- गोल्डन बुक में नाम,लेकिन सड़क अब भी तंग—यही है विकास मॉडल,रिकॉर्ड में चमका कोरिया,जमीन पर विकास अब भी खोज में…
- जिले में 19 कलेक्टर,हर कार्यकाल में विकास की अपनी कहानी,रिकॉर्ड,मॉडल और पर्यटन की चमक के बीच बुनियादी जरूरतें अब भी प्रतीक्षा में…
- मुख्यमंत्री के दौरे के बाद सामने आई प्रशासनिक अव्यवस्था,सड़क चौड़ीकरण जैसे जरूरी विकास पर अब भी उम्मीदें अधूरी…
-रवि सिंह-
बैकुंठपुर,15 मार्च 2026 (घटती-घटना)। किसी भी जिले के विकास की कहानी अक्सर दो तरह की सोच के बीच चलती दिखाई देती है, पहली सोच वह होती है जिसमें प्रशासन का लक्ष्य जिले और जनता का वास्तविक विकास होता है, दूसरी सोच वह होती है जिसमें विकास के नाम पर कई चमकदार तस्वीरें जरूर बनती हैं,लेकिन उनके पीछे कभी-कभी व्यक्तिगत ख्याति,प्रशंसा और पदोन्नति की संभावनाएं भी झलकने लगती हैं।
जब कोई कलेक्टर किसी जिले में पदस्थ होता है और उसके कार्यकाल में लगातार विकास की खबरें सामने आती हैं तो यह स्वाभाविक है कि जनता उम्मीद करती है कि यह विकास जमीन पर भी उतना ही दिखाई देगा जितना रिपोर्टों और प्रस्तुतियों में दिखता है,कई बार ऐसा होता भी है, लेकिन कुछ मामलों में विकास की तस्वीरें इतनी चमकदार बन जाती हैं कि वास्तविकता की परछाई पीछे छूट जाती है, किसी भी जिले में जब कोई कलेक्टर पदस्थ होता है तो उसके कार्यकाल को लेकर आमतौर पर दो तरह की अवधारणाएं सामने आती हैं,पहली यह कि वह जिले के समग्र विकास के लिए नई सोच और योजनाओं के साथ काम कर रहा है,दूसरी यह कि कहीं विकास के नाम पर दिखाई जा रही गतिविधियां व्यक्तिगत ख्याति, प्रशंसा और पदोन्नति की सीढ़ी तो नहीं बन रही हैं, दरअसल किसी भी प्रशासनिक अधिकारी के कार्यकाल को लेकर यही दो तस्वीरें अक्सर चर्चा में रहती हैं,एक जमीनी विकास की,और दूसरी दिखाए जा रहे विकास की, कई बार दोनों के बीच की दूरी इतनी कम होती है कि फर्क समझना मुश्किल हो जाता है,और कई बार यह दूरी इतनी ज्यादा होती है कि सवाल अपने आप खड़े होने लगते हैं।
5 प्रतिशत मॉडल और किसानों की उलझन
इसके बाद जिले में 5 प्रतिशत मॉडल की चर्चा तेज हुई,किसानों से अपील की गई कि वे अपनी कृषि भूमि का पांच प्रतिशत हिस्सा जल संरक्षण के लिए छोड़ दें,कुछ किसानों ने इसे अपनाया भी,लेकिन कई ग्रामीणों में यह भ्रम फैल गया कि कहीं उनकी जमीन का यह हिस्सा शासकीय नियंत्रण में न चला जाए, योजना का उद्देश्य सकारात्मक था,लेकिन इसकी जानकारी और विश्वास की कमी ने इसे अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ने दिया।
झुमका पर्यटन स्थल की चमक फीकी
कोरिया जिले के पर्यटन की पहचान के रूप में प्रस्तुत किया गया झुमका क्षेत्र भी चर्चा में रहा, यहां वोट क्लब और अन्य सुविधाओं को विकसित कर इसे पर्यटन केंद्र बनाने की कोशिश की गई, मुख्यमंत्री ने भी यहां बोटिंग की,जिससे यह स्थान चर्चा में आया,लेकिन अगले ही दिन जब पर्यटक पहुंचे तो उन्हें अंधेरा,अधूरी व्यवस्था और अव्यवस्था का सामना करना पड़ा,सोशल मीडिया पर पर्यटकों ने अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए लिखा कि अव्यवस्था देखने के लिए पार्किंग शुल्क देना उन्हें मंजूर नहीं।
