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सोनहत (कोरिया)@सुरक्षा के दावे फेल,छात्रावास में छात्र ने लगाई फांसी…व्यवस्था कटघरे में…

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  • आदिवासी छात्रों का भविष्य या भ्रष्टाचार की फैक्ट्री? सोनहत की घटना से खुला राज
  • आदिवासी छात्रावास या मौत का अड्डा? सोनहत में छात्र की फांसी ने खोली व्यवस्था की पोल
  • छात्रावास में लटक गया सपना : आदिवासी छात्र की मौत ने उठाए बड़े सवाल
  • छात्रों के नाम पर पैसा,सुविधाओं में कटौती और अंत में मौत! सोनहत छात्रावास पर गंभीर सवाल
  • सपनों के घर में मौत : आदिवासी छात्रावास की हकीकत आई सामने
  • सुविधाओं की जगह सौदेबाजी? छात्रावास में सीटों से लेकर सुविधाओं तक ‘बोली’ का खेल
  • सरकारी योजना या गोरखधंधा? आदिवासी छात्रावास पर उठे तीखे सवाल

-राजन पाण्डेय-
सोनहत (कोरिया),16 मार्च 2026 (घटती-घटना)। कोरिया जिले के सोनहत विकासखंड में स्थित एक आदिवासी छात्रावास से सामने आई एक दर्दनाक घटना ने पूरे जिले को झकझोर कर रख दिया है, छात्रावास में रह रहे एक आदिवासी छात्र ने वहीं फांसी लगाकर अपनी जान दे दी, यह घटना केवल एक छात्र की मौत नहीं है,बल्कि उस पूरी व्यवस्था की सच्चाई को उजागर करती है जिसे आदिवासी छात्रों के भविष्य को संवारने के उद्देश्य से बनाया गया था।
जिस स्थान को शिक्षा, सुरक्षा और उज्जवल भविष्य का आधार माना जाता है,वहीं यदि एक छात्र को इतना मानसिक दबाव या असुरक्षा महसूस हो कि वह अपनी जीवनलीला समाप्त कर ले, तो यह केवल एक व्यक्तिगत त्रासदी नहीं बल्कि प्रशासनिक और संस्थागत विफलता का प्रतीक बन जाती है,सोनहत की इस घटना ने एक बार फिर आदिवासी छात्रावासों की कार्यप्रणाली, प्रशासनिक निगरानी, वित्तीय पारदर्शिता और छात्र सुरक्षा पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।
जिम्मेदारी तय करना क्यों मुश्किल हो जाता है?
ऐसे मामलों में अक्सर यह देखा गया है कि जब कोई बड़ी घटना सामने आती है तो निचले स्तर के कर्मचारियों पर कार्रवाई कर दी जाती है,लापरवाही,कर्तव्य में चूक या अन्य आरोप लगाकर अधीक्षक या अन्य कर्मचारियों को निलंबित कर दिया जाता है, लेकिन कई सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि छात्रावास व्यवस्था की खराब स्थिति के लिए केवल निचले कर्मचारी ही जिम्मेदार नहीं होते,ऊपर के स्तर पर बैठे अधिकारी,जिनकी जिम्मेदारी निरीक्षण और निगरानी की होती है,अक्सर कार्रवाई के दायरे से बाहर रह जाते हैं,इस कारण व्यवस्था में जवाबदेही का अभाव बना रहता है और समस्याएं बार-बार दोहराई जाती हैं।
सहायक आयुक्त के कार्यकाल पर भी उठ रहे सवाल
जिले में वर्तमान में कार्यरत सहायक आयुक्त के कार्यकाल को लेकर भी कई तरह की चर्चाएं सामने आ रही हैं,कई लोगों का कहना है कि इस दौरान छात्रावासों की स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ,कुछ मामलों में छात्रों को अपनी समस्याओं को लेकर मीडिया के सामने आने तक की नौबत आ गई, अब सोनहत की घटना ने इस पूरे मामले को और गंभीर बना दिया है,लोगों का मानना है कि यदि समय रहते व्यवस्था पर कड़ी निगरानी रखी जाती तो शायद ऐसी घटनाओं को रोका जा सकता था।
छात्र की मौत और परिजनों के आरोप
जिस छात्र ने छात्रावास में फांसी लगाई,उसके परिजनों ने छात्रावास के अधीक्षक और एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी पर गंभीर आरोप लगाए हैं,परिजनों का कहना है कि छात्र पर किसी मामले को लेकर दोनों का दबाव था और वह मानसिक रूप से परेशान था,बताया जाता है कि जिस चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी की रात्रिकालीन ड्यूटी थी, वह पहले भी छात्र सुरक्षा से जुड़े एक मामले में जेल जा चुका है और हाल ही में उस मामले से बरी हुआ है,ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि छात्र सुरक्षा से जुड़े विवादित व्यक्ति को फिर से ऐसी जिम्मेदारी क्यों दी गई।
निरीक्षण व्यवस्था : कागजों तक सीमित?
