीदी से जुड़ा घोटाला 11 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है, यह आंकड़ा सामने आते ही मामला पूरी तरह से एक बड़े वित्तीय घोटाले के रूप में स्थापित हो गया, 25 जनवरी को इस मामले में एक नया आयाम जुड़ा,जब संबंधित व्यक्तियों के नाम पर 7.7 एकड़ जमीन का उल्लेख सामने आया। इससे यह संकेत मिला कि मामला केवल धान खरीदी तक सीमित नहीं है,बल्कि संभावित रूप से आर्थिक नेटवर्क से भी जुड़ा हो सकता है,28 जनवरी की रिपोर्ट ने पूरे मामले को और उलझा दिया,इसमें सवाल उठाया गया कि 13 हजार बोरियां पहले गायब कैसे हुईं और फिर अचानक पूरी कैसे हो गईं। यह विरोधाभास जांच प्रक्रिया पर ही सवाल खड़ा करने लगा।
फरवरी : जांच पर सवाल और गहराते संदेह
फरवरी 2026 में भी यह मामला लगातार सुर्खियों में बना रहा,2 फरवरी को प्रकाशित रिपोर्ट में यह सवाल उठाया गया कि क्या वास्तव में धान खरीदी हो रही थी या घोटाले की योजना लागू की जा रही थी,6 फरवरी की रिपोर्ट में जांच प्रक्रिया की धीमी गति पर व्यंग्य करते हुए इसे मगरमच्छ वाला घोटाला, कछुए वाली जांच बताया गया। यह टिप्पणी केवल व्यंग्य नहीं,बल्कि जांच की वास्तविक स्थिति को दर्शाने वाली थी,7 फरवरी को प्रकाशित रिपोर्ट ने प्रशासनिक व्यवस्था पर तीखा प्रहार किया,जिसमें यह संकेत दिया गया कि यदि स्थिति यही रही तो नुकसान भले ही सार्वजनिक हो,लेकिन जिम्मेदार लोग सुरक्षित रहेंगे,9 फरवरी को यह तथ्य सामने आया कि घोटाले, जांच और संभावित एफआईआर की चर्चा तो हो रही है,लेकिन जिम्मेदारी तय नहीं हो रही, 10 फरवरी की रिपोर्ट में तकनीकी पहलुओं पर सवाल उठाए गए—डिजिटल रिकॉर्ड, एआई कैमरा और वास्तविक स्टॉक के बीच अंतर क्यों है? यदि तकनीक मौजूद है,तो पारदर्शिता क्यों नहीं दिख रही?
चौथा स्तंभ चिल्लाया,सिस्टम ने चुप्पी साधी
लोकतंत्र में मीडिया को चौथा स्तंभ कहा जाता है, लेकिन जब चौथा स्तंभ लगातार दो महीने तक चीख-चीख कर सच सामने लाता रहा और व्यवस्था कान में रूई डालकर बैठी रहे,मीडिया ने लगातार इस मुद्दे को उठाया और विभिन्न पहलुओं को सामने रखा,यह पत्रकारिता की जिम्मेदारी का उदाहरण है,जहां व्यवस्था से सवाल पूछे जाते हैं, लेकिन इसके समानांतर यह भी देखा गया कि सिस्टम की प्रतिक्रिया अपेक्षित स्तर पर नहीं रही, जांच हुई,लेकिन निष्कर्ष स्पष्ट नहीं हुए,कार्रवाई शुरू हुई,लेकिन पूरी नहीं हुई,तो सवाल सिर्फ घोटाले का नहीं बल्कि पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली का हो जाता है,जनवरी से फरवरी 2026 तक लगातार प्रकाशित खबरों ने सूरजपुर जिला के धान खरीदी केंद्रों की परतें एक-एक कर खोल दीं,आंकड़े सामने आए,गड़बडि़यां उजागर हुईं,तकनीकी सिस्टम पर सवाल उठे, जांच हुई,नोटिस जारी हुए—लेकिन दो महीने बाद भी अगर कुछ तय नहीं हुआ,तो वह है जिम्मेदारी।
पुराना और नया अपडेटः विरोधाभासों का जाल
नए अपडेट में सामने आया कि जांच के दौरान भारी मात्रा में धान की कमी पाई गई थी,जिसके आधार पर धान खरीदी केंद्र प्रभारी को निलंबित किया गया,यह कार्रवाई इस बात का संकेत थी कि गड़बड़ी वास्तविक थी,लेकिन बाद में हुई दूसरी जांच में सब कुछ सामान्य बताया गया। यही वह बिंदु है जहां पूरा मामला संदिग्ध हो जाता है, यदि कमी थी,तो वह खत्म कैसे हुई? और यदि कमी नहीं थी,तो निलंबन क्यों हुआ? इन दो विरोधाभासी स्थितियों के बीच सच्चाई कहीं खोती नजर आती है।
सबसे बड़ा प्रश्नः जिम्मेदार कौन?
