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सोनहत (कोरिया)@जमीन गई,न्याय भी गया!तहसील में मिला सिर्फ एक ही नुस्खा- ‘कोर्ट जाइए’

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सोनहत में जमीन विवाद…पीडि़त महिला भटकती रही,तहसील में चलता रहा ‘समझौते का न्याय’
जमीन, जालसाजी और जनतंत्र का जाल में कैसे एक गरीब महिला की पुश्तैनी जमीन कागज़ों में गायब हो गई?
महिला की पुश्तैनी जमीन हड़पी, तहसीलदार का फार्मूला – जमीन नहीं तो पैसे ले लो!
सोनहत तहसील में न्याय नहीं ‘समझौता सेवा’! जमीन हड़पने वालों को खुली छूट?
जमीन हड़पने वालों पर मेहरबानी, पीड़ित महिला को सलाह – कोर्ट के चक्कर लगाइए
फर्जी नामांतरण पर खामोशी, तहसीलदार की सलाह – “हम कुछ नहीं कर सकते”
जमीन हड़पने वालों का ‘राजस्व कवच’? पीड़ित महिला को मिला सिर्फ अदालत का रास्ता
सोनहत में जमीन का खेल, कागज़ बदले, मालिक बदला… न्याय अभी भी लापता


-राजन पाण्डेय-
सोनहत (कोरिया), मार्च 2026(घटती-घटना)। कहते हैं कि तहसील न्याय का पहला दरवाजा होती है, लेकिन सोनहत तहसील में एक महिला के मामले में ऐसा लगता है कि यह दरवाजा न्याय से ज्यादा सलाह केंद्र बन गया है,जहाँ समाधान कम और कोर्ट जाइए का रास्ता ज्यादा बताया जाता है, छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले के सोनहत क्षेत्र से एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने राजस्व तंत्र,जमीन रजिस्ट्री व्यवस्था और प्रशासनिक पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, आरोप है कि एक गरीब ग्रामीण महिला की पुश्तैनी जमीन को पहले राजस्व रिकॉर्ड में हेरफेर कर फर्जी तरीके से नामांतरण कराया गया और बाद में उसे बेचने की तैयारी भी कर ली गई,दस्तावेज़ों और शिकायत पत्रों से सामने आई जानकारी बताती है कि यह पूरा मामला खसरा नंबर 62, 73 और 201 की लगभग 2.93 हेक्टेयर जमीन से जुड़ा है,इस जमीन को लेकर आवेदिका बसंती ने प्रशासन और पुलिस के सामने गंभीर आरोप लगाए हैं कि उसकी जमीन को फर्जी दस्तावेजों के जरिए हड़प लिया गया,यह मामला सिर्फ एक जमीन का नहीं बल्कि उस व्यवस्था का भी आईना है,जिसमें गरीब और कम पढ़े-लिखे ग्रामीणों की जमीन अक्सर कागजों के खेल में गायब हो जाती है। ग्राम बिरौरीडांड़ की एक महिला की पुश्तैनी जमीन पहले कागज़ों में गायब हुई,फिर किसी और के नाम चढ़ गई और आखिर में बेच भी दी गई और जब महिला न्याय की उम्मीद लेकर तहसील पहुंची तो उसे जमीन वापस दिलाने की जगह समझौते का फार्मूला सुझाया गया,मामले के केंद्र में हैं सोनहत के तहसीलदार संजय राठौर,जिनकी कार्यशैली एक बार फिर सवालों के घेरे में है,सोनहत की इस कहानी में जमीन भी है, कागज़ भी हैं और कानून भी है,बस जो नहीं दिख रहा वह है—न्याय, एक ओर महिला अपनी जमीन के लिए दर-दर भटक रही है और दूसरी ओर प्रशासनिक फाइलें अपनी गति से चल रही हैं,अब देखना यह है कि यह मामला भी बाकी मामलों की तरह फाइलों की धूल में दब जाएगा या सच में किसी दिन न्याय की रोशनी देखेगा।
जमीन हड़पने की कहानी : मालिक ही गायब
यह पूरा मामला लगभग 2.93 हेक्टेयर पुश्तैनी जमीन से जुड़ा है, जो पीढि़यों से परिवार के नाम पर चली आ रही थी, लेकिन अचानक एक दिन कागज़ों में ऐसा खेल हुआ कि असली हकदार का नाम गायब हो गया और जमीन किसी और के नाम दर्ज हो गई, इतना ही नहीं,जमीन का सौदा भी कर दिया गया,अब सवाल यह है कि अगर जमीन किसी और की थी तो नामांतरण किस आधार पर हुआ? और अगर नामांतरण गलत हुआ तो उसे रोका क्यों नहीं गया? इन सवालों का जवाब अभी तक फाइलों में ही घूम रहा है।
जमीन की कहानी: पीढि़यों से चली आ रही विरासत