छात्रावासों की निगरानी के लिए कई स्तरों पर निरीक्षण की व्यवस्था बनाई गई है,इनमें शामिल हैं विकासखंड स्तर पर निरीक्षण, जिला स्तर पर निगरानी,राज्य स्तर पर समय-समय पर जांच लेकिन यदि इन सब व्यवस्थाओं के बावजूद छात्रावासों की स्थिति में सुधार नहीं होता,तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या निरीक्षण वास्तव में प्रभावी तरीके से किया जा रहा है या केवल कागजों में दर्ज होकर रह जाता है।
आदिवासी छात्रों का भविष्य दांव पर
आदिवासी छात्रावास केवल एक आवासीय व्यवस्था नहीं हैं,बल्कि हजारों आदिवासी छात्रों के भविष्य का आधार हैं,इन छात्रावासों में रहने वाले अधिकांश छात्र आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से आते हैं, उनके परिवारों की उम्मीदें इस बात पर टिकी होती हैं कि उनका बच्चा पढ़-लिखकर बेहतर जीवन हासिल करेगा,लेकिन यदि छात्रावासों में अव्यवस्था,भ्रष्टाचार और असुरक्षा का माहौल बना रहेगा तो यह केवल छात्रों के वर्तमान ही नहीं बल्कि उनके भविष्य को भी प्रभावित करेगा।
व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता
सोनहत की घटना ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आदिवासी छात्रावास व्यवस्था में व्यापक सुधार की आवश्यकता है,विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों का मानना है कि इसके लिए कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाए जाने चाहिए, छात्रावासों की नियमित और पारदर्शी जांच,छात्रों को मिलने वाली राशि का पारदर्शी उपयोग,भोजन और सुविधाओं की गुणवत्ता की स्वतंत्र निगरानी,छात्र सुरक्षा के लिए सख्त नियम,शिकायतों के त्वरित समाधान की व्यवस्था।
आखिर कब सुधरेगी व्यवस्था?
सोनहत की यह घटना केवल एक जिले की समस्या नहीं है,यह उन सभी जगहों के लिए चेतावनी है जहां छात्रावास व्यवस्था कागजों में तो मजबूत दिखाई देती है, लेकिन जमीनी स्तर पर कमजोर साबित होती है, अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह घटना भी कुछ दिनों की चर्चा बनकर रह जाएगी,या फिर इसके बाद वास्तव में व्यवस्था में सुधार की दिशा में गंभीर प्रयास किए जाएंगे, यदि समय रहते सुधार नहीं किए गए,तो आदिवासी छात्रावासों का उद्देश्य ही सवालों के घेरे में आ जाएगा,और तब यह कहना गलत नहीं होगा कि जिन छात्रावासों को आदिवासी छात्रों के सपनों को पंख देने के लिए बनाया गया था, वही कहीं उनके सपनों का सबसे बड़ा बोझ न बन जाए।
आदिवासी छात्रावास योजनाःउद्देश्य और वास्तविकता के बीच खाई
आदिवासी छात्रावास योजना को राज्य और केंद्र सरकार की एक महत्वपूर्ण सामाजिक योजना माना जाता है, इसका उद्देश्य दूरस्थ और वनांचल क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी छात्रों को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ना है, इन छात्रावासों के माध्यम से सरकार यह सुनिश्चित करना चाहती है कि आर्थिक रूप से कमजोर और दूरदराज के गांवों से आने वाले छात्र शिक्षा से वंचित न रहें,उन्हें सुरक्षित आवास,भोजन,पढ़ाई का वातावरण और आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं ताकि वे अपने जीवन को बेहतर दिशा दे सकें,लेकिन जमीनी स्तर पर कई जगहों की स्थिति इस उद्देश्य से बिल्कुल विपरीत दिखाई देती है,कई छात्रावासों में अव्यवस्था,लापरवाही और भ्रष्टाचार के आरोप लगातार सामने आते रहे हैं,सोनहत की घटना ने इस व्यवस्था के भीतर छिपे कई सवालों को फिर से उजागर कर दिया है।