ओपन थिएटर की उपलब्धि भी सवालों में
झुमका क्षेत्र में बनाए गए ओपन थिएटर को एक नई उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया गया था,लेकिन जब आसपास की सुविधाएं ही अधूरी दिखाई दीं तो यह उपलब्धि भी आलोचना का कारण बन गई, जिस स्थल को कोरिया जिले के पर्यटन का गौरव बताया जा रहा था,वहीं की अव्यवस्थाओं ने प्रशासन की छवि पर सवाल खड़े कर दिए।
विकास की असली पहचान क्या है…
कोरिया जिले में विकास की बातें आज भी जारी हैं, रिकॉर्ड बन रहे हैं,मॉडल तैयार हो रहे हैं और योजनाओं की घोषणाएं भी हो रही हैं,लेकिन अब लोगों के मन में एक सवाल गहराता जा रहा है, क्या विकास का मतलब रिकॉर्ड बनाना है या वह बदलाव जो आम लोगों की जिंदगी को आसान बना दे? क्योंकि इतिहास में वही विकास याद रखा जाता है जो लोगों के जीवन में दिखाई देता है,न कि वह जो केवल रिपोर्टों और प्रस्तुतियों में चमकता है।
जब विकास की तस्वीर ही धराशाई हो गई…
स्थिति उस समय और अजीब हो गई जब एक विकास कार्य की तस्वीर ही जमीन पर धराशाई हो गई, जिस विकास को प्रशासन अपनी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत कर रहा था वही अचानक विवाद का कारण बन गया, मामले में एक अधिकारी पर जिम्मेदारी तय कर कार्रवाई कर दी गई, लेकिन इससे प्रशासन की छवि में सुधार की बजाय यह चर्चा अधिक होने लगी कि कहीं न कहीं जल्दबाजी और दिखावे की प्रवृत्ति भी विकास की गति को प्रभावित कर रही है।
जिले को जिस विकास की जरूरत,वही सूची से बाहर
कोरिया जिले में विकास की चर्चा लगातार हो रही है,लेकिन जिला मुख्यालय बैकुंठपुर के लोगों के मन में एक सवाल बार-बार उठता है, शहर की मुख्य सड़क का चौड़ीकरण आखिर कब होगा? यह सिर्फ यातायात का मुद्दा नहीं बल्कि शहर की भविष्य की जरूरत है, लेकिन यह विषय अब तक विकास की प्राथमिक सूची में प्रमुखता से दिखाई नहीं देता।
सूरजपुर की याद क्यों आती है…
जिला मुख्यालय के लोग अक्सर सूरजपुर के एक पूर्व कलेक्टर को याद करते हैं जिन्होंने सड़क चौड़ीकरण को लेकर बड़ा निर्णय लिया था,विरोध हुआ,आलोचना हुई,लेकिन उन्होंने शहर की संरचना बदलने का जोखिम उठाया,लोगों का मानना है कि उस निर्णय में व्यक्तिगत उपलब्धि से ज्यादा शहर के भविष्य की चिंता थी।
रिकॉर्ड की दौड़ और सोखता गड्ढों की कहानी
वर्तमान कार्यकाल में सबसे ज्यादा चर्चा जिस उपलब्धि की हुई वह थी एक दिन में बड़ी संख्या में सोखता गड्ढों का निर्माण,जिसके कारण जिले का नाम गोल्डन बुक ऑफ रिकॉर्ड में दर्ज हुआ,यह उपलब्धि निश्चित रूप से प्रशासनिक दृष्टि से बड़ी मानी गई। लेकिन लोगों के बीच यह चर्चा भी चली कि यदि इसी ऊर्जा और संसाधन का उपयोग बुनियादी ढांचे में होता तो उसका प्रभाव और व्यापक दिखाई देता, व्यंग्य में कई लोग यह भी कहते नजर आए कि कोरिया में अब विकास की माप सड़क से नहीं, रिकॉर्ड से होने लगी है।
