- रेंजर आ गए साहब अब भ्रष्टाचार करेगा “अंडरआर्म” या फिर “ओवर द टॉप” ही चलेगा खेल?
- कद तो छोटा हुआ पर जिला नहीं बदला…क्या बदलेगा खेल या सिर्फ बोर्ड?
- प्रभारी से ‘छोटे’ हुए साहब, पर असर अब भी बड़ा?
- रेंजर आ गए,पर मैदान वही—क्या थमेगा कथित खेल?
- कुर्सी हिली,जड़ें नहीं—टाइगर रिजर्व में क्या सचमुच आएगा बदलाव?
- प्रभारी का पद घटा, पर पकड़ बरकरार? रेंजर की एंट्री,पर पुराने खिलाड़ी आउट नहीं!
- जिला प्रेम या पद की रणनीति? टाइगर रिजर्व में नई पारी की तैयारी
- छोटा कद, बड़ा प्रभाव—क्या रुकेगा कथित भ्रष्टाचार?
- मैदान बदला नहीं, कप्तान बदला है—अब कैसा होगा खेल?
-रवि सिंह-
कोरिया,27 फरवरी 2026(घटती-घटना)। गुरु घासीदास टाइगर रिजर्व में इन दिनों प्रशासनिक क्रिकेट का बड़ा रोमांचक मैच चल रहा है, स्कोरबोर्ड पर लिखा है—रेंजर की पदस्थापना हो गई। दर्शकदीर्घा में बैठे लोग ताली बजा रहे हैं,पर ज़रा पिच रिपोर्ट देखिए—प्रभारी रेंजर टुंडे का जिला नहीं बदला, यानी बल्लेबाज़ क्रीज़ पर मौजूद है,बस अंपायर बदल गया है! तबादला सूची आई,नाम भी आया,पर कहानी में ट्विस्ट यह कि प्रभारी रेंजर साहब का कद छोटा हुआ, कैंप नहीं,कुर्सी की ऊँचाई कम हुई है, पर जड़ें अभी भी उसी मिट्टी में मजबूती से गड़ी हैं,अब सवाल यह कि क्या नए रेंजर की निगरानी में खेल साफ-सुथरा होगा या फिर टीमवर्क से रन बनते रहेंगे?
बता दे की गुरु घासीदास राष्ट्रीय उद्यान और टाइगर रिजर्व क्षेत्र बीते कई महीनों से सुर्खियों में रहा है, गुणवत्ता विहीन निर्माण कार्य,स्टॉप डेम और एनीकट में कथित अनियमितता,पहली बारिश में बह गई सड़क, अवैध गतिविधियों के आरोप,जांच रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग,और अधिकारियों की भूमिका पर उठते सवाल—इन सबके बीच अब लंबे समय से पदस्थ प्रभारी रेंजर टुंडे के जगह अब रेंजर की पदस्थापना तबादला के साथ हो गया है,तबादला सूची जारी होते ही जिले में यह चर्चा तेज हो गई कि क्या यह कदम भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने की दिशा में ठोस पहल है या फिर केवल प्रशासनिक समायोजन, गुरु घासीदास राष्ट्रीय उद्यान और टाइगर रिजर्व क्षेत्र में कथित अनियमितताओं,गुणवत्ता विहीन निर्माण कार्यों,अवैध गतिविधियों और प्रशासनिक संरक्षण जैसे गंभीर आरोपों को लेकर पिछले कई महीनों से लगातार खबरें प्रकाशित होती रही हैं,दैनिक घटती-घटना समाचार-पत्र ने इस मुद्दे को अभियान के रूप में उठाया और अलग-अलग तिथियों पर प्रमुखता से खबरें प्रकाशित कीं, अब लंबे समय से एक ही क्षेत्र में पदस्थ प्रभारी रेंजर टुंडे का प्रभार बदला सकता है, अब सवाल उठ रहा है की क्या यह केवल एक प्रशासनिक औपचारिकता है या भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने की दिशा में ठोस शुरुआत? क्या इस कदम के बाद व्यवस्था में ठोस सुधार होगा? कोरिया जिले की जनता अब केवल अधिकारी परिवर्तन नहीं,बल्कि प्रणालीगत सुधार चाहती है,देखना यह है कि यह तबादला वन विभाग में पारदर्शिता और जवाबदेही की नई शुरुआत बनेगा या फिर कुछ समय बाद फिर वही प्रश्न उठ खड़े होंगे।
