- छात्रावास में मौत,सवाल सहायक आयुक्त पर…ढाई साल में क्यों नहीं सुधरी व्यवस्था?
- अधीक्षक दोषी या सिस्टम? कोरिया के छात्रावासों पर उठे जवाबदेही के बड़े सवाल
- छात्रों की सुरक्षा भगवान भरोसे? कोरिया के छात्रावासों में अव्यवस्था की लंबी कहानी
- ढाई साल का कार्यकाल और घटनाओं की श्रृंखला…सहायक आयुक्त की निगरानी पर सवाल
- छात्रावासों में अव्यवस्था,जांच अधीक्षक पर मॉनिटरिंग करने वाले क्यों बाहर?
- सुविधा छात्रों के लिए,जिम्मेदारी किसकी? कोरिया छात्रावास व्यवस्था पर बड़ा सवाल
- सोनहत की घटना ने खोली परतें…छात्रावास व्यवस्था में निगरानी तंत्र पर सवाल

-राजन पाण्डेय-
कोरिया/ सोनहत,17 मार्च 2026 (घटती-घटना)। आदिवासी समुदाय के छात्र-छात्राओं को शिक्षा के बेहतर अवसर उपलब्ध कराने के उद्देश्य से शासन द्वारा आश्रम छात्रावास और एकलव्य विद्यालयों की व्यवस्था की गई है,इस व्यवस्था का मूल उद्देश्य यह है कि दूरस्थ क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी छात्र आर्थिक अभाव या शैक्षणिक संसाधनों की कमी के कारण पढ़ाई से वंचित न रहें, सरकार इन छात्रावासों में छात्रों को निःशुल्क आवास,भोजन,अध्ययन का वातावरण और अन्य आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराती है ताकि वे सुरक्षित माहौल में रहकर अपनी पढ़ाई पूरी कर सकें।
लेकिन जब ऐसी व्यवस्था, जो आदिवासी छात्रों के भविष्य को संवारने के लिए बनाई गई हो, लगातार शिकायतों, अव्यवस्थाओं और गंभीर घटनाओं की वजह से चर्चा में आने लगे, तब सवाल केवल छात्रावासों की व्यवस्था पर ही नहीं बल्कि उसकी निगरानी करने वाली पूरी प्रशासनिक संरचना पर भी खड़े होने लगते हैं, कोरिया जिले में पिछले कुछ वर्षों से आदिवासी छात्रावासों को लेकर लगातार शिकायतें और घटनाएं सामने आती रही हैं,हाल ही में सोनहत क्षेत्र के एक छात्रावास में एक छात्र द्वारा फांसी लगाकर आत्महत्या करने की घटना ने पूरे जिले को झकझोर कर रख दिया, इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर छात्रावास व्यवस्था की जवाबदेही किसकी है, केवल अधीक्षक की या फिर उन अधिकारियों की भी जो पूरी व्यवस्था की निगरानी के लिए नियुक्त किए गए हैं।

वसूली और बंदरबांट की चर्चा
स्थानीय सूत्रों के अनुसार छात्रावास व्यवस्था में प्रति छात्र मिलने वाली राशि में कथित तौर पर मासिक और वार्षिक वसूली का खेल भी चलता है,यदि यह आरोप सही हैं तो यह व्यवस्था के लिए किसी दीमक से कम नहीं है, क्योंकि यही व्यवस्था धीरे-धीरे छात्रावासों की गुणवत्ता और सुविधाओं को कमजोर कर देती है।
अधीक्षक ही दोषी या पूरी व्यवस्था?
