सोखता गड्ढों से भूजल बढ़ेगा या केवल फोटो और फाइलों का वजन?
कोरिया का 5 प्रतिशत मॉडलः जल संकट का समाधान या अवार्ड-रिकॉर्ड की नई कहानी?
कोरिया का 5 प्रतिशत मॉडलः भूजल बचाने की पहल या अवार्ड-रिकॉर्ड का नया अभियान?
सोख्ता या शोखता? एक घंटे में रिकॉर्ड गड्ढों,साल भर में सब गायब
जल संरक्षण या आंकड़ों का खेलः कोरिया के 5 प्रतिशत मॉडल पर उठते सवाल
भूजल बचाने की योजना या उपलब्धि की होड़? कोरिया मॉडल पर संशय
-रवि सिंह-
कोरिया,09 मार्च 2026 (घटती-घटना)। गर्मी की दस्तक के साथ ही कोरिया जिले में पानी की समस्या एक बार फिर सिर उठाने लगी है,मार्च का महीना शुरू होते-होते ही कई गांवों में हैंडपंप हांफने लगे हैं,तालाबों की तलहटी झांकने लगी है और कुएं ऐसे सूखे दिखाई दे रहे हैं जैसे बरसों से उनमें पानी नहीं आया हो, ग्रामीणों के चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ दिखाई देती हैं, क्योंकि हर साल की तरह इस बार भी सवाल वही है-गर्मी कैसे कटेगी और पानी कहां से आएगा?
जिले में भूमिगत जल स्तर लगातार नीचे जा रहा है,खेतों में बोरवेल की संख्या बढ़ती जा रही है और जमीन के भीतर का पानी बिना किसी हिसाब-किताब के खींचा जा रहा है, दूसरी ओर जल संचयन के ठोस उपायों की स्थिति ऐसी है कि कागजों में योजनाओं की भरमार है, लेकिन धरातल पर पानी की एक-एक बूंद के लिए संघर्ष जारी है, इसी पृष्ठभूमि में जिला प्रशासन ने भूजल स्तर बढ़ाने के लिए 5 प्रतिशत कोरिया मॉडल नाम की एक महत्वाकांक्षी योजना शुरू की है, सुनने में योजना जितनी आकर्षक लगती है, जमीन पर उसकी तस्वीर उतनी ही सवालों से घिरी हुई दिखाई दे रही है।
तालाब और कुएं-जिनकी याद अब इतिहास बनती जा रही…
भूजल संकट की चर्चा करते समय जिले के पुराने तालाब और कुएं याद आते हैं, कभी हर गांव में एक बड़ा तालाब, कई छोटे तालाब और घर-घर में कुएं देखने को मिलते थे, बारिश का पानी इन जल स्रोतों में जमा होता था और धीरे-धीरे जमीन में रिसकर भूजल स्तर को बनाए रखता था, लेकिन विकास की तेज रफ्तार और लापरवाही की धीमी समझ ने इन स्रोतों को लगभग समाप्त कर दिया, कई तालाबों को पाटकर मकान बना दिए गए या उनमें कचरा और मलबा भर गया, कुएं भी अब केवल बुजुर्गों की यादों में बचे हैं, जल संरक्षण के इन पारंपरिक साधनों को बचाने के बजाय नई-नई योजनाओं के प्रयोग किए जा रहे हैं, जिनका परिणाम अक्सर फाइलों में ज्यादा और जमीन पर कम दिखाई देता है।
समाधान क्या है-गड्ढों से ज्यादा नीति की जरूरत
विशेषज्ञों का मानना है कि भूजल स्तर बढ़ाने के लिए केवल अभियान चलाना काफी नहीं है, इसके लिए सख्त नीति और दीर्घकालिक योजना की जरूरत है,सबसे प्रभावी उपायों में से एक है वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम, इस प्रणाली में घरों और भवनों की छत से बारिश का पानी इकट्ठा किया जाता है, उसे टैंक में जमा किया जाता है या जमीन में रिचार्ज किया जाता है, यदि इसे व्यापक स्तर पर लागू किया जाए तो यह भूजल संरक्षण में क्रांतिकारी बदलाव ला सकता है,विशेषज्ञों का सुझाव है कि सभी सरकारी भवनों में वाटर हार्वेस्टिंग अनिवार्य हो, निजी मकानों की स्वीकृति में इसे जरूरी किया जाए, प्रधानमंत्री आवास जैसी योजनाओं में भी इसे शामिल किया जाए, इससे बिना खेतों की जमीन छोड़े भी बड़ी मात्रा में पानी जमीन में पहुंचाया जा सकता है।
क्या है 5 प्रतिशत कोरिया मॉडल- खेत का पांच प्रतिशत पानी के नाम
5 प्रतिशत कोरिया मॉडल के तहत किसानों से कहा गया है कि वे अपनी कृषि योग्य भूमि का लगभग पांच प्रतिशत हिस्सा सोख्ता गड्ढों के लिए छोड़ दें,इन गड्ढों का उद्देश्य यह है कि बारिश का पानी खेतों में जमा होने के बजाय जमीन के भीतर समा जाए और धीरे-धीरे भूजल स्तर को बढ़ाए, योजना की अवधारणा बुरी नहीं है,बल्कि यदि इसे वैज्ञानिक तरीके से लागू किया जाए तो यह भूजल संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है, लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब योजना की गंभीरता धरातल पर पहुंचते-पहुंचते केवल औपचारिकता बन जाती है,कई ग्राम पंचायतों से जो तस्वीरें सामने आई हैं,वे बताती हैं कि खेतों के कोने में जल्दी-जल्दी गड्ढे खोदकर उन्हें सोख्ता घोषित कर दिया गया है,न तो उनकी गहराई तय मानकों के अनुसार है और न ही उनमें बजरी,कंकड़ और रेत की फिल्टर परत डाली गई है,ऐसी स्थिति में यह आशंका जताई जा रही है कि पहली ही बारिश के बाद ये गड्ढे कीचड़ और मलबे से भर जाएंगे और खरीफ की जुताई के साथ ही उनका अस्तित्व मिट जाएगा।
सोख्ता या फोटो खिंचाओ गड्ढा?
