- धान खरीदी या संरक्षण उद्योग? सरगुजा में तिगड़ी के साये में सिस्टम
- निलंबन,एफआईआर के बाद भी नहीं थमा खेल भैयाथान-लटोरी बना सबसे बड़ा उदाहरण
- धान के चबूतरे के नीचे दबा सच : सरगुजा में ‘संरक्षण तिगड़ी’ का खेल
- निलंबन,एफआईआर…फिर भी बेखौफ : धान खरीदी में किसका संरक्षण?
- 93 लाख से लेकर ऋण घोटाले तकः
- कार्रवाई हुई या सिर्फ दिखावा?
- केंचुए की चाल में न्याय : गड़बड़ी साबित,सजा गायब
- धान खरीदी या संरक्षण उद्योग? सरगुजा मॉडल पर बड़ा सवाल
- सीईओ श्रीकांत चंद्राकर,संयुक्त आयुक्त सुनील
- तिवारी और अध्यक्ष किशन राम सिंह पर उठे सवाल
- फाइलें दबती रहीं,सिस्टम चलता रहा — किसान भरोसा खोता गया
- धान खरीदी में ‘मैनेजमेंट राज’ः पकड़ो,दबाओ और आगे बढ़ जाओ
- फाइलों में दफन घोटाले : सरगुजा में कौन बचा रहा किसे?
- गड़बड़ी पकड़ने वाले ही कटघरे में : सहकारिता तंत्र पर बड़ा सवाल
- धान के नाम पर खेल,किसान के नाम पर धोखा?
- संरक्षण की छतरी में फलता-फूलता भ्रष्टाचार…

ओंकार पाण्डेय
सूरजपुर,17 मार्च 2026 (घटती-घटना)। छत्तीसगढ़ का किसान जब धान की बोरियां लेकर खरीदी केंद्र पहुंचता है,तो उसे सिर्फ कीमत नहीं,बल्कि व्यवस्था पर भरोसा चाहिए होता है,यही भरोसा राज्य की धान खरीदी प्रणाली की असली पूंजी है,लेकिन सरगुजा संभाग से उठ रही खबरें इस भरोसे को लगातार कमजोर कर रही हैं,यह मामला अब साधारण अनियमितताओं से आगे बढ़कर एक पैटर्न,एक सिस्टम और कथित ‘संरक्षण मॉडल’ की कहानी बन चुका है,इस पूरे प्रकरण में जिन तीन नामों की चर्चा लगातार सामने आ रही है,उन्हें स्थानीय स्तर पर व्यंग्य में ‘संरक्षण तिगड़ी’ कहा जा रहा है,जिनमे सीईओ श्रीकांत चंद्राकर (जिला सहकारी केंद्रीय बैंक, अंबिकापुर),संयुक्त आयुक्त सहकारिता सुनील तिवारी (संयुक्त पंजीयक,सरगुजा संभाग), प्राधिकरण अध्यक्ष किशन राम सिंह आरोपों की आधिकारिक पुष्टि भले न हो,लेकिन घटनाओं की श्रृंखला,फाइलों की गति और कार्रवाई की स्थिति ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
अध्याय 1 : धान खरीदी — व्यवस्था की ताकत या कमजोरी का आईना?
