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कोरिया@एक ही न्यायालय,दो आदेश…पहले कब्जा हटाने का आदेश,बाद में अतिक्रमण ही नहीं…

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  • भांडी के कर्मा चौक मामले में अतिक्रमण से अनापत्ति तक का रहस्यमय सफर
  • पहले कब्जा हटाने का आदेश, बाद में अतिक्रमण ही नहीं…तहसीलदार न्यायालय के दो फैसलों से उठे कई सवाल
  • पहले अतिक्रमण हटाओ,फिर कोई अतिक्रमण नहीं : भांडी के कर्मा चौक पर आदेशों का उलटफेर
  • नहर की जमीन पर चौक या फाइलों का खेल? एक ही अदालत के दो फैसलों ने बढ़ाए सवाल
  • 20 दिन में हटाओ कब्जा…फिर मामला खत्म : भांडी में आदेशों का रहस्यमय यू-टर्न
  • अतिक्रमण से अनापत्ति तकः भांडी के कर्मा चौक ने खोली प्रशासनिक विरोधाभास की परतें
  • कोरिया@नहर वही, चौक वही… बस आदेश बदल गए!
  • एक ही अदालत,दो आदेशः भांडी के कर्मा चौक मामले में प्रशासनिक पहेली
  • कागजों में बदली नहर की सीमा? कर्मा चौक मामले में फैसलों पर उठे बड़े सवाल