पूरे घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही बना हुआ है,यदि गड़बड़ी हुई है,तो जिम्मेदार कौन है? और यदि जिम्मेदारी तय नहीं हो पा रही,तो क्या यह केवल प्रक्रिया की कमी है या किसी स्तर पर संरक्षण का प्रभाव?
वर्षों से सक्रिय ‘सिंडिकेट’,पर कार्रवाई शून्य
स्थानीय सूत्रों के अनुसार,शिवप्रसादनगर में धान खरीदी प्रक्रिया लंबे समय से निष्पक्षता से दूर रही है, धान माफिया के नाम सार्वजनिक होने के बावजूद प्रशासनिक स्तर पर कोई ठोस और निर्णायक कार्रवाई नहीं की गई,हर साल शिकायतें सामने आती हैं,जांच होती है,लेकिन परिणाम वही—ढाक के तीन पात।
जांच हुई,गड़बड़ी मिली…फिर सब सामान्य कैसे…
इस बार भी मामला सामने आने के बाद राजस्व, खाद्य और सहकारिता विभाग ने जांच की, पहली जांच में भारी मात्रा में धान की कमी पाई गई, जिम्मेदारों पर कार्रवाई करते हुए केंद्र प्रभारी को निलंबित किया गया, लेकिन यहीं से कहानी ने मोड़ लिया, दूसरी जांच में अचानक सब कुछ सामान्य बताया गया, अब बड़ा सवाल यह है की जब कमी पाई गई थी तो निलंबन हुआ, और जब सब ठीक हो गया तो बहाली क्यों नहीं हुई?
तीन विभाग,तीन रिपोर्ट…सच्चाई कौन सी…
मामले की सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि तीनों विभागों की जांच रिपोर्ट एक-दूसरे से मेल नहीं खाती, एक विभाग कार्रवाई के पक्ष में था, दूसरा नरमी दिखा रहा था, जबकि तीसरे की भूमिका पर ‘संरक्षण’ देने के आरोप लग रहे हैं, यह विरोधाभास ही पूरे मामले को संदिग्ध बना रहा है।
एआई कैमरा भी बेअसर !
धान खरीदी केंद्र में लगे एआई कैमरों ने भी गतिविधियों को रिकॉर्ड किया और रिपोर्ट दी, लेकिन हैरानी की बात यह है कि तकनीकी साक्ष्य भी कार्रवाई को आगे नहीं बढ़ा सके, यह सवाल खड़ा करता है जब मशीनें भी गड़बड़ी दिखा रही हैं, तो कार्रवाई क्यों नहीं?