राजस्व रिकॉर्ड के अनुसार यह जमीन मूल रूप से नान्हू सिंह पुत्र माटोराम के नाम दर्ज थी, नान्हू सिंह की मृत्यु के बाद जमीन का फौती नामांतरण उनके परिवार के सदस्यों के नाम पर दर्ज हुआ, रिकॉर्ड के अनुसार परिवार की वंशावली इस प्रकार बताई जाती है, नान्हू सिंह पत्नी मानकुंवर,पुत्र बुद्ध,पुत्र सोमारसाय समय के साथ परिवार की कई पीढि़यां गुजर गईं,सोमारसाय की संतानों में बसंती और शांति का नाम सामने आता है,शांति की पुत्री सजनी और उसकी पुत्री नेहा कुमारी बताई जाती है। इसी रिश्ते के आधार पर आगे चलकर जमीन के नामांतरण और स्वामित्व को लेकर विवाद शुरू हुआ।
आरोप:कागजों में बदल गई जमीन की किस्मत
आवेदिका बसंती का आरोप है कि जमीन के मामले में फर्जीवाड़ा किया गया, शिकायत में कहा गया है कि नेहा कुमारी उसका पति बिजेंद्र कुमार और कथित बिचौलिया बैंकट गुप्ता ने मिलकर जमीन के राजस्व रिकॉर्ड में हेरफेर कराया,आवेदिका का आरोप है कि राजस्व दस्तावेजों में उसका नाम जानबूझकर छिपाया गया और बाद में जमीन का नामांतरण नेहा कुमारी के नाम कर दिया गया, इसके बाद कथित रूप से जमीन को बेचने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई,भारत में जमीन से जुड़े फर्जीवाड़ों में अक्सर जालसाजी और धोखाधड़ी की धाराएं लगाई जाती हैं,जिनमें भारतीय दंड संहिता की धारा 420,467,468 और 471 शामिल हैं। इन धाराओं में फर्जी दस्तावेज तैयार करना और धोखाधड़ी से संपत्ति हड़पना गंभीर अपराध माना जाता है।
शपथ पत्र में कबूलनामा?
मामले में एक महत्वपूर्ण दस्तावेज 23 दिसंबर 2024 का शपथ पत्र है, जिसमें नेहा कुमारी ने कई महत्वपूर्ण बातें स्वीकार की हैं, शपथ पत्र के अनुसार बसंती जीवित है और जमीन में उसका भी अधिकार हो सकता है, आवेदन और शपथ पत्र में बसंती का नाम दर्ज नहीं कराया गया, बाद में जमीन उसके नाम दर्ज हो गई, सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि शपथ पत्र में यह भी लिखा गया है कि यदि बसंती चाहे तो वह जमीन की बिक्री राशि का आधा हिस्सा देने को तैयार है, यह स्वीकारोक्ति पूरे मामले को और ज्यादा संदिग्ध बना देती है।
8 लाख 50 हजार में जमीन का सौदा
दस्तावेज़ों में उल्लेख है कि जमीन का सौदा लगभग 8 लाख 50 हजार रुपये में किया गया, बताया गया कि जमीन को,उदित नारायण,डाकेश्वर नारायण नामक व्यक्तियों को बेचा गया,हालांकि शपथ पत्र में यह भी लिखा गया है कि बिक्री के बाद भी नेहा कुमारी को अभी तक पूरा पैसा नहीं मिला है और कथित तौर पर कहा गया है कि बाद में भुगतान किया जाएगा।
प्रशासन के सामने शिकायतों की लंबी सूची
बसंती ने इस मामले में कई अधिकारियों को शिकायत भेजी है,जिनमें शामिल हैं,कलेक्टर कोरिया,अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) सोनहत, तहसीलदार सोनहत,थाना प्रभारी सोनहत,पुलिस अधीक्षक कोरिया,आईजी सरगुजा रेंज शिकायत में कहा गया है कि यदि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई तो जमीन पूरी तरह बेच दी जाएगी और उसे न्याय नहीं मिल पाएगा।
तहसील में न्याय नहीं,समझौते का प्रस्ताव
पीडि़त महिला जब तहसील कार्यालय पहुंची तो उसे उम्मीद थी कि तहसीलदार मामले की जांच करेंगे और अगर जमीन गलत तरीके से किसी और के नाम दर्ज हुई है तो उसे रोका जाएगा,लेकिन यहां कहानी ने अचानक मोड़ ले लिया, शिकायतकर्ता के अनुसार तहसीलदार ने कहा कि जमीन खरीदने वाले पक्ष से बात करके पैसे दिलवा दिए जाएंगे, यानी जमीन गई तो गई,कम से कम पैसे मिल जाएं,यह सुनकर ऐसा लगा मानो तहसील न्यायालय नहीं बल्कि जमीन सौदे का मध्यस्थ कार्यालय हो।
जब पैसे लेने पहुंची तो जवाब मिला
पैसे नहीं देंगे लेकिन असली नाटक तब हुआ जब महिला पैसे लेने के लिए जमीन खरीदने वाले लोगों के पास पहुंची, जवाब साफ था पैसे नहीं देंगे,अब सवाल यह उठता है कि जब पैसे देने से ही इनकार था तो तहसीलदार ने समझौते की सलाह किस भरोसे पर दी थी?