ग्रामीणों के बीच अब इस योजना को लेकर हल्की-फुल्की चर्चा भी होने लगी है,कुछ लोग मजाक में कह रहे हैं कि यह सोख्ता गड्ढा कम और फोटो खिंचाओ गड्ढा ज्यादा है। दरअसल कई स्थानों पर गड्ढे खोदते समय मुख्य उद्देश्य तकनीकी गुणवत्ता नहीं बल्कि संख्या पूरी करना दिखाई देता है, पंचायतों पर लक्ष्य का दबाव रहता है और लक्ष्य पूरा करने की जल्दी में गड्ढे तो बन जाते हैं, लेकिन उनकी उपयोगिता सवालों में घिर जाती है, किसानों का भी कहना है कि यदि खेत का पांच प्रतिशत हिस्सा स्थायी रूप से छोड़ना है तो इसके लिए मजबूत और टिकाऊ संरचना बननी चाहिए। वरना खेत में गड्ढा बनाकर उसे सोख्ता कह देना पानी बचाने का समाधान नहीं है।
आवा पानी झोंकी-रिकॉर्ड बना,गड्ढे गायब
कोरिया जिले में जल संरक्षण के नाम पर इससे पहले भी एक अभियान खूब चर्चा में रहा था-आवा पानी झोंकी। पिछले वर्ष मई महीने में यह अभियान पूरे जिले में बड़े उत्साह के साथ चलाया गया था, प्रशासन ने दावा किया था कि सिर्फ एक घंटे में 650 से अधिक सोख्ता गड्ढे बनाए गए, उस दिन का दृश्य भी कम दिलचस्प नहीं था, अधिकारी फावड़ा लेकर मैदान में थे, जनप्रतिनिधि भी मिट्टी खोदते नजर आए, पंचायत प्रतिनिधि और कर्मचारी भी सक्रिय थे, सोशल मीडिया पर तस्वीरें और वीडियो की बाढ़ आ गई, अखबारों में सुर्खियां बनीं और जिले को इस उपलब्धि के लिए सम्मान भी मिला, कहा गया कि यह जल संरक्षण का ऐतिहासिक अभियान है, लेकिन एक साल भी पूरा नहीं हुआ और हकीकत ने धीरे-धीरे परतें खोलनी शुरू कर दीं, जिले के कई गांवों में जाकर देखा गया तो पाया गया कि 90 प्रतिशत से अधिक सोख्ता गड्ढे अब दिखाई ही नहीं देते, कुछ पूरी तरह भर गए, कुछ समतल हो गए और कुछ खेतों की जुताई में मिट्टी बनकर मिल गए, ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या वह अभियान सचमुच जल संरक्षण के लिए था या रिकॉर्ड बनाने के लिए?
गड्ढे बने,फोटो खिंचे,सम्मान मिला…पानी फिर भी नहीं रुका
आलोचकों का कहना है कि उस अभियान में गहराई का ध्यान नहीं रखा गया, वैज्ञानिक तकनीक का उपयोग नहीं हुआ,फिल्टर सामग्री नहीं डाली गई,परिणाम यह हुआ कि गड्ढे कुछ ही महीनों में बेअसर हो गए,हालांकि यह जरूर हुआ कि रिकॉर्ड बुक में जिले का नाम दर्ज हो गया और प्रशस्ति पत्र भी मिल गए,लेकिन भूजल स्तर वहीं का वहीं रहा,अब जब नया 5 प्रतिशत मॉडल शुरू हुआ है तो लोग पूछने लगे हैं-क्या यह भी अगले साल किसी नई रिपोर्ट में उपलब्धि बनकर रह जाएगा?