प्रभारी का ‘फुल फ्लैश’ दौर: जब मैदान खाली था- कहते हैं, जब मैदान पर एक ही खिलाड़ी हो और गेंद-बल्ला भी उसी के पास हो,तो मैच का नतीजा पूछना नहीं पड़ता, लंबे समय तक नियमित रेंजर की अनुपस्थिति में प्रभारी रेंजर टुंडे ही
मैदान के कप्तान,कोच और स्कोरर रहे,इसी दौर में टाइगर रिजर्व में विकास की गंगा बही—सड़कें बनीं (पहली बारिश में तैराकी सीख गईं),स्टॉप डेम बने (पानी आया तो भावुक हो बह निकले),एनीकट बने (पर टिके कम, दिखे ज़्यादा),मिट्टी-मुरुम की सड़कें बनीं (मिट्टी ने मुरुम से दोस्ती तो की, पर बरसात से नहीं), जनता पूछती रही—”साहब, यह विकास है या प्रयोगशाला? जवाब आता—”प्रक्रिया चल रही है।
कद छोटा हुआ,क्या प्रभाव भी?-अब रेंजर की नियमित पदस्थापना हो गई है, कागज़ों में प्रभारी का दायरा सीमित माना जा रहा है, पर सवाल यह है कि क्या प्रभाव भी सीमित हुआ है? जिला वही, संपर्क वही, फाइलों की याददाश्त वही—तो क्या बदला? लोग कहते हैं की साहब का कद छोटा हुआ है, पर अनुभव बड़ा है, कहावत है की पुराने खिलाड़ी को पिच की हर दरार याद रहती है।
बढ़ती संपत्ति और बढ़ते किस्से- जिले में यह चर्चा वर्षों से चल रही है कि प्रभारी रेंजर टुंडे की संपत्ति में उल्लेखनीय वृद्धि हुई, कोई कहता है मेहनत का फल है, कोई कहता है विकास का कमाल है, जनता पूछती है की इतना विकास जंगल में हुआ या जेब में? जवाब आता है की आरोप बेबुनियाद हैं, आधिकारिक जांच? प्रक्रिया में है, यह प्रक्रिया शब्द प्रशासनिक शब्दकोश का सबसे सुरक्षित कवच माना जाता है।
रेंजर की एंट्री: अब देखरेख सख्त होगी?- अब चूंकि नियमित रेंजर आ गए हैं, उम्मीद है कि निर्माण कार्य उनकी देखरेख में होंगे, यानी अब बल्ला एक के हाथ में, गेंद दूसरे के, जनता उम्मीद कर रही है कि गुणवत्ता जांच होगी, फाइलें खुलेंगी, ऑडिट होगा, और विकास सच में विकास जैसा दिखेगा, पर अनुभवी लोग मुस्कुरा कर कहते हैं—”देखते हैं, टीम संयोजन कैसा बनता है।
रामगढ़ की पिच पर नई पारी?- सूत्रों का कहना है कि रामगढ़ क्षेत्र में रेंजर की पदस्थापना अभी नहीं हुई है, अब चर्चा है कि प्रभारी रेंजर टुंडे वहां नई पारी खेलने की कोशिश कर सकते हैं, अगर ऐसा हुआ तो “कद छोटा” होने का असर ज्यादा दिन नहीं रहेगा, क्योंकि मैदान बदल जाएगा, पर खिलाड़ी वही रहेगा, यह चर्चा है, आधिकारिक पुष्टि नहीं, पर अफवाहों की दुनिया में भी धुआँ बिना आग के नहीं उठता—ऐसा लोग कहते हैं।
प्रमोशन की आहट और जिला प्रेम- सूत्र बताते हैं कि अगले 5–6 महीनों में प्रमोशन की संभावना है, कहते हैं, रेंजर बनकर इसी जिले में रहना उनका सपना है, जिला भी शायद कह रहा हो की जाने भी दो यारों! जनता पूछती है की लंबे समय से जमे अधिकारी को प्रमोशन के बाद भी यहीं रखना क्या स्वस्थ परंपरा है? जवाब फिर वही—”प्रशासनिक विवेक।
