
(घटती-घटना होली विशेष व्यंग्य)। होली से पहले पत्रकारिता जगत में ऐसी खबर आई है कि न्यूज़रूम से ज्यादा चर्चा अब “न्यूज़ रूम सर्विस” की हो रही है, दिग्गज पत्रकार शमरोज ने ऐलान किया है कि अब उनका एकमात्र लक्ष्य है— “पत्रकारों की सेवा।” और इसके लिए उन्होंने ‘पत्रकार भवन’ को ही सेवा केंद्र घोषित कर दिया है! जैसे ही यह खबर फैली, पत्रकार बिरादरी में खुशी की लहर दौड़ गई, हालांकि कुछ शरारती साथियों ने मुस्कुराते हुए कहा— “लगता है ठंडाई का असर पहले ही शुरू हो गया है।
”क्या है पूरा मामला?
सूत्रों (और कुछ उड़ती हुई अफवाहों) की मानें तो शमरोज जी की सेवा योजना कुछ इस प्रकार है—
1. कलम छोड़ो, गुलाल पकड़ो
होली के दिन पत्रकार भवन में खबरों की जगह चर्चा होगी—
“रंग पक्का है या कच्चा?”
ब्रेकिंग न्यूज़ की जगह ब्रेकिंग गुलाल चलेगा।
2. स्पेशल डाइट प्लान
सूत्रों के अनुसार 100 किलो ठंडाई का ऑर्डर दे दिया गया है।
गुझिया, दही बड़े और नमकीन का स्टॉक भी फुल।
शमरोज जी का स्पष्ट कहना है—
“पहले पेट की सेवा, फिर प्रेस की सेवा।”
3. नो डेडलाइन, ओनली कलरलाइन
होली के दिन जो भी पत्रकार खबर लाने की गलती करेगा—
उसे ‘पत्रकार भवन’ के हौज में विशेष डुबकी सेवा दी जाएगी।
“आज खबर नहीं, केवल रंग छपेगा।”
शमरोज का बयान- शमरोज जी ने मीडिया से बातचीत में कहा की पत्रकार साल भर दूसरों की खबर छापता है, अब वक्त है कि मैं उनकी थकान मिटाऊं, अगर सेवा करने के लिए मुझे खुद अपने हाथों से किसी पत्रकार के चेहरे पर पक्का काला रंग भी मलना पड़े, तो मैं पीछे नहीं हटूंगा, आखिर सेवा परमो धर्मः!” उनके इस बयान पर कुछ वरिष्ठ पत्रकारों ने टिप्पणी की ऐसी सेवा हर साल होनी चाहिए।
होली का असली सवाल, अब देखना यह है कि—
- 100 किलो ठंडाई काफी पड़ेगी या नहीं?
- सेवा ज्यादा होगी या सेल्फी?
- और होली के बाद कितने पत्रकार रंग में डूबे हुए अगले दिन खबर लिख पाएंगे?
अंतिम कटाक्ष- साल भर की भागदौड़ के बाद अगर पत्रकार भवन में एक दिन के लिए कलम की जगह गुलाल और डेडलाइन की जगह रंगलाइन चले—तो इसमें बुरा क्या है? आखिर पत्रकार भी इंसान है…और होली पर उसे भी “हेडलाइन” से छुट्टी चाहिए।
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