
- कलेक्टर एमसीबी से गुहार—सरकार, हमारी मेहनत की कमाई दिला दीजिए
- बीटगार्ड से लेकर डिप्टी रेंजर तक पर आरोप, वन विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल
- जंगल में पसीना बहा, सिस्टम ने मेहनताना रोका—आदिवासी श्रमिक बेहाल
- वन विभाग की फाइलों में भुगतान,
- जमीन पर खाली हाथ मजदूर
- ‘दत्तक पुत्रों’ का हक खा गया सिस्टम?
- सालभर से मजदूरी के लिए भटकते श्रमिक
एमसीबी,25 मार्च 2026 (घटती-घटना)। छत्तीसगढ़ के वनांचल क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी समुदाय के लिए जंगल केवल संसाधन नहीं,बल्कि जीवन का आधार है,लेकिन जब उसी जंगल में उनके पसीने की कीमत भी न मिले, तो सवाल सिर्फ मजदूरी का नहीं—पूरे सिस्टम की संवेदनशीलता का हो जाता है,जिला एमसीबी के बहराशी वन परिक्षेत्र से सामने आया मामला इसी विडंबना को उजागर करता है,जहां 26 आदिवासी श्रमिक एक साल से अपनी मेहनत की मजदूरी के लिए दर-दर भटक रहे हैं,यह मामला अब केवल मजदूरी भुगतान का नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही,विभागीय पारदर्शिता और आदिवासी अधिकारों की वास्तविक स्थिति का आईना बन चुका है, सूरजपुर (एमसीबी) का यह मामला केवल 26 मजदूरों की मजदूरी का नहीं, बल्कि उस भरोसे का है जो आम आदमी सरकार और उसके सिस्टम पर करता है, यदि इस भरोसे को समय रहते नहीं संभाला गया,तो यह केवल एक मामला नहीं रहेगा—बल्कि कई और सवालों की शुरुआत बन जाएगा,व्यंग्य-जंगल उनका…मेहनत उनकी…फाइलें सरकारी…और पैसा कहीं अटका हुआ…सिस्टम कहता है—सब प्रक्रिया में है!
मजदूरी का हिसाब—मेहनत दर्ज,भुगतान गायब
आवेदन में संलग्न सूची के अनुसार सोन साय पण्डो 90 दिन कार्य,सुखसेन पण्डो कई सप्ताह,अर्जुन पण्डो, शंकर पण्डो, अनीता पण्डो और अन्य कई श्रमिकों ने लगातार मेहनत की,इन मजदूरों की आर्थिक स्थिति पहले से ही कमजोर है,मजदूरी न मिलने के कारण उनके सामने रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना भी मुश्किल हो गया है, विडंबना यह है कि सरकारी रिकॉर्ड में काम पूरा दिखाया जा सकता है, लेकिन मजदूर के घर में चूल्हा नहीं जल रहा।
सिस्टम की खामियां…कहां अटक रही है प्रक्रिया
यह मामला केवल एक घटना नहीं, बल्कि सिस्टम की कई खामियों को उजागर करता है, क्या कार्य पूर्ण होने के बाद सत्यापन हुआ? क्या भुगतान के लिए फाइल आगे बढ़ाई गई? क्या उच्च अधिकारियों ने निगरानी की? यदि इन सभी सवालों का जवाब नकारात्मक है, तो यह स्पष्ट संकेत है कि प्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी है।
कलेक्टर से उम्मीद—क्या मिलेगा न्याय
ग्रामीणों ने अंततः कलेक्टर एमसीबी को आवेदन सौंपा है और न्याय की मांग की है, अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या जांच टीम गठित होती है? क्या दोषियों पर कार्रवाई होती है? क्या मजदूरों को उनकी मजदूरी मिलती है? यह मामला प्रशासन के लिए एक परीक्षा है।
मामला जितना दिख रहा,उससे ज्यादा गहरा
इस पूरे प्रकरण को यदि गहराई से देखा जाए, तो यह केवल मजदूरी का विवाद नहीं है, इसमें शामिल हैं आदिवासी अधिकारों का प्रश्न, प्रशासनिक जवाबदेही, विभागीय पारदर्शिता और सिस्टम की संवेदनशीलता, यह मामला एक ग्राउंड रियलिटी चेक बन चुका है।
कागज़ बनाम हकीकत…किसकी सुनी जाएगी
कागज़ कह सकते हैं कि प्रक्रिया चल रही है, फाइलें आगे बढ़ रही हैं, लेकिन जमीन पर खड़ा मजदूर कह रहा है हमें अब तक कुछ नहीं मिला, सवाल यही है की क्या कागज़ का सच जीतेगा या जमीन का?