प्रति छात्र मिलने वाली राशि में कथित बंदरबांट…
सूत्रों के अनुसार छात्रावास में रहने वाले प्रत्येक छात्र के लिए शासन द्वारा प्रतिमाह लगभग 1500 रुपये की राशि दी जाती है,यह राशि छात्रों के भोजन, नाश्ता,दूध, फल,स्वच्छता और अन्य आवश्यक सुविधाओं के लिए निर्धारित होती है,लेकिन आरोप है कि इस राशि का पूरा उपयोग छात्रों पर नहीं होता,सूत्र बताते हैं कि इस राशि का बड़ा हिस्सा ऊपर से नीचे तक आपसी तालमेल से बंट जाता है और छात्रों पर केवल औपचारिक खर्च किया जाता है,कई छात्रावासों में भोजन की गुणवत्ता और मात्रा को लेकर भी शिकायतें सामने आती रही हैं,छात्रों को पर्याप्त और पौष्टिक भोजन नहीं मिल पाने की शिकायतें भी समय-समय पर सामने आती हैं,स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि यदि प्रति छात्र मिलने वाली राशि का सही उपयोग किया जाए तो छात्रों को बेहतर भोजन और सुविधाएं मिल सकती हैं,लेकिन वर्तमान व्यवस्था में ऐसा होता हुआ कम ही दिखाई देता है।
अतिरिक्त सीटों के नाम पर कमाई का खेल
छात्रावासों में एक और बड़ा आरोप सामने आता है स्वीकृत सीटों से अधिक छात्रों को दर्ज करने का खेल,सूत्रों के अनुसार कई जगहों पर छात्रावास की क्षमता से अधिक छात्रों को दर्ज किया जाता है,इसके लिए अंदरखाने बोली लगने की भी चर्चा होती है,बताया जाता है कि जो व्यक्ति अधिक बोली लगाने को तैयार होता है, उसे अतिरिक्त छात्रों को रखने का अवसर मिल जाता है,इसके बाद इन अतिरिक्त छात्रों के नाम पर मिलने वाली सुविधाओं और राशि का उपयोग भी कथित तौर पर कमाई के साधन के रूप में किया जाता है,कुछ मामलों में अभिभावकों से भी पैसे लेने की बात सामने आती है,जब तक छात्र की सीट की औपचारिक स्वीकृति नहीं मिलती,तब तक अभिभावकों से खुराकी या अन्य मदों के नाम पर राशि ली जाती है,यह स्थिति उन गरीब आदिवासी परिवारों के लिए और भी कठिन हो जाती है जो अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए पहले ही आर्थिक संघर्ष कर रहे होते हैं।
चयन प्रक्रिया भी सवालों के घेरे में…
छात्रावासों में छात्रों के चयन के लिए एक चयन समिति बनाई जाती है, इस समिति की बैठक में छात्रों का चयन किया जाना चाहिए,लेकिन सूत्रों का कहना है कि कई मामलों में यह प्रक्रिया केवल औपचारिकता बनकर रह जाती है,चयन पहले से तय होता है और समिति की बैठक केवल कागजी खानापूर्ति के रूप में की जाती है,कुछ मामलों में यह भी आरोप है कि चयन समिति की बैठक जानबूझकर देर से आयोजित की जाती है ताकि अतिरिक्त छात्रों के नाम पर वसूली का खेल जारी रह सके,इस कारण पूरी चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर भी सवाल उठते रहे हैं।
हर साल सामने आती हैं छात्रावास से जुड़ी घटनाएं
कोरिया जिले के छात्रावासों का यदि रिकॉर्ड देखा जाए तो लगभग हर वर्ष किसी न किसी छात्रावास से विवाद, अव्यवस्था या लापरवाही से जुड़ी खबर सामने आती रही है,कभी भोजन व्यवस्था को लेकर विवाद सामने आते हैं,तो कभी छात्रों की सुरक्षा और अनुशासन को लेकर शिकायतें होती हैं, कई बार छात्र स्वयं मीडिया या सामाजिक संगठनों के माध्यम से अपनी समस्याओं को सामने लाते हैं, इसके बावजूद व्यवस्था में ठोस सुधार देखने को नहीं मिलता,कई जानकार इसे प्रशासनिक उदासीनता और जवाबदेही की कमी का परिणाम मानते हैं।


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