- जमीन के खेल में कौन? कोरिया में प्रशासन पर उठे बड़े सवाल…
- भू-माफिया बनाम कानून : कोरिया में सिस्टम पर संदेह
- फाइलों की रफ्तार और सेटिंग का असर? कोरिया में राजस्व तंत्र पर सवाल…
- जमीन,दलाल और दफ्तरः कोरिया में पारदर्शिता पर प्रश्नचिन्ह…
- क्या सबके लिए समान है कानून?कोरिया में भू-विवादों पर घमासान…
- तारीख पर तारीख या सेटिंग से समाधान?
- कानून की कुर्सी या प्रभाव का असर?
- दफ्तर के दरवाजे खुले, पर न्याय की राह मुश्किल?
- राजस्व तंत्र की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल,निष्पक्ष जांच की दरकार…
- भू-मामलों में पारदर्शिता बनाम आरोपों का साया…
- तहसीलदार और एसडीएम की भूमिका भी घेरे में, पारदर्शिता पर उठे बड़े प्रश्न
-रवि सिंह-
कोरिया,27 फरवरी 2026 (घटती-घटना)। जिले में जमीन से जुड़े विवादों और कथित भू-माफिया नेटवर्क को लेकर उठ रहे सवाल अब सीधे प्रशासनिक तंत्र तक पहुंच गए हैं, स्थानीय ग्रामीणों, जमीन मालिकों और कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि राजस्व न्यायालयों से लेकर तहसील और एसडीएम कार्यालय तक बिना‘सेटिंग’ के काम होना मुश्किल हो गया है,इन आरोपों के बीच तहसीलदार और एसडीएम की भूमिका भी संदेह के घेरे में बताई जा रही है—हालांकि इस संबंध में अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि या विभागीय जांच रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं हुई है, प्रशासन की ओर से भी इन आरोपों पर औपचारिक प्रतिक्रिया का इंतजार है। नोटः- ये उपरोक्त खबर स्थानीय स्तर पर प्राप्त आरोपों, चर्चाओं और दावों पर आधारित है,संबंधित अधिकारियों का पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी समान महत्व के साथ प्रकाशित किया जाएगा।
क्या हैं प्रमुख आरोप?
- भोले-भाले जमीन मालिक निशाने पर-ग्रामीणों का दावा है कि सीमांकन,नामांतरण (म्यूटेशन),बंटवारा और रिकॉर्ड दुरुस्ती जैसे मामलों में तकनीकी जटिलताओं का लाभ उठाया जाता है, कमजोर और अशिक्षित पक्ष को बार-बार तारीख देकर उलझाया जाता है,आपत्तियों और दस्तावेजी कमी के नाम पर फाइलें लंबित रखी जाती हैं,कई मामलों में दबाव बनाकर समझौते की कोशिश की जाती है,कुछ पीडि़तों का कहना है कि वर्षों से चल रहे मामलों में सुनवाई की गति असमान दिखाई देती है।
- राजस्व कार्यालयों में दलाल तंत्र सक्रिय?- स्थानीय स्तर पर यह चर्चा आम है कि कुछ राजस्व कार्यालयों में दलालों की सक्रियता खुले तौर पर दिखाई देती है, आवेदकों को‘सुविधा शुल्क’ के बदले त्वरित निपटारे का भरोसा दिया जाता है, दस्तावेजों की जांच और फाइल मूवमेंट में बाहरी दखल के आरोप भी लगाए जा रहे हैं,आम नागरिकों का कहना है कि सीधे आवेदन करने पर महीनों इंतजार करना पड़ता है, जबकि ‘संपर्क’ के माध्यम से काम तेजी से होता है, हालांकि,इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और प्रशासनिक स्तर पर किसी भी संगठित दलाल नेटवर्क के अस्तित्व को स्वीकार नहीं किया गया है।
- पदस्थापना और प्रभाव के दावे- कुछ सूत्रों का दावा है कि संवेदनशील हलकों में पदस्थापना को लेकर बाहरी प्रभाव काम करता है, हालांकि यह महज चर्चाओं और आरोपों तक सीमित है। जिला प्रशासन की ओर से इस संबंध में कोई प्रमाणित जानकारी सामने नहीं आई है।
राजनीतिक संरक्षण के आरोप
स्थानीय चर्चाओं में यह भी कहा जा रहा है कि कुछ मामलों में राजनीतिक दबाव का उपयोग किया जाता है, विभिन्न दलों से जुड़े कार्यकर्ताओं के नाम चर्चा में हैं,लेकिन किसी भी पक्ष ने औपचारिक रूप से इन आरोपों को स्वीकार नहीं किया है, यदि ऐसा है, तो यह प्रशासनिक निष्पक्षता के लिए गंभीर चुनौती है, हालांकि, बिना प्रमाण किसी भी व्यक्ति या संस्था पर आरोप लगाना उचित नहीं होगा।
तहसीलदार और एसडीएम पर क्यों उठ रहे सवाल?
फाइलों की असमान गति…
आम नागरिकों की फाइलें महीनों लंबित रहने के आरोप हैं,जबकि कथित प्रभावशाली पक्षों के मामलों में त्वरित कार्रवाई की चर्चा है। यह अंतर लोगों की शंकाएँ बढ़ा रहा है।
आदेशों की गुणवत्ता पर प्रश्न…
कुछ मामलों में पारित आदेशों की भाषा,तर्क और तथ्यों की व्याख्या पर आपत्तियाँ उठाई गई हैं। बताया जा रहा है कि कुछ पक्ष उच्च स्तर पर अपील की तैयारी कर रहे हैं।
निगरानी की कमी?
यदि कार्यालयों में दलाल सक्रिय हैं,तो उनकी रोकथाम के लिए ठोस कदम क्यों नहीं दिख रहे—यह भी एक बड़ा सवाल है,क्या विजि़टर लॉग और सीसीटीवी की निगरानी पर्याप्त है? क्या शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई हो रही है? इन प्रश्नों का स्पष्ट उत्तर फिलहाल सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है।
प्रशासन की संभावित जिम्मेदारी की स्थिति को देखते हुए प्रशासन से अपेक्षा की जा रही है कि…
संवेदनशील मामलों की समयबद्ध और पारदर्शी सुनवाई सुनिश्चित हो।
आदेशों की ऑनलाइन उपलब्धता और ट्रैकिंग सिस्टम मजबूत किया जाए।
राजस्व कार्यालयों में सीसीटीवी निगरानी और विजि़टर रजिस्टर सख्ती से लागू हो।
संवेदनशील पदों पर नियमित रोटेशन नीति अपनाई जाए।
शिकायतों के लिए स्वतंत्र जांच तंत्र या हेल्पलाइन बनाई जाए, यदि इन उपायों पर अमल होता है, तो जनता का विश्वास बहाल करने में मदद मिल सकती है।
जवाबदेही ही समाधान
कोरिया जिले में जमीन से जुड़े मामलों पर उठ रहे आरोपों ने प्रशासन की पारदर्शिता और जवाबदेही पर बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है। तहसीलदार और एसडीएम की भूमिका पर उठती शंकाएँ तभी शांत होंगी जब स्वतंत्र, निष्पक्ष और तथ्याधारित जांच सामने आएगी, जब तक स्पष्टता नहीं आती, आम नागरिक के मन में यही सवाल गूंजता रहेगा—क्या कानून सबके लिए समान है, या प्रभावशाली लोगों के लिए रास्ते अलग हैं?
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