जांच की मांग: पुरानी फाइलें खुलेंगी?- अब यह मांग तेज हो रही है कि प्रभारी रेंजर के कार्यकाल में हुए सभी निर्माण कार्यों की जांच हो, जांच के बिंदु, तकनीकी गुणवत्ता, वित्तीय पारदर्शिता, ठेका प्रक्रिया, संपत्ति सत्यापन, यदि जांच हुई और रिपोर्ट सार्वजनिक हुई, तो शायद जंगल में पहली बार “पारदर्शिता” नामक पक्षी दिखे।
तीन साल की रोटेशन नीति: क्यों जरूरी?- वन विभाग में वर्षों तक एक ही जगह जमे रहना कई तरह के रिश्ते बना देता है, रिश्ते फाइलों से, ठेकेदारों से, व्यवस्था से, इसलिए मांग है कि हर तीन साल में अनिवार्य रोटेशन हो, वरना जंगल का नियम प्रशासनिक नियम पर भारी पड़ जाता है।
जनता की उम्मीद: अब अंडरआर्म बॉलिंग नहीं- लोगों का कहना है कि अब सीधी बॉलिंग होनी चाहिए, मतलब की साफ काम, साफ हिसाब, साफ जवाब टाइगर रिजर्व कोई निजी लीग नहीं, सार्वजनिक संपत्ति है, यहां विकास का मतलब फोटो नहीं, टिकाऊ संरचना होना चाहिए।
क्या सच में रुकेगा खेल?- प्रभारी रेंजर का कद छोटा हुआ है पर यह प्रशासनिक तथ्य है, पर जिला वही है यह भी उतना ही बड़ा तथ्य है, यदि जांच नहीं हुई, जिला परिवर्तन नहीं हुआ, रोटेशन नीति लागू नहीं हुई, तो खेल जारी रहने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता, हाँ, कुछ समय के लिए रन रेट कम हो सकता है।
मैच अभी बाकी है- गुरु घासीदास टाइगर रिजर्व में प्रशासनिक बदलाव जरूर हुआ है, पर क्या यह निर्णायक है? जनता अब केवल तबादला नहीं, पारदर्शिता चाहती है, केवल कद छोटा करना नहीं, व्यवस्था बदलना जरूरी है, वरना इतिहास गवाह है की चेहरे बदलते हैं, पर कहानियाँ वही रहती हैं, अब देखना यह है कि नया रेंजर इस पिच पर नियमों से खेलेगा या फिर पुरानी रणनीति जारी रहेगी, जंगल इंतजार कर रहा है कि विकास सच में हरा दिखे, और भ्रष्टाचार केवल अखबार की हेडलाइन बनकर रह जाए।
आगे की राह, यदि वास्तव में सुधार लाना है तो:
सभी विवादित निर्माण कार्यों की तकनीकी जांच
वित्तीय लेनदेन का ऑडिट
शिकायत निवारण की पारदर्शी व्यवस्था
संपत्ति का सत्यापन
तीन वर्ष की अनिवार्य रोटेशन नीति
निरीक्षण और निगरानी को मजबूत करना
पूर्व में प्रकाशित प्रमुख खबरें: दैनिक घटती घटना में बीते महीनों में प्रकाशित खबरों ने पूरे मामले को सार्वजनिक विमर्श का विषय बना दिया था, प्रमुख शीर्षक रहे—




“टाइगर रिजर्व या भ्रष्टाचार का अभयारण्य?”
“गुरु घासीदास टाइगर रिजर्व में भ्रष्टाचार का काला तालाब?”
“क्या भ्रष्टाचार का गढ़ बन चुका है गुरु घासीदास टाइगर रिजर्व?”
“गुणवत्ता विहीन निर्माण कार्यों के चक्कर में टाइगर रिजर्व का कैसे होगा विकास”
“अनियमितताएं चरमोत्कर्ष पर”
“जांच रिपोर्ट सार्वजनिक हो”
“मनेन्द्रगढ़ वन मंडल में भ्रष्टाचार चरम सीमा पर?”
निर्माण कार्यों में गुणवत्ता से समझौता हुआ
स्टॉप डेम और एनीकट निर्माण में तकनीकी खामियां
पहली बारिश में सड़क ध्वस्त
सरकारी राशि के उपयोग पर सवाल,शिकायतों के बावजूद कार्रवाई नहीं
अधिकारियों की भूमिका संदिग्ध
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