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कोरिया@टाइगर रिजर्व में प्यासा विकास: करोड़ों के डैम सूखे, वन्यजीव बूंद-बूंद को तरसे

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  • करोड़ों का जल संरक्षण ‘कागजों में’,जंगल में सूखे तालाब और डैम
  • वन्यजीवों के नाम पर बजट का खेल? मार्च में ही दम तोड़ते करोड़ों के जलस्रोत
  • जंगल में पानी नहीं,पर खर्च करोड़ों – गुरु घासीदास पार्क में बड़ा सवाल
  • कागजों में तालाब लबालब,जमीन पर सूखा गड्ढा – टाइगर प्रोजेक्ट पर उठे सवाल
  • भ्रष्टाचार की प्यास में सूखे जलस्रोत : वन्यजीवों की जिंदगी से खिलवाड़
  • सफेद हाथी बने करोड़ों के स्टॉप डैम : मार्च में ही 20 लीटर पानी को तरस रहे 20 लाख के ढांचे
  • टाइगर रिजर्व के नाम पर करोड़ों की बर्बादी,सूखे तालाबों से प्यासे वन्यजीव बस्तियों की ओर

-राजन पाण्डेय-
कोरिया,11 मार्च 2026 (घटती-घटना)। यदि सरकारी योजनाओं की जमीनी हकीकत और विकास के नाम पर बजट के दुरुपयोग की तस्वीर देखनी हो तो गुरु घासीदास नेशनल पार्क का दौरा काफी है, कागजों में जल संरक्षण और वन्यजीव संरक्षण के बड़े-बड़े दावे करने वाले इस क्षेत्र में वास्तविकता इसके बिल्कुल विपरीत नजर आ रही है। करोड़ों रुपये खर्च कर बनाए गए तालाब और स्टॉप डैम आज सूखे पड़े हैं और वन्यजीव बूंद-बूंद पानी के लिए भटक रहे हैं,टाइगर प्रोजेक्ट की सफलता और वन्यजीव संरक्षण के नाम पर बनाए गए ये जलस्रोत अब सफेद हाथी बनकर खड़े हैं, हैरानी की बात यह है कि लगभग 20 से 25 लाख रुपये की लागत से बने कई स्टॉप डैम में मार्च की शुरुआत में ही 20 लीटर पानी भी जमा नहीं है, यह स्थिति न केवल सरकारी धन की बर्बादी को दर्शाती है बल्कि वन्यजीवों के अस्तित्व और उनके प्राकृतिक आवास पर भी गंभीर सवाल खड़े कर रही है, गुरु घासीदास नेशनल पार्क में जल संरक्षण के नाम पर किए गए निर्माण आज भ्रष्टाचार और लापरवाही की कहानी बयां कर रहे हैं, यदि समय रहते इन निर्माणों की जांच नहीं हुई और जल प्रबंधन की ठोस योजना नहीं बनाई गई, तो आने वाले दिनों में वन्यजीवों के लिए पानी का संकट और भी गहरा सकता है।

कागजों में बहा पानी,जमीन पर सूखे ढांचे
गुरु घासीदास नेशनल पार्क के विभिन्न क्षेत्रों में वन विभाग द्वारा जल संरक्षण के नाम पर तालाब और स्टॉप डैम बनाए गए थे,इनका उद्देश्य यह बताया गया था कि गर्मियों में जब प्राकृतिक जलस्रोत सूख जाते हैं तब इन कृत्रिम जलस्रोतों के माध्यम से वन्यजीवों को पानी उपलब्ध कराया जा सके,लेकिन वास्तविकता यह है कि अधिकांश तालाब और स्टॉप डैम निर्माण के कुछ ही समय बाद सूख चुके हैं, स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि कई जगहों पर बिना वैज्ञानिक सर्वे और तकनीकी अध्ययन के निर्माण कर दिए गए, जिसके कारण पानी रुक ही नहीं पा रहा है।

प्यासे वन्यजीव बस्तियों की ओर…
जंगलों में जलस्रोत सूखने के कारण वन्यजीवों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है,हिरण,जंगली सूअर और अन्य जानवर पानी की तलाश में अब गांवों और बस्तियों की ओर बढ़ रहे हैं,पिछले कुछ समय में ग्रामीण क्षेत्रों में वन्यजीवों की बढ़ती गतिविधि इसी संकट का संकेत मानी जा रही है।
टाइगर प्रोजेक्ट पर भी उठे सवाल
गुरु घासीदास-तमोर पिंगला क्षेत्र को जल्द टाइगर रिजर्व का दर्जा मिलने की उम्मीद है, लेकिन यदि जलस्रोतों की यही स्थिति रही तो बाघ और अन्य वन्यजीवों के लिए यह क्षेत्र उपयुक्त नहीं रह पाएगा, विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी टाइगर रिजर्व में जलस्रोत सबसे महत्वपूर्ण तत्व होते हैं।
जांच की मांग तेज
कोरिया जन सहयोग समिति के अध्यक्ष पुष्पेंद्र राजवाड़े ने इस पूरे मामले पर नाराजगी जाहिर की है, उन्होंने कहा कि यह बेहद गंभीर मामला है क्योंकि इसमें सरकारी धन की बर्बादी के साथ-साथ वन्यजीवों के जीवन से भी खिलवाड़ किया गया है, उन्होंने बताया कि इस मामले की शिकायत वन मुख्यालय रायपुर, भारत सरकार के वन मंत्रालय और राष्ट्रीय हरित अधिकरण को भेजी जाएगी।


