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कोरिया@नहर पर बना चौक या फाइलों का खेल? 2023 में अतिक्रमण,2026 में नो ऑब्जेक्शन

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  • सरकारी कागजों का कमाल, जो कल अतिक्रमण था… आज बन गया वैध निर्माण
  • तीन साल में बदल गया सच, नहर की जमीन से गायब हुआ ‘अतिक्रमण’
  • जल संसाधन विभाग की फाइलों का चमत्कारःनहर भी खिसकी और अतिक्रमण भी मिट गया
  • कागजों में बहती नहरः पहले अतिक्रमण,अब विभाग को कोई आपत्ति नहीं…
  • फाइलों की स्याही का खेलःनहर की जमीन पर बना चौक तीन साल में हो गया वैध…
  • अनोखा मामलाःनहर वही,चौक वही….बस सरकारी राय बदल गई
  • सरकारी दस्तावेजों का यू-टनर्: अतिक्रमण से ‘अनापत्ति’ तक की कहानी
  • नहर में अतिक्रमण से ‘नो ऑब्जेक्शन’ तकः तीन साल में कैसे बदल गया जल संसाधन विभाग का सच?
  • 2023 में नहर की जमीन पर निर्माण बताकर हटाने की सिफारिश, 2026 में उसी निर्माण पर विभाग को कोई आपत्ति नहीं — आखिर सच बदला या फाइलों की भाषा?

