- मुखबिरों के भरोसे कार्रवाई : अवैध शराब पकड़ी…पर अफीम के खेत कैसे छूट गए?
- आबकारी के छापे तेज,लेकिन मिलावटी शराब पर ब्रेक क्यों?
- सरगुजा में मुखबिर सक्रिय…मगर अफीम और मिलावट पर रहस्यमयी चुप्पी…
- जहां कार्रवाई वहां चर्चा…जहां मिलावट वहां खामोशी — किसकी नजर चूक रही है?
- अवैध शराब पर सख्ती,लेकिन अफीम और मिलावट पर नरमी? सवालों में घिरा सिस्टम
-संवाददाता-
अंबिकापुर,12 मार्च 2026 (घटती-घटना)। सरगुजा संभाग में इन दिनों आबकारी विभाग के सहायक आबकारी अधिकारी रंजीत गुप्ता खूब चर्चा में हैं,वजह है उनकी लगातार कार्रवाई,अवैध शराब,नशीली दवाइयों और इंजेक्शनों के खिलाफ जिस तेजी से उन्होंने छापेमारी की है,उससे यह संदेश जरूर गया है कि कम से कम आबकारी विभाग का एक अधिकारी मैदान में सक्रिय दिखाई दे रहा है, कई मामलों में तो स्थिति इतनी दिलचस्प हो गई कि कार्रवाई पहले हो गई और बाद में पुलिस को इसकी सूचना दी गई, इससे एक नई बहस शुरू हो गई — क्या सरगुजा संभाग में आबकारी विभाग के मुखबिर पुलिस से ज्यादा तेज हो गए हैं?
मुखबिरों का नेटवर्क
या पुलिस की नींद?
सामान्य तौर पर यह माना जाता है कि किसी भी जिले में सबसे मजबूत खुफिया तंत्र पुलिस का होता है,थानों से लेकर जिले तक पुलिस के अपने मुखबिर होते हैं, जो छोटी से छोटी गतिविधि की खबर पहुंचाते रहते हैं, लेकिन सरगुजा संभाग में हाल के दिनों में तस्वीर कुछ अलग दिखी,अवैध शराब, नशीली दवाइयों और इंजेक्शनों के मामलों में कई बार कार्रवाई आबकारी विभाग के जरिए सामने आई,जबकि पुलिस को इसकी भनक भी बाद में लगी,यानी ऐसा लगने लगा कि इस बार मैदान में पुलिस के मुखबिर नहीं,बल्कि आबकारी विभाग के मुखबिर ज्यादा सक्रिय हो गए हैं।
अवैध शराब पर सख्ती,लेकिन दुकानों की मिलावट पर चुप्पी : इस पूरे मामले में एक और सवाल धीरे-धीरे सामने आ रहा है,अवैध शराब की छापेमारी हो रही है, तस्करी पकड़ी जा रही है,लेकिन सरकारी शराब दुकानों में होने वाली मिलावट पर कार्रवाई क्यों नहीं दिख रही? शराब दुकानों को लेकर अक्सर शिकायतें सामने आती रही हैं कि बोतलों में मिलावटी शराब बेची जा रही है या फिर गुणवत्ता से समझौता किया जा रहा है,लेकिन इन शिकायतों के बावजूद बड़े स्तर की कार्रवाई बहुत कम दिखाई देती है, क्या वहां तक मुखबिर नहीं पहुंचते? अब यहां सवाल फिर वही खड़ा होता है,अगर मुखबिर इतने सक्रिय हैं कि अवैध शराब की खबर तुरंत पहुंच जाती है,तो शराब दुकानों में होने वाली संभावित मिलावट की जानकारी उन तक क्यों नहीं पहुंचती? या फिर यह वह इलाका है जहां मुखबिरों की भी हिम्मत जवाब दे देती है?
संरक्षण की चर्चा भी शुरू
जब किसी मामले में शिकायतें लगातार हों और कार्रवाई कम दिखाई दे,तो स्वाभाविक रूप से लोगों के मन में यह शंका भी पैदा होती है कि कहीं न कहीं संरक्षण का खेल तो नहीं चल रहा,हालांकि यह केवल चर्चा का विषय है,लेकिन सवाल इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि शराब दुकानों का संचालन एक बड़ा आर्थिक तंत्र होता है। ऐसे में यदि वहां मिलावट की आशंका हो और उस पर कार्रवाई न दिखे,तो लोगों के मन में संदेह पैदा होना स्वाभाविक है।
सरगुजा में दो तस्वीरें
इस समय सरगुजा संभाग में दो तस्वीरें साथ-साथ दिखाई दे रही हैं एक तरफ अवैध शराब और नशीली दवाइयों पर तेज कार्रवाई, दूसरी तरफ अफीम की खेती और शराब दुकानों की मिलावट जैसे सवाल एक तरफ मुखबिरों की तेजी की चर्चा है,दूसरी तरफ कुछ मामलों में उनकी चुप्पी भी उतनी ही रहस्यमयी लग रही है,रंजीत गुप्ता की कार्रवाई ने यह जरूर दिखाया है कि यदि इच्छाशक्ति हो तो अवैध कारोबार पर चोट की जा सकती है। लेकिन इसके साथ यह सवाल भी उतना ही जरूरी है कि कानून की नजर हर जगह बराबर पहुंचे, क्योंकि आखिरकार जनता के मन में अब यही सवाल घूम रहा है क्या मुखबिर सिर्फ अवैध शराब तक ही खबर पहुंचाते हैं, या फिर अफीम के खेत और शराब दुकानों की मिलावट अभी भी उनकी नजर से दूर हैं?
एक राज्य से दूसरे राज्य तक फैला खेल
सरगुजा संभाग की भौगोलिक स्थिति भी इस पूरे मामले को दिलचस्प बनाती है। यह इलाका कई राज्यों की सीमाओं से लगा हुआ है,ऐसे में नशीली दवाइयों और अवैध शराब का कारोबार अक्सर एक राज्य से दूसरे राज्य तक फैले नेटवर्क के जरिए चलता है,बताया जाता है कि कई मामलों में पकड़े गए इंजेक्शन और दवाइयां दूसरे राज्यों से यहां लाई जा रही थीं। इस पर रंजीत गुप्ता की टीम ने लगातार कार्रवाई की,इससे अवैध कारोबारियों में हलचल मची और आबकारी विभाग की सक्रियता की चर्चा भी तेज हो गई।
लेकिन मुखबिर बलरामपुर में क्यों सो गए?
अब कहानी का दूसरा हिस्सा भी कम दिलचस्प नहीं है,जिस अधिकारी के मुखबिर इतने तेज बताए जा रहे हैं कि अवैध शराब और नशीली दवाइयों की खबर तुरंत पहुंच जाती है,उसी अधिकारी के गृह जिले बलरामपुर में अफीम की खेती पकड़ी गई,अफीम की खेती कोई घर की खिड़की पर उगने वाला पौधा नहीं है,यह खेतों में होती है,महीनों तक बढ़ती है और फिर उससे नशीला पदार्थ निकाला जाता है,ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है,अगर मुखबिर इतने मजबूत हैं तो अफीम की खेती की खबर उन तक क्यों नहीं पहुंची? क्या मुखबिरों की नजर अवैध शराब तक तो पहुंच रही थी,लेकिन अफीम के खेतों तक नहीं?
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