19 कलेक्टर और विकास की परंपरा
कोरिया जिले की बात करें तो यहां अब तक 19 कलेक्टर अपनी सेवाएं दे चुके हैं,यह भी सच है कि जिले का विकास कभी पूरी तरह रुका नहीं,हर कलेक्टर अपने साथ कुछ नए विचार, कुछ नए प्रयोग और कुछ प्रशासनिक पहल लेकर आया,किसी ने शिक्षा पर ध्यान दिया,किसी ने सड़क और भवन निर्माण को प्राथमिकता दी, तो किसी ने प्रशासनिक व्यवस्था को मजबूत करने की कोशिश की,कई कलेक्टरों के कार्यकाल को आज भी लोग याद करते हैं क्योंकि उनके निर्णयों का असर सीधे जनता के जीवन में दिखाई देता था,लेकिन समय के साथ विकास की परिभाषा भी बदलती दिखाई दी, अब कई बार विकास का मतलब रिकॉर्ड,मॉडल और प्रस्तुतियों की चमक से भी जोड़ा जाने लगा।
वर्तमान कार्यकाल और विकास की चमकदार तस्वीरें
वर्तमान कलेक्टर के कार्यकाल में भी जिले में विकास की कई तस्वीरें सामने आई हैं,प्रशासनिक स्तर पर यह कहा जा रहा है कि जिले में कई ऐसे कार्य हुए हैं जो पहले कभी नहीं हुए, ऐसा माहौल बनाया गया है मानो जिले में विकास की गंगा-जमुना बह रही हो,लेकिन इसी के साथ यह सवाल भी उठने लगा है कि क्या इन तस्वीरों में पूरी सच्चाई भी मौजूद है या फिर कुछ तस्वीरें केवल प्रस्तुति की कला का हिस्सा बनकर रह गई हैं।
मुख्यमंत्री का दौरा और प्रशासनिक समन्वय की परीक्षा
हाल ही में मुख्यमंत्री का दो दिवसीय प्रवास कोरिया जिले में हुआ,किसी भी जिले में मुख्यमंत्री का दौरा प्रशासनिक क्षमता और समन्वय की परीक्षा माना जाता है, लेकिन इस दौरे के दौरान और उसके बाद कुछ ऐसी घटनाएं सामने आईं जिन्होंने प्रशासनिक व्यवस्थाओं की स्थिति पर सवाल खड़े कर दिए, देर रात विश्रामगृह से शुरू हुई अव्यवस्था की चर्चा धीरे-धीरे पूरे प्रशासनिक ढांचे तक पहुंच गई, कहीं ठहराव को लेकर विवाद हुआ,कहीं जनप्रतिनिधियों ने सम्मान को लेकर नाराजगी जताई,इन घटनाओं ने यह संकेत जरूर दिया कि विकास की चमकदार तस्वीरों के पीछे प्रशासनिक समन्वय की तस्वीर उतनी मजबूत नहीं दिख रही।
अंत में…
कोरिया जिले का विकास होना बेहद जरूरी है और यह स्वागत योग्य भी है, लेकिन विकास की असली पहचान वही होती है जो जमीन पर दिखाई दे और लंबे समय तक टिके,अगर विकास की तस्वीरें केवल प्रस्तुतियों,कार्यक्रमों और रिपोर्टों तक सीमित रह जाएं तो वह विकास नहीं बल्कि प्रशासनिक प्रदर्शन बनकर रह जाता है,अब देखना यह है कि कोरिया जिले में दिखाई जा रही विकास की यह चमक वास्तविक परिवर्तन की कहानी बनेगी, या फिर यह केवल प्रशासनिक उपलब्धियों की सूची में दर्ज एक और अध्याय बनकर रह जाएगी,क्योंकि अंततः जनता की नजर में वही विकास सच्चा होता है जो दिखे भी और टिके भी।
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