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सूरजपुर@कागज पर तबादला,जमीन पर खेल : पीडब्ल्यूडी सूरजपुर में ‘पोस्टिंग का प्रबंधन’ या ‘प्रबंधन की पोस्टिंग’?

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  • पीडब्ल्यूडी सूरजपुर में ‘तिगड़ी राज’, तबादले से लेकर सड़क तक सेटिंग का खेल उजागर
  • कागज पर तबादला, जमीन पर सौदा, सूरजपुर पीडब्ल्यूडी में सिस्टम या सिंडिकेट?
  • सड़क निर्माण या सप्लाई का खेल? सूरजपुर पीडब्ल्यूडी में ‘तिगड़ी’ की पकड़ मजबूत
  • तबादला, अवकाश और प्रभारी का खेल,पीडब्ल्यूडी सूरजपुर में अंदरखाने की सच्चाई
  • सड़क कम, नेटवर्क ज्यादा पक्का : सूरजपुर पीडब्ल्यूडी में सेटिंग से तय हो रही गुणवत्ता
  • पीडब्ल्यूडी में ‘इनसाइड गेम’: तबादले से लेकर मटेरियल सप्लाई तक सब तय!
  • तिगड़ी का दबदबा या सिस्टम फेल? सूरजपुर पीडब्ल्यूडी में उठे बड़े सवाल
  • कागजों में विकास, जमीन पर खेल : सूरजपुर पीडब्ल्यूडी की परतें खुलीं
  • प्रभारी पोस्टिंग से सप्लाई सिंडिकेट तक : पीडब्ल्यूडी सूरजपुर में बड़ा खुलासा
  • जहां सड़क बननी थी,वहां ‘सेटिंग’ बन गईः सूरजपुर पीडब्ल्यूडी पर गंभीर आरोप


-शमरोज खान-
सूरजपुर,22 मार्च 2026 (घटती-घटना)। लोक निर्माण विभाग सूरजपुर इन दिनों सुर्खियों में है कारण सड़क निर्माण नहीं, बल्कि विभाग के भीतर चल रही कथित ‘सेटिंग ‘, तबादला राजनीति और ‘सप्लाई सिंडिकेट’ की चर्चाएं हैं, कागजों में सब कुछ नियमों के अनुसार दिख रहा है,लेकिन जमीनी हकीकत एक अलग कहानी बयां कर रही है।
बात दे की सरकारी फाइलों की दुनिया बड़ी दिलचस्प होती है, यहां सब कुछ नियमों के मुताबिक होता है, लेकिन असल कहानी नियमों के पीछे छिपी होती है, ऐसा ही एक मामला लोक निर्माण विभाग सूरजपुर में सामने आया है, जहां 20 फरवरी 2026 को जारी तबादला आदेश ने कागजों पर तो सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया का रूप लिया, लेकिन जमीन पर इसकी परतें कुछ और ही कहानी बयां कर रही हैं। तबादलाः कागजों में सामान्य,चर्चा में खास-छत्तीसगढ़ शासन द्वारा जारी आदेश में अनुविभागीय अधिकारी राजीव कुमार वर्मा का स्थानांतरण कर उन्हें अन्य पदस्थापना दी गई,जबकि उनकी जगह हेमंत कुमार एक्का को सूरजपुर भेजा गया, कागजों में सब कुछ एकदम दुरुस्त न कोई विवाद, न कोई सवाल,लेकिन जैसे ही फाइल दफ्तर से बाहर निकली, कहानी ने करवट लेना शुरू कर दिया।
इनसाइड स्टोरीः ‘मेल नहीं खाया, तो खेल बनाया’?
सूत्रों की मानें तो यह तबादला महज रूटीन प्रक्रिया नहीं था, बल्कि विभागीय ‘रिश्तों की केमिस्ट्री’ का नतीजा था, चर्चा है कि राजीव कुमार वर्मा और सूरजपुर पीडब्ल्यूडी के कार्यपालन अभियंता के बीच तालमेल ठीक नहीं था, सरकारी भाषा में इसे ‘कार्य में असंतोष’ कहा जाता है, लेकिन स्थानीय भाषा में इसे सीधा कहा जा रहा है साहब से सेटिंग नहीं बैठी, तो सीट ही बदल दी गई।
नई पोस्टिंग, लेकिन अधिकारी गायब !
अब कहानी में असली ट्विस्ट आता है,जिन हेमंत कुमार एक्का को सूरजपुर भेजा गया, वे एक महीने बाद भी ज्वाइन नहीं कर पाए,यानी,कुर्सी खाली…और कुर्सी के आसपास राजनीति पूरी चालू, सवाल यह उठता है कि जब नया अधिकारी आया ही नहीं, तो पुराना अधिकारी क्यों हटाया गया? क्या इतनी जल्दी थी कि कुर्सी पहले खाली करनी जरूरी थी?
‘अवकाश’ का एंगलः कहानी या बहाना?