बोरवेल की अंधाधुंध खुदाई-धरती का जल भंडार खाली
जिले में गिरते भूजल स्तर का एक और बड़ा कारण है बोरवेल की अंधाधुंध खुदाई, नियमों के अनुसार 300 मीटर की दूरी पर ही दूसरा बोरवेल होना चाहिए,लेकिन कई जगह स्थिति ऐसी है कि एक ही इलाके में दर्जनों बोरवेल खड़े मिल जाएंगे, प्रतिबंध के आदेश जरूर जारी होते हैं,लेकिन धरातल पर उनका असर उतना ही दिखाई देता है जितना गर्मी में सूखते तालाबों का पानी,निजी बोरवेल तो खुदाई मशीनें रात-दिन चलाकर बना ही रहे हैं,कई बार शासकीय योजनाओं में भी मानकों की अनदेखी हो जाती है,ऐसे में जमीन के भीतर का जल भंडार धीरे-धीरे खाली होता जा रहा है।
जनभागीदारी के बिना नहीं बचेगा पानी
जल संकट केवल प्रशासनिक आदेशों से हल नहीं हो सकता, इसके लिए जनभागीदारी और जागरूकता जरूरी है, यदि ग्रामीण और शहरी नागरिक मिलकर तालाबों की सफाई करें, कुओं को पुनर्जीवित करें, बोरवेल पर नियंत्रण रखें और वाटर हार्वेस्टिंग अपनाएं तो भूजल स्तर को काफी हद तक सुधारा जा सकता है।
योजना अच्छी,लेकिन ईमानदारी जरूरी
कोरिया जिले का 5 प्रतिशत मॉडल एक सकारात्मक पहल हो सकती है, लेकिन यह तभी सफल होगी जब सोख्ता गड्ढे वैज्ञानिक तरीके से बनें,उनकी नियमित निगरानी हो और अभियान केवल आंकड़ों तक सीमित न रहे, वरना यह खतरा बना रहेगा कि आने वाले समय में कहीं यह भी अवार्ड और रिकॉर्ड की सूची में चमकता हुआ नाम बनकर रह जाए, जबकि जमीन के नीचे का पानी पहले की तरह लगातार घटता ही रहे, और तब शायद गांवों के लोग फिर यही कहेंगे- गड्ढे तो बहुत बने, पर पानी कहीं नहीं रुका।
मनरेगा की डबरियों पर भी सवाल
मनरेगा योजना के तहत गांव-गांव में डबरियों का निर्माण किया गया था,जिनका उद्देश्य भी जल संचय था। लेकिन कई जगहों पर ये डबरियां बरसात के कुछ समय बाद ही सूख जाती हैं, ग्रामीणों का कहना है कि यदि बड़ी डबरियां ही जल संचय में प्रभावी साबित नहीं हो पाईं, तो छोटे-छोटे सोखता गड्ढों से बहुत अधिक उम्मीद करना भी व्यावहारिक नहीं लगता।
किसान जमीन देने को तैयार नहीं
5 प्रतिशत मॉडल के क्रियान्वयन में एक और बड़ी समस्या सामने आ रही है, कई किसान अपनी कृषि भूमि का हिस्सा सोखता निर्माण के लिए देने को तैयार नहीं हैं,उनका कहना है कि इससे उनकी खेती योग्य जमीन कम हो जाएगी और आर्थिक नुकसान होगा। साथ ही उन्हें यह भी संदेह है कि यह गड्ढे लंबे समय तक टिक नहीं पाएंगे।
दुर्घटनाओं की आशंका
कुछ गांवों में आबादी के पास बनाए जा रहे खुले गड्ढों को लेकर भी चिंता जताई जा रही है,यदि बारिश में इनमें पानी भर जाता है और कोई बच्चा या पशु इनमें गिर जाता है,तो दुर्घटना की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता,ऐसे में सवाल उठ रहा है कि यदि कोई हादसा होता है,तो उसकी जिम्मेदारी किसकी होगी।
पंचायतों पर टारगेट का दबाव
पंचायत प्रतिनिधियों का कहना है कि इस योजना को लागू करने के लिए टारगेट पूरा करने का दबाव बनाया जा रहा है, उनका कहना है कि पहले लोगों को जागरूक किया जाना चाहिए या फिर जनसहयोग लिया जाना चाहिए, और उसके बाद योजना लागू की जानी चाहिए, लेकिन फिलहाल स्थिति ऐसी है कि पहले गड्ढा खोदो,बाद में सोचो।
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