(घटती-घटना होली विशेष व्यंग्य)। होली है! रंग उड़ रहे हैं,पिचकारियाँ चल रही हैं,और राजनीतिक गलियारों में नया गुलाल घुल रहा है-कोरिया को संभाग बनाओ! पर जनता पूछ रही है-पहले जो था, उसे क्यों तोड़ा? और जवाब आता है- विकास के लिए! अब वही जनता फिर पूछ रही है-अब जो टूटा है,उसे बड़ा करने का नया फॉर्मूला क्या है?
कोरियाः पहले जिला, फिर विभाजन,अब संभाग का सपना
जब कोरिया टूटा, तब कहा गया-प्रशासनिक सुविधा बढ़ेगी। जब नया जिला बना,तब कहा गया-विकास दौड़ेगा। अब जब कोरिया सिमट गया, तो नई आवाज़ उठ रही है- संभाग बना दो! राजनीति की होली में यह नया रंग है-पहले काटो,फिर जोड़ो,फिर बड़ा बोलो।
होली की पिचकारी में संभाग का रंग
चौपालों में चर्चा है-अगर कोरिया संभाग बना तो विकास की बौछार होगी। पर कुछ लोग फुसफुसा रहे हैं-कहीं ऐसा न हो कि संभाग तो बने, पर नाम बदल जाए! कहीं ऐसा न हो कि कोरिया संभाग का सपना देखते-देखते बोर्ड पर लिखा जाए-सरगुजा-कोरिया संभाग और कोरिया फिर पोस्टर में छोटा पड़ जाए। होली में जैसे रंग मिलकर पहचान खो देते हैं, वैसे ही राजनीति में नाम मिलकर पहचान बदल देते हैं।
टुकड़े करने वाले कितने खुश?
होली के रंग में कुछ चेहरे बहुत चमक रहे हैं, जिन्होंने कोरिया के टुकड़े किए-वे कहते हैं-देखो,हमने प्रशासन को मजबूत किया! पर जनता पूछती है-मजबूत प्रशासन आया या मजबूत पद? कुछ चेहरे संतुष्ट हैं-क्योंकि नई कुर्सियाँ बनीं। कुछ चेहरे उत्साहित हैं- क्योंकि नई पोस्टिंग आई। और कुछ चेहरे चुप हैं-क्योंकि उनके गांव की सड़क आज भी टूटी है।
व्यंग्य की पिचकारी-पहले कहा गया…
जिला छोटा करो,विकास बड़ा होगा। अब कहा जा रहा- संभाग बना दो, क्षेत्र खड़ा होगा। कल शायद कहा जाएगा- राज्य बना दो, सपना बड़ा होगा! राजनीति की होली में हर साल नया रंग आता है, पर जनता के गाल पर वही पुराना सवाल रह जाता है-असल विकास कब?
अंतिम गुलाल
अगर कोरिया संभाग बनता है तो जनता खुश होगी,यह स्वाभाविक है,पर सवाल यह है क्या यह फैसला वास्तव में प्रशासनिक जरूरत से होगा? या फिर होली के मौसम में उड़ता एक और रंगीन वादा होगा? होली सिखाती है रंग लगाओ,दिल मिलाओ,राजनीति सिखाती है रंग बदलो, समीकरण बनाओ, अब देखना यह है, कोरिया का रंग गाढ़ा होगा या फिर किसी बड़े नाम में घुल जाएगा?
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