इसी बीच 10 मार्च 2026 को एक और आदेश जारी होता है,इसमें बताया जाता है कि राजीव कुमार वर्मा अपने पिता के स्वास्थ्य कारणों से अवकाश पर जा रहे हैं,अब यहीं से कहानी में ‘फिल्मी ट्विस्ट’ आता है, सूत्रों का दावा है कि यह अवकाश ‘स्वाभाविक कम, व्यवस्थागत ज्यादा’ है, यानी सवाल यह की क्या अवकाश पहले तय था या बाद में बनाया गया?
प्रभारी का खेलः असली सेटिंग यहीं!
सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि हेमंत कुमार एक्का के ज्वाइन न करने की स्थिति में, उप अभियंता कल्याण सिंह पोर्ते को प्रभारी अनुविभागीय अधिकारी बना दिया गया, अब यहां असली सवाल उठता है, क्या यह पूरी प्रक्रिया पहले से तय थी? क्या किसी खास व्यक्ति को जिम्मेदारी दिलाने के लिए पूरा ट्रांसफर-ड्रामा रचा गया? क्योंकि नया अधिकारी आया नहीं,पुराने को अवकाश पर भेज दिया गया और तीसरे को प्रभारी बना दिया गया,इसे ही प्रशासनिक भाषा में कहते हैं—तीन चाल में मात।
कागज बनाम हकीकत
अगर कागज देखें तो विधिवत तबादला आदेश,नया पदस्थापन,अवकाश का उल्लेख,प्रभारी की नियुक्ति, सब कुछ बिल्कुल सही, लेकिन अगर घटनाक्रम देखें तो नया अधिकारी अनुपस्थित, पुराने को हटाने की जल्दबाजी, बीच में नया आदेश और अंत में प्रभारी व्यवस्था, यानी कागज कह रहा है प्रशासन,और जमीन कह रही है प्रबंधन।
व्यंग्य की नजर से…
सरकारी तंत्र में अक्सर कहा जाता है की यहां सब कुछ नियमों से होता है,लेकिन इस मामले को देखकर लगता है की यहां नियमों से नहीं, नियमों के जरिए सब कुछ होता है, तबादला आदेश निकला, अधिकारी नहीं आया, पुराना चला गया,और तीसरा बैठ गया इतनी सटीक योजना तो शतरंज के खिलाड़ी भी नहीं बना पाते!
पीडब्ल्यूडी सूरजपुर में ‘तिगड़ी राज’:सड़क से ज्यादा ‘सिस्टम’ मजबूत, सप्लाई से तय हो रही गुणवत्ता!- लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) सूरजपुर इन दिनों विकास कार्यों से कम और अंदरूनी समीकरणों से ज्यादा चर्चा में है, विभाग के भीतर एक कथित ‘तिगड़ी’ का प्रभाव इतना मजबूत बताया जा रहा है कि सड़क निर्माण जैसे तकनीकी कार्य भी अब ‘इंजीनियरिंग’ से कम और ‘सिस्टम सेटिंग’ से ज्यादा संचालित होते नजर आ रहे हैं।
ठेकेदारों की मजबूरी : काम से पहले ‘सिस्टम’ समझो
सूत्र बताते हैं कि ठेकेदारों के सामने दो ही विकल्प होते हैं सिस्टम के अनुसार चलो या फिर फाइल अटकने के लिए तैयार रहो, आरोप है कि यदि ठेकेदार ‘पसंदीदा’ क्रेशर या सप्लायर से सामग्री नहीं लेते, तो उनके बिल पास होने में देरी, तकनीकी आपत्तियां या निरीक्षण में खामियां निकाल दी जाती हैं,और यदि वही ठेकेदार ‘निर्देशित सप्लायर’ से सामग्री लेते हैं, तो घटिया गुणवत्ता भी आसानी से पास हो जाती है।
गुणवत्ता बनाम ‘कनेक्शन’
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल सड़क की गुणवत्ता को लेकर उठ रहा है,तकनीकी मानकों के अनुसार, मटेरियल की गुणवत्ता,सही मिश्रण और निर्माण प्रक्रिया,इन सब पर सड़क की मजबूती निर्भर करती है,लेकिन यदि सामग्री का चयन तकनीकी आधार पर न होकर‘कनेक्शन’ के आधार पर हो, तो परिणाम क्या होगा, यह समझना मुश्किल नहीं है, सूत्रों का दावा अच्छी सामग्री भी रिजेक्ट हो सकती है,और खराब सामग्री भी पास हो सकती है,इस लिए एसडीओ मिश्रा आदेश माना मज़बूरी?
