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कोरिया@“जब सैंया भए कोतवाल…” कोरिया में अतिक्रमण बना वैध, सिस्टम पर उठे गंभीर सवाल

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  • नहर पर कब्जा,कागजों में सफाई ! कोरिया में अवैध निर्माण को मिला वैधता का तमगा,तीन साल तक अतिक्रमण,एक आदेश में वैध ! कोरिया का फैसला बना चर्चा का केंद्र
  • हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी खेल खत्म नहीं—अतिक्रमण को ही बता दिया गया वैध
  • रिपोर्टें कहती रहीं अतिक्रमण,आदेश ने कर दिया ‘क्लीन चिट’—कोरिया में बड़ा खेल उजागर
  • नहर भूमि पर रातों-रात निर्माण,प्रशासन ने आंखें मूंदी
  • पटवारी से लेकर जल संसाधन विभाग तक सब बोले ‘अतिक्रमण’,फिर कैसे बदला फैसला?
  • ग्राम पंचायत ने रोका काम,फिर भी खड़ी हो गई दीवार—किसके इशारे पर हुआ कब्जा?
  • अनापत्ति पत्र की नई व्याख्या से पलटा पूरा केस
  • राजनीतिक दबाव या प्रशासनिक लाचारी? सवालों के घेरे में तहसीलदार का आदेश