छत्तीसगढ़ की धान खरीदी प्रणाली देश में एक मॉडल मानी जाती है,सहकारी समितियां,जिला सहकारी बैंक और प्रशासन मिलकर इस व्यवस्था को संचालित करते हैं,इस प्रणाली के मुख्य उद्देश्य हैं की किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य पर धान खरीदी,समय पर भुगतान, पारदर्शी रिकॉर्ड,सुरक्षित भंडारण,लेकिन सरगुजा संभाग में इन मूल उद्देश्यों की जगह अब चर्चा हो रही है गड़बड़ी,देरी,फाइल दबने और संरक्षण की।
अध्याय 2 : सूरजपुर-गड़बड़ी
की खबरें और गायब होती कार्रवाई
सूरजपुर जिले के कई धान खरीदी केंद्रों में समय-समय पर अनियमितताओं की शिकायतें सामने आईं, इनमें प्रमुख आरोप रहे,स्टॉक और रिकॉर्ड में अंतर, धान की मात्रा में हेरफेर,बीमा क्लेम राशि में गड़बड़ी, परिवहन प्रक्रिया में अनियमितता जांच के दौरान कुछ मामलों में गड़बड़ी प्रमाणित भी हुई,लेकिन इसके बाद कार्रवाई की गति संदिग्ध रही,फाइलों की स्थिति पर स्थानीय लोग कहते हैं की यहां फाइलें चलती हैं, लेकिन पहुंचती कहीं नहीं।
अध्याय 3 : ‘केंचुए की चाल’
जांच की परिभाषा बदल गई
सरकारी जांच की धीमी रफ्तार कोई नई बात नहीं, लेकिन यहां यह एक ‘व्यवस्था’ बन चुकी है,जांच शुरू होती है,नोटिंग होती है,फाइल आगे बढ़ती है और फिर महीनों तक स्थिर स्थानीय शब्दों में ‘केंचुए की चाल वाली जांच’ इसका असर ये होता है की दोषियों में डर खत्म,ईमानदारों में निराशा और सिस्टम में भरोसे की कमी।
अध्याय 4 : शिवप्रसादनगर
गड़बड़ी का प्रतीक…
शिवप्रसादनगर धान खरीदी केंद्र को इस पूरे सिस्टम का ‘केस स्टडी’ माना जा रहा है, यहां गड़बड़ी की शिकायतें,बीमा विवाद,निलंबन और जांच सब कुछ हुआ,लेकिन अंतिम परिणाम? अस्पष्ट रहा,स्थानीय व्यंग्य है की ‘यहां धान से ज्यादा फाइलें दबती हैं।
अध्याय 5 : उदाहरण जो पूरा सिस्टम समझाता है ‘निलंबन,एफआईआर और फिर संरक्षण?’ — भैयाथान-लटोरी शाखा का पूरा मामला
यदि सरगुजा संभाग में ‘संरक्षण मॉडल’ को समझना हो,तो जिला सहकारी बैंक की भैयाथान-लटोरी शाखा इसका सबसे सटीक उदाहरण बनती है,यहां घटनाएं एक-दो साल की नहीं,बल्कि लगातार कई वर्षों से जुड़ी हुई हैं।
2019 : धान खरीदी में
93.41 लाख की गड़बड़ी
कलेक्टर कार्यालय सूरजपुर द्वारा जारी पत्र में ?93,41,000 की वित्तीय अनियमितता, एफआईआर दर्ज करने के निर्देश,पुलिस अधीक्षक को कार्रवाई आदेश यह स्पष्ट संकेत था कि मामला गंभीर है,लेकिन बड़ा सवाल क्या किसी को सजा मिली?