वन विभाग की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल
ग्रामीणों का आरोप है कि उन्होंने रांपा बीट में वन विभाग के निर्देश पर विभिन्न कार्य किए,जिनमें प्रमुख रूप से पत्थर बंधाई (चकडेम निर्माण) और तार मरम्मत जैसे श्रमसाध्य कार्य शामिल थे। काम पूरा होने के बाद उन्हें भुगतान का आश्वासन दिया गया, लेकिन समय बीतता गया और मजदूरी केवल फाइलों में ही सीमित रह गई,नियमों के अनुसार, किसी भी सरकारी कार्य का भुगतान 15 दिनों के भीतर कर दिया जाना चाहिए, लेकिन इस मामले में एक साल से अधिक का समय बीत चुका है और मजदूर अब भी खाली हाथ हैं,सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ लापरवाही है या सुनियोजित तरीके से भुगतान रोका गया है?
‘राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र’ भी शोषण से अछूते नहीं
पण्डो जनजाति, जिसे विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (क्कङ्कभ्त्र) के रूप में जाना जाता है,को अक्सर राष्ट्र्रपति के दत्तक पुत्र के रूप में संबोधित किया जाता है,सरकार इनके संरक्षण और विकास के लिए विशेष योजनाओं का दावा करती है,लेकिन बहराशी का यह मामला इन दावों की हकीकत को सामने लाता है,ग्राम पोंडी और लालमाटी के इन 26 श्रमिकों ने कठिन परिस्थितियों में काम किया। जंगल के बीच,सीमित संसाधनों के साथ उन्होंने विभागीय कार्य पूरे किए,लेकिन जब मेहनताना मांगने की बारी आई, तो उन्हें सिर्फ आश्वासन और टालमटोल मिली,यह केवल मजदूरी का मामला नहीं यह भरोसे के टूटने की कहानी है।
बीटगार्ड और डिप्टी रेंजर की भूमिका पर सवाल
शिकायत पत्र में स्पष्ट रूप से वन सुरक्षा बीटगार्ड मनधारी सिंह और डिप्टी रेंजर सुरेश सेंगर का नाम लिया गया है,ग्रामीणों का कहना है कि इन्हीं अधिकारियों की देखरेख में काम कराया गया था,आरोप यह है कि काम पूरा होने के बाद भुगतान की प्रक्रिया शुरू नहीं की गई, बार-बार पूछने पर टालमटोल किया गया,किसी स्पष्ट जवाब से बचा गया, यहां एक अहम सवाल उठता है,क्या केवल बीट स्तर के कर्मचारी इतने बड़े भुगतान को रोक सकते हैं? या फिर इसमें विभागीय स्तर पर गहरी मिलीभगत है?
पुरानी शिकायतों पर भी नहीं हुई कार्रवाई…
ग्रामीणों ने बताया कि 18 मई 2025 को उन्होंने वन परिक्षेत्राधिकारी बहराशी को लिखित आवेदन दिया था,लेकिन इस शिकायत का कोई समाधान नहीं निकला,इससे दो बातें स्पष्ट होती हैं विभागीय स्तर पर शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा,फाइलों को दबाकर मामले को ठंडे बस्ते में डालने की प्रवृत्ति मौजूद है,जब स्थानीय स्तर पर न्याय नहीं मिलता,तो लोग मजबूर होकर जिला प्रशासन की शरण लेते हैं।
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