-रवि सिंह-
कोरिया,10 मार्च 2026 (घटती-घटना)।
छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले के बैकुंठपुर में एक छोटा सा चौक इन दिनों बड़े सवाल खड़े कर रहा है,नाम है भक्त माता कर्मा चौक,लेकिन इसके आसपास जो प्रशासनिक कहानी घूम रही है,वह किसी व्यंग्य नाटक से कम नहीं लगती,सरकारी फाइलों की दुनिया में जहां शब्दों का वजन कानून से कम नहीं होता,वहीं इसी चौक के मामले में जल संसाधन विभाग के तीन अलग-अलग पत्र एक ऐसी कहानी बयान कर रहे हैं,जिसमें सच हर तीन साल में नया रूप लेता नजर आता है, अगर इन पत्रों को क्रम से पढ़ा जाए तो लगता है कि या तो नहर की जमीन खुद चलकर कहीं और चली गई,या फिर सरकारी फाइलों की स्याही ने अपना रंग बदल लिया।
2023ःजब चौक बना ‘अतिक्रमण’
सबसे पहले चलते हैं साल 2023 में, उस समय जल संसाधन विभाग के कार्यपालन अभियंता कार्यालय से एक पत्र जारी हुआ, इस पत्र में साफ लिखा गया कि ग्राम भांडी में बने भक्त माता कर्मा चौक का निर्माण माइनर नहर की जमीन के भीतर किया गया है, पत्र के अनुसार जांच में पाया गया कि सिलफोडा जलाशय की माइनर नहर की जमीन पर लगभग 290 वर्गफुट क्षेत्र में निर्माण हुआ,चारों ओर करीब 7.5 फीट ऊंची कंक्रीट की दीवार बनाई गई,बीच में कर्मा माता की मूर्ति स्थापित की गई, इतना ही नहीं, विभाग ने यह भी स्पष्ट लिखा कि नहर की चौड़ाई 32 फीट है और जिस स्थान पर चौक बनाया गया है वह नहर की सीमा के अंदर आता है,सरकारी भाषा में कहें तो यह सीधे-सीधे अतिक्रमण था। और जब सरकारी विभाग खुद लिख दे कि अतिक्रमण है, तो आमतौर पर आगे की प्रक्रिया भी तय मानी जाती है।
2023 : अतिक्रमण हटाने की सिफारिश
इसी मामले में उसी साल 6 जुलाई 2023 को जल संसाधन विभाग ने एक और पत्र लिखा, इस बार पत्र अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) को भेजा गया, इस पत्र में भी वही बातें दोहराई गईं — कि निर्माण माइनर नहर की भूमि पर किया गया है और इसलिए अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई की जाए, सरकारी फाइलों में यह सामान्य प्रक्रिया है। विभाग अतिक्रमण की पुष्टि करता है,फिर राजस्व विभाग से हटाने की कार्रवाई का अनुरोध करता है,लेकिन इस कहानी में मोड़ यहीं से शुरू होता है।
2026ःअचानक सब कुछ ‘ठीक’ हो गया
अब आते हैं 6 फरवरी 2026 के पत्र पर, तीन साल बाद उसी जल संसाधन विभाग से एक नया पत्र जारी होता है। और इस पत्र में जो लिखा गया,उसने पहले के दोनों पत्रों को मानो इतिहास बना दिया,इस बार विभाग लिखता है की ग्राम भांडी में बने कर्मा चौक के पीछे माइनर नहर गुजरती है,निर्माण से नहर को किसी प्रकार की क्षति नहीं हुई है, कोई अतिक्रमण नहीं किया गया है, विभाग को कोई आपत्ति नहीं है, यानी वही चौक, वही जगह, वही नहर — लेकिन निष्कर्ष बिल्कुल उल्टा।
फाइलों की दुनिया का ‘चमत्कार’
सरकारी व्यवस्था में अक्सर कहा जाता है कि फाइलों में बहुत ताकत होती है,एक फाइल किसी को दोषी बना सकती है, और वही फाइल किसी को निर्दोष भी साबित कर सकती है, लेकिन इस मामले में तो फाइलों ने मानो जादू कर दिया, 2023 में जो जमीन नहर की सीमा के अंदर थी, वही 2026 में नहर के बाहर हो गई,और जो निर्माण अतिक्रमण था,वही बिना आपत्ति का निर्माण बन गया, अगर यही गति रही तो शायद कुछ साल बाद फाइलें यह भी लिख दें कि वहां नहर कभी थी ही नहीं।
स्थानीय चर्चा और सवाल
स्थानीय लोगों के बीच इस मामले को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं हैं, कुछ लोग इसे प्रशासनिक लापरवाही मानते हैं, तो कुछ इसे दबाव की राजनीति का परिणाम बताते हैं,क्योंकि आमतौर पर सरकारी विभाग अपनी जांच के बाद जो निष्कर्ष लिखता है,उसे बदलना आसान नहीं होता, लेकिन यहां तो तीन साल में पूरा निष्कर्ष ही बदल गया, इससे यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या पहली जांच गलत थी? या बाद का पत्र दबाव में लिखा गया? अगर अतिक्रमण नहीं था, तो 2023 में विभाग ने उसे अतिक्रमण क्यों बताया? और अगर अतिक्रमण था, तो अब उसे वैध कैसे मान लिया गया?
प्रशासनिक विश्वसनीयता पर असर
सरकारी विभागों की विश्वसनीयता उनके दस्तावेजों पर टिकी होती है, जब एक ही विभाग अलग-अलग समय पर एक ही मामले में बिल्कुल उल्टे निष्कर्ष लिखता है,तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठते हैं,क्योंकि कानून और प्रशासन की नजर में सरकारी पत्र ही सबसे बड़ा प्रमाण होता है,लेकिन जब प्रमाण ही बदलने लगें,तो फिर सच और कागज के बीच की दूरी बढ़ने लगती है।
व्यंग्य की नजर से देखें तो….
अगर इस पूरे मामले को व्यंग्य की नजर से देखा जाए तो लगता है कि बैकुंठपुर की नहर भी शायद सरकारी फाइलों की भाषा समझती होगी, पहले उसने सोचा होगा —अरे, मैं तो यहां सालों से बह रही हूं, लेकिन कागज कह रहा है कि मेरी जमीन पर अतिक्रमण हो गया। फिर तीन साल बाद वही नहर मुस्कुराई होगी —चलो अच्छा है,अब कागज कह रहा है कि सब ठीक है। सरकारी फाइलों की दुनिया में शायद यही सबसे बड़ा सच है — जो आज अतिक्रमण है,वह कल ‘नो ऑब्जेक्शन’ भी बन सकता है।
अब क्या होगा?
इस मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर सही क्या है? अगर 2023 की जांच सही थी, तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई? और अगर 2026 का पत्र सही है,तो पहले के पत्रों में गलत जानकारी क्यों दी गई? ऐसे मामलों में पारदर्शिता बेहद जरूरी होती है,क्योंकि जब सरकारी दस्तावेज ही विरोधाभासी हो जाएं,तो लोगों का भरोसा कमजोर पड़ता है।
अंत में…
भक्त माता कर्मा चौक शायद अपने स्थान पर शांति से खड़ा होगा,लेकिन उसके आसपास घूम रही सरकारी फाइलों की कहानी यह बता रही है कि प्रशासनिक दुनिया में सच कभी-कभी समय के साथ बदल भी जाता है, या फिर यूं कहें कि यहां नहर से ज्यादा गहरी फाइलों की धारा बहती है, और इस धारा में कभी अतिक्रमण बहता है, तो कभी ‘कोई आपत्ति नहीं’।
तीन साल में क्या बदल गया?
अब सवाल यह उठता है कि तीन साल में आखिर बदला क्या?
क्या नहर की जमीन सिकुड़कर कहीं और चली गई?
क्या चौक रातों-रात नहर से हटकर दूसरी जगह चला गया?
या फिर सरकारी फाइलों के शब्दों ने नया जन्म ले लिया?
2023 के दस्तावेजों में जिस निर्माण को नहर की जमीन पर अतिक्रमण बताया गया था?
वही निर्माण 2026 में पूरी तरह वैध कैसे हो गया?


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