2022 : गोपालन ऋण
नियमों की अनदेखी
शिकायतों के आधार पर जांच टीम गठित हुई, जांच में पाया गया की पात्रता से अधिक ऋण,लाभार्थियों की जांच में कमी, नियमों का उल्लंघन।
2023 : एफआईआर और निलंबन
– 04 जनवरी 2023-एफआईआर दर्ज (धारा 409,420,34 आईपीसी)
– 27 जनवरी 2023-निलंबन आदेश जारी यहां तक सब कुछ प्रक्रिया के अनुसार था।
– लेकिन इसके बाद… ‘संरक्षण की चर्चा ‘- सूत्रों और कर्मचारियों का दावा निलंबन के बाद भी प्रभाव बना रहा, कठोर कार्रवाई नहीं हुई,बर्खास्तगी जैसी कार्रवाई सामने नहीं आई, यहां निलंबन अंत नहीं,एक औपचारिकता है।
अध्याय 6 : ‘संरक्षण तिगड़ी’
सवालों के घेरे में शीर्ष स्तर-अब सवाल फिर वहीं लौटता है जब यह सब वर्षों से चल रहा है,तो निगरानी किसकी जिम्मेदारी थी? कार्रवाई क्यों नहीं हुई? क्या संरक्षण ऊपर तक फैला है? स्थानीय व्यंग्य है की यहां फाइल ऊपर जाती है और सच नीचे दब जाता है।
अध्याय 7 : शादी,वसूली और ‘संरक्षण नेटवर्क’- सूत्रों के अनुसार, प्राधिकरण अध्यक्ष किशन राम सिंह के पारिवारिक कार्यक्रम में खरीदी केंद्रों से आर्थिक सहयोग संरक्षण का संकेत हालांकि पुष्टि नहीं,लेकिन चर्चा व्यापक है।
अध्याय 8 : ‘पुराना खिलाड़ी’- सिस्टम का अनौपचारिक संचालक- एक पूर्व बैंक मैनेजर का नाम भी चर्चा में है संपर्क सूत्र मैनेजमेंट एक्सपर्ट व नेटवर्क का हिस्सा है।
अध्याय 9 : राजनीति बनाम-किशन राम सिंह की राजनीतिक पृष्ठभूमि को देखते हुए सवाल उठ रहे हैं की क्या राजनीतिक प्रभाव कार्रवाई को प्रभावित कर रहा है? क्या सहकारिता तंत्र स्वतंत्र रूप से काम कर पा रहा है?
अध्याय 10ः किसान-सबसे बड़ा नुकसान
इस पूरे सिस्टम का सबसे बड़ा नुकसान—
– किसान द्द भरोसा
– पारदर्शिता
धान खरीदी या ‘संरक्षण उद्योग ‘?
सरगुजा में अब यह सवाल आम हो चुका है की यह धान खरीदी है या संरक्षण उद्योग? जहां गड़बड़ी होती है,जांच होती है,फाइल दबती है और सिस्टम चलता रहता है।
आखिरी सवाल
(जो जवाब मांगता है)
– क्या स्वतंत्र जांच होगी?
– क्या जिम्मेदार तय होंगे?
– क्या सजा मिलेगी? या फिर— ‘यह मामला भी धान के चबूतरे के नीचे दब जाएगा? ‘
– क्योंकि अब सवाल सिर्फ धान का नहीं… विश्वास का है।
पैटर्न जो पूरे सिस्टम पर सवाल उठाता है…
घटनाओं को जोड़ें—
- 2019 — धान खरीदी गड़बड़ी 2. 2022 — ऋण अनियमितता
- 2023 — एफआईआर
- फिर भी — प्रभाव कायम यह एक पैटर्न बनाता है— ‘कार्रवाई होती है,लेकिन परिणाम नहीं।
चौंकाने वाले आरोप….
– मृत व्यक्तियों के नाम पर ऋण
– पात्रता से अधिक राशि
– चयनित लाभार्थियों को फायदा यदि ये आरोप सही हैं,तो यह केवल भ्रष्टाचार नहीं बल्कि संस्थागत विफलता है।
कानूनी स्थिति — गंभीर धाराएं, हल्का परिणाम?
धारा 409 (विश्वासघात) और 420 (धोखाधड़ी) जैसे गंभीर आरोप लगे।
लेकिन—
– चार्जशीट की स्थिति अस्पष्ट
– ट्रायल की जानकारी सीमित
– सजा का रिकॉर्ड सामने नहीं
किसानों की आवाज…
कई किसानों ने बताया की ऋण में देरी,भुगतान में अड़चन,अनावश्यक कागजी प्रक्रिया,वहीं कुछ मामलों में तेज स्वीकृति व अधिक राशि प्रकिरिया बनी रही।
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