रवि सिंह
कोरिया,16 मार्च 2026 (घटती-घटना)। कोरिया जिले के बैकुंठपुर क्षेत्र के ग्राम भांडी में बने भक्त माता कर्मा चौक को लेकर एक ऐसा मामला सामने आया है,जिसने प्रशासनिक व्यवस्था और न्यायिक प्रक्रिया दोनों पर सवाल खड़े कर दिए हैं,हैरानी की बात यह है कि एक ही न्यायालय से एक ही प्रकरण में दो अलग-अलग आदेश सामने आए हैं, पहले आदेश में जहां निर्माण को नहर की भूमि पर अतिक्रमण बताते हुए कब्जा हटाने के निर्देश दिए गए,वहीं बाद के आदेश में उसी निर्माण को अतिक्रमण की श्रेणी से बाहर बताते हुए मामला समाप्त कर दिया गया, यह विरोधाभास अब स्थानीय स्तर पर चर्चा और सवालों का विषय बन गया है।
नियम क्या कहते हैं…
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार माइनर नहर,उसकी पटरी और आसपास का क्षेत्र सामान्यतः सरकारी संपत्ति माना जाता है, नहर के दोनों किनारों पर एक सुरक्षा क्षेत्र रखा जाता है ताकि मरम्मत और रखरखाव का काम किया जा सके, ऐसे में बिना अनुमति निर्माण को सामान्यत : अतिक्रमण माना जाता है,हालांकि कुछ मामलों में विभाग अनापत्ति प्रमाण पत्र जारी करता है, लेकिन यह आमतौर पर पुल,पाइपलाइन या सड़क क्रॉसिंग जैसे सार्वजनिक कार्यों के लिए होता है,निजी या स्थायी निर्माण सामान्यतः अनुमति योग्य नहीं माने जाते।
सामाजिक और राजनीतिक चर्चा
इस मामले में एक और पहलू भी चर्चा में है। माता कर्मा साहू समाज की आराध्य देवी मानी जाती हैं और क्षेत्र में समाज का प्रभाव भी है, कुछ लोग मानते हैं कि इस पूरे मामले में सामाजिक दबाव और स्थानीय समीकरण भी भूमिका निभा सकते हैं,हालांकि इसकी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं है।
क्या है मामला …
ग्राम भांडी में खसरा नंबर 101/15 की भूमि पर भक्त माता कर्मा चौक का निर्माण किया गया,चौक के बीच में माता कर्मा की मूर्ति स्थापित की गई और चारों ओर लगभग सात फीट ऊंची दीवार बनाकर चबूतरा तैयार किया गया,निर्माण क्षेत्र करीब 290 से 338 वर्गफुट बताया गया,यह स्थल साहू समाज की आस्था से जुड़ा बताया जाता है,क्योंकि माता कर्मा को साहू समाज की आराध्य देवी माना जाता है,लेकिन यह धार्मिक स्थल जल्द ही नहर भूमि पर अतिक्रमण के विवाद में बदल गया।
पहला आदेश : अतिक्रमण मानकर हटाने के निर्देश…
तहसीलदार न्यायालय,बैकुंठपुर के पहले आदेश में जांच के आधार पर कहा गया कि निर्माण जल संसाधन विभाग की माइनर नहर की भूमि पर किया गया है, आदेश में उल्लेख किया गया कि लगभग 29&10 फुट क्षेत्र में 7.5 फीट ऊंची कंक्रीट दीवार बनाकर मूर्ति स्थापित की गई,जो नहर की भूमि के भीतर आती है,इस आधार पर न्यायालय ने इसे छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता 1959 की धारा 248 के तहत अतिक्रमण मानते हुए संबंधित पक्ष को 20 दिनों के भीतर कब्जा हटाने का आदेश दिया।
फिर बदली कहानी…
मामले में आगे चलकर एक नया मोड़ आया, इस बार जल संसाधन विभाग की ओर से जारी एक पत्र सामने आया जिसमें कहा गया कि निर्माण से नहर को किसी प्रकार की क्षति नहीं हुई है और कोई अतिक्रमण नहीं किया गया,यानी जिस निर्माण को पहले नहर की जमीन पर बताया गया था,उसी निर्माण को विभाग ने बाद में बिना आपत्ति का निर्माण बता दिया।
दूसरा आदेश : मामला समाप्त
नई विभागीय रिपोर्ट के आधार पर तहसीलदार न्यायालय में फिर सुनवाई हुई, इस बार आदेश में कहा गया कि जल संसाधन विभाग के अनुसार निर्माण से नहर को कोई नुकसान नहीं हुआ,पंचायत का प्रस्ताव और सरकारी स्वीकृति मौजूद है,इसलिए यह निर्माण अतिक्रमण की श्रेणी में नहीं आता,इसी आधार पर न्यायालय ने प्रकरण को समाप्त करते हुए केस को दाखिल-दफ्तर कर दिया,पर सवाल है की सरकारी स्वीकृति की जमीन की थी? क्या न्यायालय ने पूछा या न्यायालय ने छुपाया?
सवालों का पहाड़
अब इस पूरे घटनाक्रम ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं सबसे बड़ा सवाल यह है कि एक ही निर्माण को पहले अतिक्रमण कैसे माना गया? और बाद में वही निर्माण अतिक्रमण नहीं कैसे हो गया? क्या शुरुआती जांच गलत थी? या बाद में विभागीय रिपोर्ट बदलने से स्थिति बदल गई?
फाइलों का यू-टर्न
इस मामले को देखने वाले कई लोग इसे सरकारी फाइलों के यू-टर्न का उदाहरण बता रहे हैं,क्योंकि पहले आदेश में अतिक्रमण हटाने के निर्देश और बाद के आदेश में अतिक्रमण ही नहीं,अगर व्यंग्य में कहा जाए तो ऐसा लगता है जैसे नहर अपनी जगह से नहीं हटी,लेकिन कागजों में उसकी सीमा बदल गई।
तीनों दस्तावेज़ जल संसाधन विभाग,बैकुंठपुर (जिला कोरिया,छत्तीसगढ़) के आधिकारिक पत्र हैं
पहला दस्तावेज़ (दिनांक 12/06/ 2023)- इस पत्र में लिखा है कि ग्राम भांडी में भक्त माता कर्मा चौक का निर्माण किया गया है और जांच में पाया गया कि सिलफोडा जलाशय की माइनर नहर की जमीन पर 29X10 = 290 वर्गफुट में 7.5 फीट ऊंची कंक्रीट दीवार बनाकर निर्माण किया गया, बीच में कर्मा माता की मूर्ति स्थापित की गई, नहर की चौड़ाई 32 फीट बताई गई, इसलिए लिखा गया कि यह निर्माण नहर की सीमा के अंदर है, इस पत्र में साफ कहा गया कि अतिक्रमण है और NOC (अनापत्ति प्रमाण पत्र) नहीं दिया जा सकता।
दूसरा दस्तावेज़ (दिनांक 06/07/ 2023)- इस पत्र में लिखा है की निरीक्षण किया गया माइनर नहर की जमीन पर निर्माण किया गया है, इसलिए अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) से अतिक्रमण हटाने का अनुरोध किया गया,यह पत्र भी मानता है कि निर्माण नहर की जमीन पर है और हटाने की कार्रवाई होनी चाहिए।
तीसरा दस्तावेज़ (दिनांक 06/02/ 2026)- यह सबसे नया पत्र है,इसमें लिखा गया की ग्राम भांडी में कर्मा चौक बनाया गया है, उसके पीछे माइनर नहर गुजरती है, निर्माण से नहर को कोई नुकसान नहीं हुआ, कोई अतिक्रमण नहीं किया गया,विभाग को कोई आपत्ति नहीं,इस पत्र में पूरी तरह उल्टा लिखा गया — कि कोई अतिक्रमण नहीं है।
असली मामला क्या दिख रहा है,तीनों पत्रों को साथ देखें तो बड़ा विरोधाभास दिखता हैः
साल विभाग का बयान
2023 नहर की जमीन पर अतिक्रमण
2023 अतिक्रमण हटाने की सिफारिश
2026 कोई अतिक्रमण नहीं
यानी पहले अवैध बताया गया, बाद में वैध बताया जा रहा है।
अंत में…
भांडी का भक्त माता कर्मा चौक आज भी उसी स्थान पर खड़ा है, नहर भी वहीं बह रही है और गांव का जीवन भी सामान्य है,लेकिन सरकारी दस्तावेजों में दर्ज इस पूरे घटनाक्रम ने यह जरूर दिखा दिया है कि प्रशासनिक व्यवस्था में एक ही मामले की कहानी समय के साथ बदल भी सकती है, कभी वह अतिक्रमण बन जाती है,और कभी अनापत्ति, और जब ऐसा होता है तो सवाल भी उतने ही बड़े खड़े हो जाते हैं।


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