इंजीनियरिंग निगरानी का अभाव,गुणवत्ता पर सवाल
इन निर्माण कार्यों को लेकर सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद तकनीकी गुणवत्ता पर ध्यान क्यों नहीं दिया गया,ग्रामीणों और स्थानीय लोगों का आरोप है कि कई निर्माण कार्य बिना इंजीनियर की निगरानी के कराए गए,इस कारण कहीं गलत जगह पर तालाब खोद दिए गए,कहीं सिर्फ मिट्टी की दीवार खड़ी कर दी गई,कहीं कंक्रीट संरचनाएं बना दी गईं लेकिन जलधारण क्षमता का अध्ययन नहीं किया गया,परिणाम यह हुआ कि लाखों रुपये खर्च करने के बाद भी ये जलस्रोत आज पानी रोकने में पूरी तरह असफल साबित हो रहे हैं।
तालाबों की जमीनी हकीकत
केस 01 :
मेण्ड्रा बेरियर से गिधेर मार्ग- इस मार्ग पर एक नया तालाब बनाया गया है, लेकिन इसकी हालत देखकर भ्रष्टाचार साफ झलकता है,बगल से काली मिट्टी निकालकर बस एक ऊंची दीवार बना दी गई है और गड्ढा खोदकर औपचारिकता पूरी कर दी गई।
स्थितिः-तालाब पूरी तरह सूखा पड़ा है, यहाँ न कोई सूचना बोर्ड लगा है और न ही लागत की जानकारी उपलब्ध है।
केस 02 :
गिधेर मार्ग (दूसरा स्थान)- इसी मार्ग पर एक पुराना तालाब भी है, जो विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा करता है, यहाँ भी सिर्फ एक तरफ मिट्टी की दीवार है और गड्ढा बहुत छोटा है।
स्थितिः- यह तालाब भी पूरी तरह सूखा है।
केस 03 :
मेण्ड्रा बेरियर से चंदहा मार्ग- यहाँ बनाए गए तालाब में सुरक्षा दीवार तक नहीं बनाई गई है,स्थानीय लोगों के अनुसार यहाँ केवल हल्का गड्ढा खोदकर छोड़ दिया गया।
ग्राउंड रिपोर्टः इस स्थान पर प्यासे हिरण पानी की तलाश में आते देखे गए, लेकिन उन्हें यहाँ सिर्फ सूखी मिट्टी ही मिली।
केस 04 :
मझगवां बीट-मझगवां बीट में स्थित तालाब का पानी का स्तर मार्च की शुरुआत में ही काफी नीचे जा चुका है, विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्थिति यही रही तो अप्रैल तक यह पूरी तरह सूख सकता है।
केस 05 :
मझगवां जंगल (सोनहत)-यह मामला सबसे ज्यादा चौंकाने वाला है, पिछली बरसात में बना यह तालाब पहली ही बारिश में फूट गया था। विभाग ने इसे तिरपाल से ढककर मरम्मत की कोशिश की थी ताकि मामला दबा रहे, लेकिन अब यह तालाब भी लगभग सूख चुका है।
स्टॉप डैम की स्थिति और भी खराब
तालाबों के अलावा वन विभाग ने कई स्थानों पर स्टॉप डैम भी बनाए, इनका उद्देश्य वर्षा जल को रोककर गर्मियों में पानी उपलब्ध कराना था,लेकिन इनकी स्थिति भी तालाबों जैसी ही है।
केस 01 :
मेण्ड्रा बेरियर से गिधेर मार्ग-यहाँ लगभग 7 फीट ऊंची और 60 फीट चौड़ी दीवार वाला स्टॉप डैम बनाया गया है।
स्थितिः-इतने बड़े ढांचे के बावजूद यहाँ एक बूंद पानी भी जमा नहीं है।
केस 02 :
बालमगढ़ी मार्ग-यहाँ भी भारी भरकम स्टॉप डैम बनाया गया है, लेकिन यहाँ भी पानी का नामोनिशान नहीं है।
केस 03 :
पुराना हसदो उद्गम मार्ग- यहाँ बना स्टॉप डैम आकार में छोटा है लेकिन इसकी स्थिति भी वही है, यह पूरी तरह सूखा पड़ा है।
केस 04 :
सिंघोर-सुखतरा मार्ग- इस डैम के निर्माण को लेकर पहले भी शिकायतें हुई थीं, स्थानीय लोगों का आरोप है कि घटिया सामग्री से निर्माण किया गया था,आज यह डैम भी सूखा पड़ा है।

जवाब मांगते बड़े सवाल
करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद जलस्रोत सूखे क्यों हैं?
गलत साइट चयन के लिए जिम्मेदार कौन है?
बिना तकनीकी निगरानी के निर्माण कार्य कैसे किए गए?
गर्मियों में वन्यजीवों के लिए पानी की व्यवस्था क्या है?


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