जब भी किसी छात्रावास में गड़बड़ी सामने आती है तो अक्सर कार्रवाई अधीक्षक तक सीमित रह जाती है,लेकिन यह भी उतना ही महत्वपूर्ण प्रश्न है कि यदि निगरानी की व्यवस्था मजबूत होती तो क्या इतनी घटनाएं सामने आतीं? क्योंकि अधीक्षक के ऊपर भी एक प्रशासनिक ढांचा होता है,जिसकी जिम्मेदारी निगरानी और सुधार की होती है।
जवाबदेही तय करना जरूरी
सोनहत की घटना के बाद यह सवाल और तेज हो गया है कि यदि छात्रावासों में लगातार समस्याएं सामने आ रही हैं तो जिम्मेदारी तय कैसे होगी,क्या केवल अधीक्षक को दोषी ठहराकर व्यवस्था में सुधार संभव है? या फिर उस पूरी प्रशासनिक व्यवस्था की समीक्षा भी आवश्यक है जो इन छात्रावासों की निगरानी के लिए बनाई गई है?
मुखर छात्र और दुःखद अंत
बताया जा रहा है कि जिस छात्र ने आत्महत्या की, वह छात्रावास की अव्यवस्थाओं को लेकर मुखर था और अपनी समस्याओं को मीडिया के माध्यम से सामने लाने की कोशिश कर रहा था, ऐसी स्थिति में यह सवाल और भी गंभीर हो जाता है कि क्या उसे अपनी बात रखने के लिए प्रोत्साहित किया गया या फिर उस पर दबाव की स्थिति बनी? यदि कोई छात्र अपनी समस्याओं को सामने लाता है तो उसे संरक्षण मिलना चाहिए या उसे चुप कराने का प्रयास होना चाहिए—यह सवाल अब स्थानीय स्तर पर चर्चा का विषय बना हुआ है।
पहले भी सामने आ चुकी हैं गंभीर घटनाएं
सोनहत की घटना को यदि अलग रख भी दिया जाए, तब भी कोरिया जिले के छात्रावासों का रिकॉर्ड पिछले कुछ वर्षों में चिंताजनक ही दिखाई देता है, इस दौरान कई तरह की घटनाएं सामने आईं,छात्रावासों में अव्यवस्था की शिकायतें, छात्रों के साथ दुर्व्यवहार के आरोप, सुरक्षा को लेकर सवाल, छात्राओं से जुड़े संवेदनशील मामले, एक मामले में तो छात्रावास से जुड़ी घटना के बाद एक छात्रा द्वारा अपने घर जाकर आत्महत्या करने की खबर भी सामने आई थी, इन घटनाओं के बावजूद व्यवस्था में अपेक्षित सुधार न होना प्रशासनिक जिम्मेदारी पर सवाल खड़े करता है।
खरीद और निर्माण में भी अनियमितता की चर्चा
सूत्रों के अनुसार सहायक आयुक्त के कार्यकाल के दौरान छात्रावासों में सामग्री खरीदी और निर्माण कार्यों को लेकर भी कई बार अनियमितताओं की चर्चा सामने आई है, अमानक सामग्री की खरीदी, निर्माण कार्यों में गुणवत्ता की कमी और निगरानी के अभाव जैसे आरोप भी समय-समय पर लगाए जाते रहे हैं, तडि़त चालक (लाइटनिंग अरेस्टर) जैसी सुरक्षा व्यवस्था की खरीदी को लेकर भी सवाल उठे थे, बताया जाता है कि कई छात्रावासों में लगाए गए तडि़त चालक टिकाऊ साबित नहीं हुए और कुछ जगह तो यह लगते ही बेअसर हो गए, यदि यह सच है तो यह केवल वित्तीय अनियमितता का मामला नहीं बल्कि छात्रों की सुरक्षा से जुड़ा गंभीर प्रश्न भी है।
पदोन्नति और पोस्टिंग का विवाद
इसी कार्यकाल के दौरान छात्रावास अधीक्षकों की पदोन्नति और पदस्थापना को लेकर भी विवाद सामने आया, स्थिति इतनी उलझ गई कि पुनः काउंसलिंग कराकर पोस्टिंग आदेश जारी करने पड़े, उस समय यह चर्चा भी सामने आई कि कई अधीक्षक अधिक सीट वाले छात्रावासों में पदस्थापना को लेकर विशेष रुचि दिखा रहे थे, स्थानीय स्तर पर इसे लेकर यह टिप्पणी भी सुनने को मिली कि जहां छात्र ज्यादा, वहां जिम्मेदारी कम और सुविधाओं की संभावनाएं ज्यादा समझी जाती हैं, यदि ऐसी मानसिकता विकसित हो जाए तो छात्रावास व्यवस्था का मूल उद्देश्य ही कमजोर पड़ जाता है।
सहायक आयुक्त की भूमिकाः निगरानी या केवल औपचारिकता?