व्यंग्य में हकीकतः सड़क कम, सिस्टम ज्यादा पक्का- सरकारी रिकॉर्ड में सब कुछ ठीक टेंडर प्रक्रिया भी पूरी निरीक्षण रिपोर्ट में भी संतोषजनक और भुगतान नियमित लेकिन जमीनी स्तर पर सवाल यह है कि क्या सड़कें टिकाऊ बन रही हैं? या सिर्फ कागजों में मजबूत दिखाई जा रही हैं? कहावत बदलती नजर आ रही है जहां सड़क बननी चाहिए, वहां नेटवर्क बन रहा है।
ईई की भूमिका पर उठते सवाल
सूत्रों के अनुसार, इस पूरे घटनाक्रम के पीछे कार्यपालन अभियंता की भूमिका सबसे अहम मानी जा रही है, कहा जा रहा है कि विभागीय समीकरण बिगड़े और विरोधी अधिकारी को हटाया गया और अनुकूल व्यवस्था तैयार की गई, हालांकि आधिकारिक तौर पर सब कुछ नियमों के तहत बताया जा रहा है, लेकिन सवाल यह है कि क्या नियमों का उपयोग व्यवस्था सुधारने के लिए हुआ या व्यवस्था बनाने के लिए?
तिगड़ी का प्रभावः आदेश नहीं,संकेत चलते हैं…
सूत्रों के अनुसार, कार्यपालन अभियंता के करीबी माने जाने वाले दो अधिकारी प्रेमनगर के एसडीओ सुरेश कुमार मिश्रा और उप अभियंता कल्याण सिंह पोर्ते विभाग में असामान्य प्रभाव रखते हैं, बताया जा रहा है कि विभागीय निर्णयों में इन दोनों की भूमिका इतनी मजबूत है कि कई बार औपचारिक प्रक्रिया सिर्फ कागजों तक सीमित रह जाती है, जबकि वास्तविक फैसले ‘अनौपचारिक संकेतों’ पर लिए जाते हैं, यानी आदेश फाइल में होता है, लेकिन दिशा ‘तिगड़ी’ तय करती है।
सड़क निर्माण में ‘सप्लाई सिंडिकेट’ का आरोप
सबसे गंभीर आरोप प्रेमनगर क्षेत्र के सड़क निर्माण कार्यों को लेकर सामने आए हैं, सूत्रों का दावा है कि यहां सड़क बनने से पहले यह तय हो जाता है कि किस क्रेशर से गिट्टी या मटेरियल आएगा, किसका मिक्सर और जेएसबी उपयोग होगा, किस सप्लायर का बिल पास होगा, किसे रिजेक्ट करना है, यानी सड़क निर्माण का पहला सवाल अब ‘डिजाइन क्या है?’ नहीं, बल्कि ‘सप्लायर कौन है?’ बन गया है।
जनता का सवालः जवाब कौन देगा?
– क्या इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच होगी?
– क्या यह देखा जाएगा कि अवकाश और प्रभारी नियुक्ति के पीछे क्या परिस्थितियां थीं?
– या फिर यह मामला भी ‘फाइलों में सही’ मानकर बंद कर दिया जाएगा?
– जांच की जरूरत या ‘रूटीन मामला’?
– क्या इन आरोपों की निष्पक्ष जांच होगी?
– क्या सामग्री सप्लाई और गुणवत्ता की जांच कराई जाएगी?
– या फिर यह मामला भी ‘रूटीन प्रशासनिक प्रक्रिया’ मानकर नजरअंदाज कर दिया जाएगा?
विकास या व्यवस्था?
सूरजपुर पीडब्ल्यूडी का यह मामला सिर्फ सड़क निर्माण तक सीमित नहीं है, यह उस व्यवस्था का आईना है जहां, काम से ज्यादा नियंत्रण, और गुणवत्ता से ज्यादा ‘संपर्क’ मायने रखता है, अगर यही हाल रहा, तो आने वाले समय में सड़कें तो बनती रहेंगी, लेकिन उन पर चलने वाला भरोसा धीरे-धीरे टूटता जाएगा, आखिर सवाल यही है सड़क मजबूत बनेगी या सिस्टम?
सिस्टम या सेटिंग?
सूरजपुर पीडब्ल्यूडी का यह मामला सिर्फ एक तबादले की कहानी नहीं है, यह उस सिस्टम की झलक है जहां कागज पर नियम चलते हैं,और जमीन पर ‘सेटिंग’, अगर यही हाल रहा,तो आने वाले समय में तबादले आदेश नहीं होंगे, बल्कि ‘पदस्थापना की स्कि्रप्ट’ लिखी जाएगी।
ईई की भूमिका पर सवाल
सूत्रों के अनुसार,इस पूरे सिस्टम में कार्यपालन अभियंता की भूमिका भी सवालों के घेरे में है,कहा जा रहा है कि उनके करीबी अधिकारियों को खुली छूट है,और विभागीय नियंत्रण कमजोर पड़ गया है,हालांकि आधिकारिक रूप से कोई आरोप सिद्ध नहीं है,लेकिन लगातार उठ रहे सवाल विभाग की छवि पर असर डाल रहे हैं।
क्या कहते हैं ठेकेदार (अनौपचारिक चर्चा)
कुछ ठेकेदारों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि काम करना है तो सिस्टम के हिसाब से चलना पड़ता है, नहीं तो फाइल महीनों अटकी रहती है, गुणवत्ता से ज्यादा जरूरी है कि आप किससे सामग्री ले रहे हैं,ये बयान भले ही आधिकारिक न हों,लेकिन स्थिति की गंभीरता जरूर दर्शाते हैं।


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