हम क्या कर सकते हैं,कोर्ट जाइए…
जब महिला दोबारा तहसील पहुंची तो उसे बताया गया कि अब कुछ नहीं हो सकता, तहसीलदार का कथित जवाब था, अब नामांतरण हो चुका है, रजिस्ट्री भी हो गई है,अगर निरस्त कराना है तो सिविल कोर्ट जाइए, हम कुछ नहीं कर सकते,यह सुनकर ग्रामीणों के बीच एक ही सवाल गूंज रहा है,अगर तहसील कुछ नहीं कर सकती तो फिर तहसील है किसलिए?
नियमों की नई व्याख्या
मामले में एक और दिलचस्प तर्क सामने आया,कहा गया कि रजिस्ट्री होने के बाद ऑनलाइन नामांतरण करना मजबूरी है, लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि जिस समय यह रजिस्ट्री हुई थी उस समय यह नियम लागू ही नहीं था, अब सवाल यह है कि जब नियम बाद में आया तो नामांतरण किस नियम के तहत किया गया? या फिर नियम भी परिस्थितियों के हिसाब से बदल जाते हैं?
तहसीलदार संजय राठौर फिर सुर्खियों में…
सोनहत के तहसीलदार संजय राठौर पहले भी चर्चा में रह चुके हैं, जब वे सूरजपुर जिले में पदस्थ थे तब भी जमीन से जुड़े विवादों में उनका नाम सामने आया था,अब सोनहत में भी जमीन विवाद के इस मामले ने एक बार फिर उन्हें चर्चा में ला दिया है,स्थानीय लोग कहते हैं कि उनकी कार्यशैली ऐसी है कि हर मामला आखिर में कोर्ट की ओर भेज दिया जाता है, यानी तहसील का रास्ता अक्सर अदालत की सीढि़यों पर खत्म होता है।
गरीब के लिए न्याय सबसे महंगा
कानून कहता है कि हर नागरिक को न्याय का अधिकार है, लेकिन जमीन विवाद में अदालत जाना किसी गरीब ग्रामीण के लिए आसान नहीं होता, सिविल कोर्ट में मुकदमा चलाना,लंबी प्रक्रिया,भारी खर्च,वर्षों का इंतजार इन सबके बीच अक्सर गरीब व्यक्ति हार मान लेता है, शायद यही वजह है कि जमीन से जुड़े फर्जीवाड़ों में गरीब लोग सबसे ज्यादा पीडि़त होते हैं।
न्यायालय में सुरक्षा की चर्चा
स्थानीय लोगों का कहना है कि तहसीलदार की कार्यशैली ऐसी है कि वे अपने न्यायालय में हमेशा सुरक्षा में रहते हैं, गांव में चर्चा है कि निर्दोषों को न्याय दिलाने के बजाय ऐसे मामलों में अक्सर वही लोग मजबूत दिखते हैं जिनकी जेब मजबूत होती है,लेकिन जमीन विवाद के इस मामले ने इन चर्चाओं को फिर से हवा दे दी है।
जमीन से बड़ा कोई सवाल नहीं…
ग्रामीण भारत में जमीन सिर्फ संपत्ति नहीं बल्कि जीवन का आधार होती है, जब वही जमीन कागज़ों में गायब हो जाए तो सवाल सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं बल्कि पूरी व्यवस्था का बन जाता है, सोनहत की इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या गरीब आदमी की जमीन सच में सुरक्षित है? या फिर वह सिर्फ फाइलों और रजिस्टरों की दया पर टिकी हुई है।
कागजों का खेल या साजिश?
कोरिया जिले का यह मामला बताता है कि जमीन का विवाद केवल परिवारों के बीच नहीं बल्कि व्यवस्था की कमजोरियों से भी पैदा होता है, एक ओर गरीब महिला न्याय के लिए दर-दर भटक रही है,दूसरी ओर दस्तावेज़ों में जमीन का मालिक बदल चुका है,अब देखना यह है कि प्रशासन इस मामले को साधारण विवाद मानकर टाल देता है या फिर जमीन जालसाजी के इस पूरे नेटवर्क की जांच करता है।
सवाल जो जवाब मांगते हैं..
जमीन का नामांतरण किन परिस्थितियों में हुआ?
क्या सभी वारिसों की जानकारी ली गई थी?
क्या राजस्व रिकॉर्ड में हेरफेर हुआ?
क्या प्रशासन ने निष्पक्ष जांच की? और सबसे बड़ा सवाल- क्या तहसील का काम न्याय देना है या लोगों को कोर्ट भेजना?


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