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अंबिकापुर/सूरजपुर@दो महीने,दर्जनों खुलासे…फिर भी जिम्मेदार गायब! सूरजपुर धान घोटाले की पूरी कहानी

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  • धान घोटाले का सचः जनवरी-फरवरी में खुलती रहीं परतें,जिम्मेदार अब भी सुरक्षित
  • कागजों में धान,गोदाम में सवाल! दो महीने की रिपोर्टिंग से हिला सिस्टम
  • 11 करोड़ का धान खेल : खुलासे पर खुलासे,लेकिन कार्रवाई अब भी अधूरी
  • धान खरीदी का ‘महाखेल’: खबरें छपीं, जांच हुई…लेकिन जिम्मेदारी तय नहीं
  • घोटाले की टाइमलाइन : 65 हजार क्विंटल से 11 करोड़ तक,कैसे खुलता गया राज
  • सूरजपुर धान घोटालाः मीडिया ने निभाई जिम्मेदारी,सिस्टम अब भी चुप
  • धान खरीदी का सच : रिकॉर्ड कुछ और,हकीकत कुछ और
  • दो महीने की इन्वेस्टिगेशन : धान घोटाले की परतें खुलीं,पर दोषी अब भी पर्दे में…
  • धान खरीदी केंद्र से करोड़ों के खेल तक : खुलासों ने उठाए बड़े सवाल
  • धान घोटाले की पूरी कहानी : दो महीने तक खुलती रहीं परतें, लेकिन जिम्मेदार अब भी बेपरवाह

