- धान खुले में,सिस्टम फेल-कोडा में किसानों की मेहनत पर संकट
- खरीदी हुई फसल बर्बाद,जिम्मेदार गायब-कोडा केंद्र में हाल बेहाल द्द जानवरों के हवाले धान,अफसरों के हवाले बहाने!

राजेन्द्र शर्मा
खड़गवां (एमसीबी),21 मार्च 2026 (घटती-घटना)। आदिम जाति सेवा सहकारी समिति कोडा का धान खरीदी केंद्र इन दिनों बदइंतजामी, लापरवाही और गैर-जिम्मेदारी का जीवंत उदाहरण बन चुका है, यहां खरीदा गया धान खुले में पड़ा है,जानवर उसे खा रहे हैं,मौसम उसे खराब कर रहा है और जिम्मेदार अधिकारी हाथ खड़े कर चुके हैं,यह सिर्फ एक केंद्र की कहानी नहीं, बल्कि उस सिस्टम की हकीकत है जहां कागजों में व्यवस्था पूरी और जमीन पर सबकुछ ध्वस्त नजर आता है।
खुले में धान,खुलेआम बर्बादी
कोडा खरीदी केंद्र का नजारा किसी भंडारण स्थल से ज्यादा एक अव्यवस्थित मैदान जैसा दिखता है धान के बोरे बिना तिरपाल के खुले में पड़े हैं,बाउंड्री या घेराबंदी का कोई इंतजाम नहीं, मवेशी बेधड़क आकर धान खा रहे हैं,कहीं भी सुरक्षा या निगरानी के संकेत नहीं है यह स्थिति साफ बताती है कि भंडारण की कोई पूर्व तैयारी नहीं की गई थी।
मैनेजर का बयान बना विवाद का कारण
जब इस गंभीर लापरवाही पर समिति मैनेजर से सवाल किया गया,तो उनका जवाब जिम्मेदारी से बचने वाला और चौंकाने वाला था मैं भगवान थोड़ी हूं कि हाथ हिलाऊं और तिरपाल ढक जाए…जहां शिकायत करनी है कर लो,यह बयान न सिर्फ असंवेदनशील है,बल्कि यह दर्शाता है कि अधिकारी अपनी जिम्मेदारी से पूरी तरह पल्ला झाड़ रहे हैं, क्या अब किसानों को न्याय के लिए खुद लड़ना पड़ेगा? किसानों की मेहनत पर संकट
धान खरीदी केंद्र पर आए किसानों की पीड़ा साफ झलक रही है की महीनों की मेहनत से उगाया गया धान सुरक्षित नहीं,उचित भंडारण के अभाव में नुकसान का खतरा,लंबी कतारों में खड़े होकर भी कोई सुनवाई नहीं,किसानों का कहना है कि सरकार खरीदी तो कर रही है, लेकिन संरक्षण की व्यवस्था पूरी तरह नदारद है।
कर्मचारी मोबाइल में व्यस्त, किसान लाइन में परेशान
व्यवस्था की पोल तब और खुलती है जब केंद्र के अंदर की स्थिति देखी जाती है की कंप्यूटर ऑपरेटर कान में हेडफोन लगाकर मोबाइल पर व्यस्त,किसान घंटों इंतजार करते रहते हैं, कामकाज की गति बेहद धीमी,समिति मैनेजर का अक्सर अनुपस्थित रहना यह दृश्य प्रशासनिक लापरवाही का सीधा प्रमाण है।
प्रशासन की भूमिका कटघरे में…
यह मामला सिर्फ एक केंद्र तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे सिस्टम की खामियों को उजागर करता है, योजना बनती है,लेकिन क्रियान्वयन कमजोर, जिम्मेदारी तय नहीं होती,निगरानी तंत्र फेल हो जाता है,अगर इस पर सख्त कार्रवाई नहीं हुई,तो ऐसे मामले बार-बार सामने आते रहेंगे।
जनता और किसानों की मांग…
क्षेत्र के किसानों और नागरिकों ने प्रशासन से मांग की है,तत्काल जांच कर दोषियों पर सख्त कार्रवाई, किसानों के नुकसान की भरपाई,भंडारण और सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम,कर्मचारियों की नियमित निगरानी।
कागजों में व्यवस्था,जमीन पर अराजकता
कोडा धान खरीदी केंद्र की यह स्थिति एक बड़े सच को उजागर करती है,योजनाएं बनती हैं, बजट खर्च होता है, लेकिन जमीन पर परिणाम शून्य रहता है,यह घटना बताती है कि जवाबदेही की कमी सबसे बड़ी समस्या है,स्थानीय स्तर पर निगरानी तंत्र कमजोर है, अधिकारियों की संवेदनशीलता घटती जा रही है।
धान नहीं,भरोसा भी हो रहा बर्बाद
कोडा का यह खरीदी केंद्र सिर्फ धान की बर्बादी की कहानी नहीं है की यह किसानों के भरोसे,मेहनत और उम्मीदों के टूटने की कहानी है,अब देखना यह है कि क्या प्रशासन इस पर सख्त कार्रवाई करेगा? या फिर यह मामला भी ‘जहां शिकायत करनी है कर लो’ जैसी मानसिकता में दबकर रह जाएगा?
मौसम और जानवर की दोहरी मार
खुले में पड़ा धान दोहरी मार झेल रहा है मौसम का असर है, बारिश और आंधी से धान भीग रहा, तिरपाल उड़ जाने के बाद कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं, जानवरों का खतरा भी मवेशी धान को नुकसान पहुंचा रहे,खुले क्षेत्र में कोई रोक-टोक नहीं इसका सीधा असर धान की गुणवत्ता और मूल्य पर पड़ रहा है।
सिस्टम पर खड़े बड़े सवाल
खरीदी शुरू होने से पहले भंडारण की व्यवस्था क्यों नहीं की गई?
क्या फंड और संसाधनों का सही उपयोग हुआ?
जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय होगी या नहीं?
किसानों के नुकसान की भरपाई कौन करेगा?
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