आदिवासी विकास विभाग में प्रत्येक जिले में सहायक आयुक्त की नियुक्ति इसलिए की जाती है ताकि वे जिले के सभी आश्रम छात्रावासों और आदिवासी विद्यालयों की निगरानी कर सकें, सहायक आयुक्त की जिम्मेदारियों में शामिल होता है, छात्रावासों का नियमित निरीक्षण,छात्रों को मिलने वाली सुविधाओं की समीक्षा, शिकायतों का समाधान, अधीक्षकों की कार्यप्रणाली की निगरानी,छात्रों की सुरक्षा और व्यवस्था सुनिश्चित करना, लेकिन यदि लगातार छात्रावासों से शिकायतें आती रहें, सुविधाओं में कमी की बातें सामने आएं और गंभीर घटनाएं घटती रहें, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह निगरानी केवल कागजों में सीमित रह गई है या वास्तव में जमीनी स्तर पर भी हो रही है।
ढाई वर्षों का कार्यकाल और घटनाओं की लंबी सूची…
कोरिया जिले में वर्तमान सहायक आयुक्त का कार्यकाल लगभग ढाई वर्षों का हो चुका है,इस दौरान जिले के आश्रम छात्रावासों को लेकर कई बार सवाल उठे हैं,ऐसा शायद ही कोई वर्ष रहा हो जब छात्रावासों की व्यवस्था को लेकर कोई विवाद,शिकायत या गंभीर घटना सामने न आई हो,कभी छात्रों को मिलने वाली सुविधाओं में कटौती की चर्चा हुई,तो कभी छात्र सुरक्षा को लेकर सवाल उठे, कई बार छात्रों को अपनी समस्याएं सामने लाने के लिए मीडिया का सहारा लेना पड़ा, हालिया घटना सोनहत के एक छात्रावास की है, जहां एक छात्र ने छात्रावास परिसर में ही फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली,हालांकि इस मामले की जांच पुलिस कर रही है और जांच के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि आत्महत्या के पीछे वास्तविक कारण क्या था, लेकिन इस घटना ने एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा कर दिया है,क्या छात्रावासों में छात्रों की सुरक्षा और मानसिक स्थिति की निगरानी वास्तव में की जा रही है?
अंत में
कोरिया जिले में आदिवासी छात्रावासों को लेकर उठ रहे सवाल केवल प्रशासनिक बहस का विषय नहीं हैं, यह उन हजारों आदिवासी छात्रों के भविष्य से जुड़ा मामला है जो इन छात्रावासों में रहकर बेहतर जीवन की उम्मीद कर रहे हैं,यदि इन छात्रावासों की व्यवस्था में पारदर्शिता,निगरानी और जवाबदेही सुनिश्चित नहीं की गई,तो यह केवल एक योजना की विफलता नहीं होगी बल्कि उन छात्रों के सपनों के साथ भी अन्याय होगा जिनके लिए यह पूरी व्यवस्था बनाई गई है, अब जरूरत इस बात की है कि इन घटनाओं को केवल अलग-अलग घटनाओं के रूप में देखने के बजाय पूरी व्यवस्था की व्यापक समीक्षा की जाए और जिम्मेदारी वहां तय की जाए जहां वास्तव में तय होनी चाहिए।
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