ओंकार पाण्डेय
अंबिकापुर/सूरजपुर 15 मार्च 2026 (घटती-घटना)। लोकतंत्र में मीडिया को चौथा स्तंभ कहा जाता है,इसका काम केवल खबर छापना नहीं बल्कि सत्ता और व्यवस्था से जवाब मांगना भी है, सूरजपुर जिले में धान खरीदी केंद्रों में सामने आए कथित घोटाले के मामले में जनवरी और फरवरी 2026 के दौरान जो कुछ हुआ, वह पत्रकारिता और प्रशासनिक जवाबदेही दोनों की एक बड़ी परीक्षा बन गया। इन दो महीनों के दौरान दैनिक ‘घटती-घटना’ ने लगातार कई खबरें प्रकाशित कीं, जिनमें धान खरीदी व्यवस्था में गंभीर अनियमितताओं,हजारों क्विंटल धान की कमी, रिकॉर्ड और वास्तविक स्टॉक के अंतर,डिजिटल सिस्टम में गड़बड़ी और जांच के बावजूद कार्रवाई में ढिलाई जैसे मुद्दे सामने आए, इन खबरों की श्रृंखला ने पूरे जिले में हलचल मचा दी,लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या इतने बड़े खुलासों के बाद भी जिम्मेदारी तय हो पाई? सूरजपुर जिले का धान खरीदी मामला केवल एक प्रशासनिक विवाद नहीं बल्कि जवाबदेही की बड़ी परीक्षा बन चुका है, दो महीने तक लगातार खबरें प्रकाशित हुईं, कई तथ्य सामने आए और समाज में चर्चा भी हुई, अब यह प्रशासन और व्यवस्था पर निर्भर है कि वह इन सवालों का जवाब दे और दोषियों पर कार्रवाई करे, क्योंकि लोकतंत्र में सवाल पूछना मीडिया का काम है और जवाब देना व्यवस्था की जिम्मेदारी।
पहला खुलासा : 7 जनवरी 2026
जनवरी की शुरुआत में प्रकाशित खबर ने पूरे मामले को सामने लाया,रिपोर्ट में कहा गया कि शिवप्रसादनगर धान खरीदी केंद्र में कागजों में 65 हजार क्विंटल धान दर्ज है,लेकिन वास्तविक स्थिति को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं,इस खबर के सामने आने के बाद पहली बार लोगों को संदेह हुआ कि धान खरीदी व्यवस्था में कुछ बड़ा गड़बड़झाला हो सकता है।
दूसरी कड़ी : 10 जनवरी 2026
तीन दिन बाद प्रकाशित रिपोर्ट ने मामले को और गंभीर बना दिया,इस खबर में आरोप लगाया गया कि शिवप्रसादनगर धान खरीदी केंद्र में एक ‘तिकड़ी’ की भूमिका सामने आ रही है और पूरे सिस्टम में मिलीभगत की आशंका जताई गई,इस रिपोर्ट के बाद प्रशासनिक हलकों में हलचल बढ़ गई और जांच की मांग तेज हो गई।
तीसरी रिपोर्ट 12 जनवरी 2026
इस रिपोर्ट में सवाल उठाया गया—‘जांच के बाद भी चुप्पी क्यों?’ रिपोर्ट में बताया गया कि हजारों बोरी धान की कमी सामने आने के बावजूद प्रशासन की ओर से ठोस कार्रवाई दिखाई नहीं दे रही है,यही वह मोड़ था जहां से यह मामला केवल एक खरीदी केंद्र की गड़बड़ी से आगे बढ़कर प्रशासनिक जवाबदेही का मुद्दा बन गया।
15 जनवरी 2026ः बड़ा आंकड़ा सामने
इस दिन प्रकाशित रिपोर्ट ने पूरे मामले को और बड़ा बना दिया,रिपोर्ट में कहा गया कि सूरजपुर जिले में धान खरीदी से जुड़े मामले में 52,908 बोरियों का अंतर सामने आया है और करीब 6.56 करोड़ रुपये के नुकसान की आशंका जताई गई है,यह आंकड़ा सामने आते ही यह मामला केवल स्थानीय विवाद नहीं बल्कि एक बड़े आर्थिक घोटाले के रूप में देखा जाने लगा।
17 जनवरी 2026ः जिम्मेदारी पर सवाल
एक और रिपोर्ट में यह कहा गया कि जांच में कमी पकड़ने के बावजूद वही लोग जिम्मेदार पदों पर बने हुए हैं, इस खबर में यह सवाल उठाया गया कि यदि जांच में गड़बड़ी सामने आई है तो जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई क्यों नहीं हो रही।
18 जनवरी 2026ः खबर का असर
लगातार प्रकाशित खबरों के बाद प्रशासन हरकत में आया,रिपोर्ट के अनुसार धान खरीदी केंद्रों में अनियमितताओं को लेकर नोटिस जारी किए गए और जांच प्रक्रिया तेज करने की बात कही गई,हालांकि लोगों का कहना था कि यह कार्रवाई अभी भी पर्याप्त नहीं है।
23 जनवरी 2026ः 11 करोड़ का मामला
जनवरी के अंत में प्रकाशित रिपोर्ट में दावा किया गया कि सूरजपुर जिले में धान खरीदी से जुड़े घोटाले का आंकड़ा 11 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है,इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि कई खरीदी केंद्रों में हजारों क्विंटल धान का अंतर सामने आया है।
25 जनवरी 2026ः जमीन और संपत्ति का मामला
इस रिपोर्ट में एक और नया पहलू सामने आया, घोटाले से जुड़े लोगों के नाम पर 7.7 एकड़ जमीन सामने आने की चर्चा हुई, इस खबर ने मामले को और गंभीर बना दिया क्योंकि अब यह केवल धान खरीदी का मामला नहीं बल्कि संभावित आर्थिक नेटवर्क की ओर भी इशारा कर रहा था।
28 जनवरी 2026ः सबसे बड़ा सवाल
जनवरी के अंतिम सप्ताह में प्रकाशित रिपोर्ट में पूछा गया— ‘13 हजार बोरियां कैसे गायब हुई और फिर कैसे पूरी हो गई?’ इस खबर में दो अलग-अलग जांच और उनके अलग-अलग निष्कर्षों को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए।
फरवरी 2026ः जांच पर सवाल और तेज
जनवरी के बाद फरवरी में भी इस मामले पर लगातार खबरें प्रकाशित होती रहीं।
02 फरवरी 2026 इस दिन प्रकाशित रिपोर्ट में सवाल उठाया गया
‘धान नहीं…घोटाला बोला गया?’ रिपोर्ट में कहा गया कि जांच के बावजूद कई सवालों के जवाब अभी तक सामने नहीं आए हैं।
06 फरवरी 2026 इस रिपोर्ट का शीर्षक था…
‘मगरमच्छ वाला घोटाला,कछुए वाली जांच’ इसमें जांच प्रक्रिया की धीमी गति और प्रशासनिक उदासीनता पर व्यंग्य किया गया।
07 फरवरी 2026
इस दिन प्रकाशित रिपोर्ट में प्रशासनिक व्यवस्था पर तीखा सवाल उठाया गया और कहा गया ‘खजाना जाए भाड़ में… पर घोटालेबाज सुरक्षित रहें’ यह रिपोर्ट सिस्टम की जवाबदेही पर बड़ा सवाल बनकर सामने आई।
09 फरवरी 2026 इस रिपोर्ट में कहा गया…
‘घोटाले,एफआईआर और वही जिम्मेदारी’ यानी घोटाले की चर्चा, जांच और एफआईआर की बात तो हो रही है लेकिन जिम्मेदारी तय नहीं हो रही।
10 फरवरी 2026
फरवरी की इस रिपोर्ट में तकनीकी सिस्टम पर सवाल उठाए गए, शीर्षक था— ‘शून्य का जादू या सिस्टम का खेल?’ इसमें डिजिटल रिकॉर्ड, एआई कैमरा और वास्तविक स्टॉक के बीच अंतर को लेकर संदेह जताया गया।
दो महीने की रिपोर्टिंग से निकले बड़े संकेत,जनवरी और फरवरी की सभी खबरों को जोड़कर देखें तो कुछ महत्वपूर्ण संकेत सामने आते हैं…

  1. रिकॉर्ड और वास्तविक स्टॉक में अंतर- कई रिपोर्टों में यह सवाल उठाया गया कि रिकॉर्ड में दर्ज धान और वास्तविक भंडारण में अंतर क्यों दिख रहा है।
  2. जांच की धीमी प्रक्रिया- लगातार रिपोर्टों में जांच की गति पर सवाल उठाए गए।
  3. तकनीकी सिस्टम की भूमिका- एआई कैमरा, डिजिटल रिकॉर्ड और एसओपी के पालन को लेकर भी सवाल सामने आए।
  4. प्रशासनिक जवाबदेही- सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि गड़बड़ी सामने आई है तो जिम्मेदारी किसकी है।
    मीडिया ने निभाई जिम्मेदारी
    इन दो महीनों के दौरान दैनिक ‘घटती-घटना’ ने लगातार इस मुद्दे को उठाया और कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने लाए, यह पत्रकारिता की उस भूमिका का उदाहरण है जिसमें मीडिया व्यवस्था से सवाल पूछता है और समाज को सच बताने का प्रयास करता है।
    लेकिन जिम्मेदार कौन?
    अब सबसे बड़ा सवाल यही है इतनी खबरों,जांचों और चर्चाओं के बाद भी क्या जिम्मेदारी तय हुई? यदि नहीं,तो क्या यह मामला भी समय के साथ ठंडा पड़ जाएगा?

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