- खड़गवां के जंगल धधके,वन विभाग सोया…आग ने खोली सिस्टम की पोल
- जंगल जलते रहे,जिम्मेदार मौज में-खड़गवां में लापरवाही की आग बेकाबू
- आग ने उजागर की सच्चाई, फायर वाचर गायब, वन अमला बेखबर
- खड़गवां में जंगल राख, अफसर खामोश, कुंभकर्णी नींद में वन विभाग
-राजेन्द्र शर्मा-
खड़गवां (एमसीबी),20 मार्च 2026 (घटती-घटना)। खड़गवां वन परिक्षेत्र के जंगल इन दिनों भयंकर आग की चपेट में हैं, कई दिनों से लगातार धधक रही आग ने अब विकराल रूप ले लिया है, आग की लपटें न केवल हरे-भरे जंगलों को निगल रही हैं, बल्कि वन विभाग की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े कर रही हैं,स्थानीय लोगों का आरोप है कि यह सिर्फ एक प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही और उदासीनता का परिणाम है।
आग का तांडवः जंगल बन रहे राख का मैदान- खड़गवां के विभिन्न बीट क्षेत्रों में आग लगातार फैल रही है, सूखे पत्तों और तेज हवाओं ने आग को और भड़काने का काम किया, जिससे आग तेजी से एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में फैल गई, कई हेक्टेयर वन क्षेत्र जलकर खाक हो गया, धुएं का गुबार दूर-दूर तक दिखाई दे रहा है, ग्रामीणों के अनुसार, आग एक-दो दिन की नहीं, बल्कि कई दिनों से धीरे-धीरे सुलग रही थी, जिसे समय रहते नियंत्रित नहीं किया गया।
सबसे बड़ा सवाल-फायर
वाचर आखिर कहां हैं?
वन विभाग द्वारा हर साल गर्मियों में जंगलों की सुरक्षा के लिए फायर वाचर तैनात किए जाते हैं, इनका काम होता है जंगलों की लगातार निगरानी,आग लगते ही तत्काल सूचना देना,शुरुआती स्तर पर आग पर नियंत्रण करना,लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में फायर वाचर मौके पर नजर नहीं आए,आग की सूचना देने में देरी हुई, शुरुआती नियंत्रण पूरी तरह नदारद रहा अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या फायर वाचर सिर्फ कागजों और फाइलों तक सीमित हैं?
कुंभकर्णी नींद में वन विभाग
स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि जब जंगल जल रहे थे,तब वन विभाग का अमला या तो मौके से गायब था या फिर बेहद देर से सक्रिय हुआ,कई जगह आग फैलने के बाद ही अधिकारी पहुंचे,पर्याप्त संसाधन और मानवबल का अभाव दिखा,नियंत्रण के प्रयास कमजोर और असंगठित रहे, यह स्थिति दर्शाती है कि विभाग संकट प्रबंधन में पूरी तरह विफल साबित हो रहा है।
वन संपदा पर भीषण प्रहार
इस भीषण आग ने केवल पेड़ों को नहीं,बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंचाया है, प्रभावित क्षेत्र में हरे-भरे वृक्ष और पौधे जलकर राख,औषधीय जड़ी-बूटियों का विनाश,मिट्टी की उर्वरता पर नकारात्मक प्रभाव,वन्य जीवन पर संकट छोटे जीव-जंतु आग में झुलस गए,पक्षियों के घोंसले नष्ट,बड़े वन्य जीवों का पलायन,यह नुकसान आने वाले वर्षों तक पर्यावरणीय संतुलन को प्रभावित करेगा।
क्या भ्रष्टाचार ने बुझा दी जिम्मेदारी?
स्थानीय स्तर पर यह चर्चा भी जोर पकड़ रही है कि वन अमला परसा कोल ब्लॉक से जुड़े निर्माण कार्यों में ज्यादा व्यस्त है,यदि यह आरोप सही हैं, तो यह बेहद गंभीर मामला है क्या जंगलों की सुरक्षा को नजरअंदाज किया जा रहा है? क्या प्राथमिकता ‘वन संरक्षण’ नहीं बल्कि ‘निर्माण और कमीशन’ बन चुकी है? यह सवाल सीधे तौर पर विभाग की नीयत और प्राथमिकताओं पर सवाल उठाते हैं।
प्रशासन के सामने खड़े तीखे सवाल
– फायर वाचरों की तैनाती के बावजूद वे मौके पर क्यों नहीं दिखे?
– आग लगने के बाद तत्काल कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
– क्या किसी अधिकारी की जिम्मेदारी तय की जाएगी?
– क्या इस मामले की निष्पक्ष जांच होगी?
स्थानीय लोगों का आक्रोश और मांग…
ग्रामीणों और क्षेत्रीय नागरिकों में भारी नाराजगी देखी जा रही है,उन्होंने प्रशासन से मांग की है तत्काल प्रभाव से आग बुझाने के लिए विशेष दल भेजे जाएं, फायर वाचरों की वास्तविक उपस्थिति सुनिश्चित की जाए,दोषी अधिकारियों और कर्मचारियों पर सख्त कार्रवाई हो,भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए ठोस रणनीति बनाई जाए।
सिस्टम की कमजोरी उजागर
यह घटना सिर्फ एक आग नहीं,बल्कि पूरे सिस्टम की पोल खोलने वाली घटना बन गई है निगरानी तंत्र कमजोर, जिम्मेदारी तय नहीं, संसाधनों का सही उपयोग नहीं, जवाबदेही का अभाव, अगर यही स्थिति रही,तो हर साल जंगल इसी तरह जलते रहेंगे और विभाग सिर्फ रिपोर्ट बनाता रह जाएगा।
जंगल ही नहीं, व्यवस्था भी जल रही है…
खड़गवां के जंगलों में लगी आग अब एक चेतावनी बन चुकी है यह सिर्फ पेड़ों को नहीं जला रही,बल्कि प्रशासनिक लापरवाही, भ्रष्टाचार और संवेदनहीनता को भी उजागर कर रही है, अब देखने वाली बात यह होगी कि क्या प्रशासन इस आग को बुझाने के साथ-साथ जिम्मेदारों पर कार्रवाई करेगा? या फिर यह मामला भी धुएं की तरह हवा में उड़ जाएगा?
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