संरक्षण की छतरी का खेल
सूत्र बताते हैं कि जांच के बाद अचानक एक संरक्षण की छतरी सक्रिय हो गई, जिसने पूरे मामले को दबा दिया, यही कारण है कि कार्रवाई शुरू होकर भी अधूरी रह गई,दोषियों तक पहुंचने से पहले ही फाइलें ठंडी पड़ गईं।
ईमानदार अधिकारी भी असहज
मामले में यह भी सामने आया है कि एक उप-पंजीयन अधिकारी ने कथित दबाव के चलते छुट्टी ले ली थी, बताया जा रहा है कि वे निष्पक्ष कार्रवाई के पक्ष में थे,लेकिन ऊपर से विरोधाभासी निर्देश मिलने के कारण खुद को इस विवाद से दूर कर लिया,यह स्थिति प्रशासनिक तंत्र के भीतर के दबाव और असमंजस को उजागर करती है।
तीन विभाग,तीन दृष्टिकोण
राजस्व, खाद्य और सहकारिता विभाग द्वारा की गई जांच में एकरूपता का अभाव भी पूरे मामले को जटिल बनाता है, तीनों विभागों की रिपोर्ट अलग-अलग दिशा में संकेत देते हैं,कहीं गड़बड़ी स्वीकार की गई, कहीं नरमी दिखाई गई और कहीं स्थिति सामान्य बताई गई, यह स्थिति केवल तकनीकी अंतर नहीं,बल्कि निर्णय प्रक्रिया में असंगति को दर्शाती है।
संरक्षण की आशंका और प्रशासनिक दबाव
सूत्रों के अनुसार,जैसे ही कार्रवाई आगे बढ़ने लगी,वैसे ही एक प्रकार का संरक्षण सक्रिय हो गया,इसके बाद जांच की गति धीमी हो गई और निर्णय प्रक्रिया ठहर गई, यह भी सामने आया कि कुछ अधिकारी इस मामले में स्पष्ट कार्रवाई के पक्ष में थे,लेकिन विरोधाभासी निर्देशों और दबाव के चलते असहज स्थिति में आ गए,एक अधिकारी द्वारा अवकाश लेने की घटना भी इसी संदर्भ में देखी जा रही है,यह स्थिति प्रशासनिक तंत्र के भीतर मौजूद दबाव और असंतुलन को उजागर करती है।
तकनीकी सिस्टम भी सवालों में…
धान खरीदी केंद्रों में एआई कैमरा और डिजिटल रिकॉर्ड जैसी व्यवस्थाएं मौजूद हैं,जिनका उद्देश्य पारदर्शिता सुनिश्चित करना है, लेकिन जब इन तकनीकी साधनों के बावजूद रिकॉर्ड और वास्तविक स्थिति में अंतर सामने आता है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि समस्या तकनीक में है या उसके उपयोग में।
सन्नाटा ही सबसे बड़ा सबूत
शिवप्रसादनगर धान खरीदी केंद्र का मामला अब केवल एक केंद्र का मुद्दा नहीं रहा, बल्कि यह पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा कर रहा है,जहां सब कुछ सामने होने के बावजूद कार्रवाई ठहर जाए, वहां सन्नाटा ही सबसे बड़ा संकेत बन जाता है कि कहीं न कहीं संरक्षण का खेल चल रहा है।
जवाबदेही की परीक्षा
सूरजपुर धान खरीदी घोटाला अब केवल एक मामले की जांच नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता की परीक्षा बन चुका है,दो महीनों में सामने आए तथ्यों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि मामला गंभीर है और व्यापक प्रभाव वाला है,अब यह प्रशासन और शासन पर निर्भर है कि वह इन सवालों का जवाब कैसे देता है और क्या वह जिम्मेदारों तक पहुंचकर कार्रवाई सुनिश्चित कर पाता है,क्योंकि लोकतंत्र में सवाल पूछना एक प्रक्रिया है,लेकिन जवाब देना—एक जिम्मेदारी,और फिलहाल,सूरजपुर में यही जिम्मेदारी सबसे ज्यादा सवालों के घेरे में है।
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