-रवि सिंह-
कोरिया,22 मार्च 2026 (घटती-घटना)। कोरिया जिले में सामने आया यह प्रकरण अब सिर्फ एक जमीन विवाद नहीं रह गया है, बल्कि यह प्रशासनिक निष्पक्षता,राजनैतिक हस्तक्षेप और न्यायिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर गहरे सवाल खड़े करता है,तीन वर्षों तक जिस निर्माण को सरकारी रिकॉर्ड, विभागीय रिपोर्ट और न्यायालय के आदेश में अतिक्रमण माना गया, वही अचानक एक आदेश में वैध घोषित कर दिया गया,इस पूरे घटनाक्रम को देखकर यही सवाल उठता है की क्या कानून अपनी जगह पर है,या फिर परिस्थितियों के हिसाब से उसे मोड़ा जा रहा है?
मामले की शुरुआत : वैधानिक प्रस्ताव और स्वीकृति
इस विवाद की शुरुआत तब हुई जब साहू समाज के लोकप्रिय नेता स्वर्गीय अरुण साहू, जो उस समय जिला अध्यक्ष थे,ने माता कर्मा चौक के निर्माण का प्रस्ताव तैयार कराया, दिनांक 16 नवंबर 2022 को हल्का पटवारी द्वारा नक्शा और खसरा नंबर प्रस्तुत किया गया, प्रस्तावित भूमि थी खसरा नंबर 54/1 (रास्ता मद) यह भूमि कंचनपुर से अंबिकापुर को जोड़ने वाली मुख्य सड़क का हिस्सा थी, इस प्रस्ताव को प्रशासनिक स्वीकृति मिली और आगे बढ़ते हुए, 12 अप्रैल 2023 को जनपद पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी ने ग्राम पंचायत भांडी को निर्माण एजेंसी बनाकर कार्यादेश जारी किया, यहां तक पूरी प्रक्रिया नियमों के तहत और पारदर्शी तरीके से आगे बढ़ रही थी।
कहानी में मोड़ः अचानक बदली जमीन,नहर पर पहुंचा निर्माण
जब ग्राम पंचायत ने निर्धारित सड़क भूमि पर निर्माण कार्य शुरू किया, तभी कथित रूप से एक प्रभावशाली स्थानीय नेता के हस्तक्षेप से स्थिति बदल गई,निर्माण स्थल को बदलकर खसरा नंबर 101/15 (नहर भूमि) कर दिया गया,नहर की भूमि पर भूमि पूजन और ले-आउट तैयार कर दिया गया, यह बदलाव न केवल तकनीकी रूप से गलत था,बल्कि यह सीधे-सीधे शासकीय भूमि के दुरुपयोग की श्रेणी में आता था।
ग्राम पंचायत की आपत्ति : हम काम नहीं करेंग…
इस पूरे घटनाक्रम के बाद ग्राम पंचायत भांडी ने जिम्मेदारी दिखाते हुए जनपद पंचायत को लिखित में स्पष्ट कर दिया,यह भूमि नहर विभाग की है,यहां विवाद की स्थिति है,ग्राम पंचायत इस स्थान पर निर्माण कार्य नहीं करेगी, इस कार्य के लिए प्राप्त राशि खर्च नहीं की गई है,पूरी राशि वापस जमा कर दी गई है,यह कदम दर्शाता है कि पंचायत स्तर पर नियमों का पालन करने की कोशिश की गई थी।
आधी रात का कब्जा : विवाद को सामाजिक रंग
इसके बावजूद मामला यहीं नहीं रुका, सूत्रों के अनुसार आधी रात को नहर भूमि पर जबरन कब्जा किया गया,दीवार निर्माण कर मूर्ति स्थापित कर दी गई,इस अवैध कब्जे को सामाजिक और धार्मिक मुद्दे का रूप दे दिया गया,सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि इस क्षेत्र के 100 मीटर दायरे में लगभग 60 प्रतिशत भूमि एक ही समाज विशेष के लोगों की है,इसके बावजूद, जिस स्थान पर कब्जा किया गया,उसे लेकर आरोप है कि यह एक व्यक्ति को नुकसान पहुंचाने के उद्देश्य से चुना गया।
प्रशासन की चुप्पी : आदेश के बावजूद कार्रवाई नहीं
हाई कोर्ट के स्पष्ट आदेश के बावजूद,प्रशासनिक स्तर पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई,अतिक्रमण हटाने की प्रक्रिया टाली जाती रही,जिम्मेदार अधिकारी मामले को लंबित रखते रहे, राजनैतिक दबाव की चर्चाएं लगातार सामने आती रहीं,यह स्थिति यह दर्शाती है कि जब सत्ता का दबाव बढ़ता है,तो प्रशासनिक इच्छाशक्ति कमजोर पड़ जाती है।
अवमानना और जल्दबाजी में फैसला
जब मामला अवमानना तक पहुंचा,तब प्रशासन सक्रिय हुआ, तहसीलदार बैकुंठपुर ने व्यक्तिगत कारणों का हवाला देकर समय मांगा, बाद में 6 फरवरी को दूसरे अधिकारी से सुनवाई शुरू करवाई गई, जल्दबाजी में टीम बनाकर जांच रिपोर्ट मंगाई गई लेकिन जो निष्कर्ष सामने आया, उसने पूरे मामले को और विवादित बना दिया।
सबसे बड़ा ट्विस्ट : यह अतिक्रमण है ही नहीं
तहसीलदार बैकुंठपुर द्वारा दिए गए अंतिम आदेश में कहा गया,यह अतिक्रमण का मामला नहीं है,इस निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए पटवारी की रिपोर्ट को नजरअंदाज किया गया,राजस्व निरीक्षक की रिपोर्ट को दरकिनार किया गया,जल संसाधन विभाग की आपत्तियों को भी महत्व नहीं दिया गया यानी,जो दस्तावेज तीन वर्षों तक अतिक्रमण साबित करते रहे,उन्हें एक झटके में अप्रासंगिक कर दिया गया।
अनापत्ति पत्र की ‘नई व्याख्या’
ग्राम पंचायत द्वारा दिए गए अनापत्ति पत्र को भी नए तरीके से पढ़ा गया, मूल पत्र में स्पष्ट लिखा था,यदि संबंधित विभाग नियमानुसार निर्माण कराते हैं, तो ग्राम पंचायत को कोई आपत्ति नहीं है,लेकिन तहसीलदार ने इसे पूर्ण अनापत्ति मानते हुए पूरे कब्जे को वैध घोषित कर दिया,यह व्याख्या ही इस मामले का सबसे बड़ा विवाद बन गई है।
प्रक्रिया में खामियां : न्यायिक सिद्धांतों की अनदेखी
इस निर्णय में कई गंभीर प्रक्रियात्मक खामियां सामने आई हैं,ग्राम पंचायत (निर्माण एजेंसी) को सुनवाई में शामिल नहीं किया गया,जल संसाधन विभाग से दोबारा अभिमत नहीं लिया गया,आवेदक को भी सुनवाई में अवसर नहीं मिला,पूर्व की सभी आधिकारिक रिपोर्टों को अनदेखा किया गया,यह स्थिति प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत मानी जा रही है।
सिस्टम पर असर : खतरनाक संकेत
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा असर यह है कि शासकीय भूमि की सुरक्षा पर सवाल उठे हैं,राजस्व व्यवस्था की निष्पक्षता संदिग्ध हुई है,आम जनता का प्रशासन पर विश्वास कमजोर हुआ है अगर अतिक्रमण को इस तरह वैध किया जाता रहा,तो यह एक खतरनाक परंपरा बन सकती है।
न्याय या सत्ता का प्रभाव?
कोरिया जिले का यह मामला अब एक मिसाल बन चुका है लेकिन सकारात्मक नहीं, बल्कि चेतावनी के रूप में,जहां नियमों के तहत शुरू हुआ कार्य,राजनीतिक हस्तक्षेप से बदला,विभागीय जांच में अवैध पाया गया, न्यायालय ने हटाने का आदेश दिया,वहीं अंत में एक प्रशासनिक आदेश ने सब कुछ उलट दिया,यह सिर्फ एक अतिक्रमण का मामला नहीं, बल्कि यह उस व्यवस्था का आईना है जहां कानून और सत्ता आमने-सामने खड़े हैं,अब देखना यह होगा कि इस फैसले पर उच्च स्तर पर पुनर्विचार होता है या यह मामला भी फाइलों में दबकर इतिहास बन जाता है।
विभागीय रिपोर्ट: हर स्तर पर अतिक्रमण की पुष्टि
जल संसाधन विभाग – नहर भूमि पर अतिक्रमण की पुष्टि
राजस्व निरीक्षक रिपोर्ट – अतिक्रमण दर्ज
पटवारी रिपोर्ट – अतिक्रमण पंजी में उल्लेख इतना ही नहीं, मामला न्यायालय तक पहुंचा और वर्ष 2024 में हाई कोर्ट ने अतिक्रमण हटाने का आदेश भी जारी किया।
बड़ा सवाल: अधिकार किसका?
❓ क्या नहर भूमि पर अतिक्रमण का निर्णय जल संसाधन विभाग करेगा?
❓ क्या राजस्व विभाग अपनी ही रिपोर्ट को बदल सकता है?
❓ क्या न्यायालय के आदेश को इस तरह अप्रभावी किया जा सकता है? अगर इसका जवाब स्पष्ट नहीं है, तो यह भविष्य में और बड़े विवादों को जन्म दे सकता है।


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