- संलग्नीकरण का जाल या शिक्षा से खिलवाड़? कोरिया में सख्त आदेश के बाद मचा हड़कंप
- लोक शिक्षण संचालनालय का सख्त फरमान: क्या कोरिया में लौटेंगे गुरुजी अपनी मूल शाला?
- वनांचलों में खाली कक्षाएं, मुख्यालय में अटैचमेंट की भीड़
- शिक्षक कक्षा से दूर, फाइलों के करीब — कोरिया की शिक्षा व्यवस्था सवालों में
- पदोन्नति मिली, प्रभार नहीं: छात्रावासों में प्रशासनिक उलझन
- संलग्नीकरण पर शासन की सख्ती, क्या टूटेगा स्थानीय ‘सिस्टम’?
- ग्रामीण स्कूलों में ताले, दफ्तरों में शिक्षक — आखिर जिम्मेदार कौन?
- चार महीने से इंतजार: अधीक्षकों को क्यों नहीं मिल रहा चार्ज?
- कागजों में आदेश, धरातल पर खेल?
- शिक्षा व्यवस्था दोराहे पर: नियम बनाम रसूख
- कोरिया में शिक्षा संकट: क्या इस बार सचमुच बदलेगी तस्वीर?
-रवि सिंह-
कोरिया,26 फरवरी 2026(घटती-घटना)। छत्तीसगढ़ में चरमराती शिक्षा व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए लोक शिक्षण संचालनालय ने 24 फरवरी को एक बार फिर सख्त निर्देश जारी करते हुए स्पष्ट किया है कि गैर-शिक्षकीय कार्यों या अन्य कार्यालयों में संलग्न किए गए सभी शिक्षकों को तत्काल प्रभाव से उनकी मूल शालाओं में वापस भेजा जाए, आदेश की भाषा साफ और कठोर है—शिक्षक का मूल दायित्व अध्यापन है,न कि दफ्तरों में फाइलें संभालना या अन्य प्रशासनिक जिम्मेदारियां निभाना,राज्य स्तर पर जारी इस निर्देश के बाद अब सबकी निगाहें कोरिया जिले पर टिक गई हैं,जहां वर्षों से संलग्नीकरण का एक जटिल तंत्र जड़ें जमाए बैठा है,सवाल उठ रहा है कि क्या इस बार आदेश सचमुच धरातल पर उतरेगा,या फिर पहले की तरह कागजी कार्रवाई तक ही सीमित रह जाएगा?
वनांचलों में शिक्षक संकट: स्कूलों में सन्नाटा, मुख्यालय में भीड़- कोरिया जिले के सोनहत और बैकुंठपुर ब्लॉक के वनांचल क्षेत्रों की स्थिति चिंताजनक बताई जा रही है, दूरस्थ और पहाड़ी इलाकों में संचालित शासकीय स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी की शिकायतें लगातार सामने आती रही हैं, ग्रामीणों का आरोप है कि यहां पदस्थ अच्छे और अनुभवी शिक्षक विभिन्न ‘जुगाड़’ और प्रभाव के दम पर जिला मुख्यालय या ब्लॉक मुख्यालय के नजदीकी स्कूलों और कार्यालयों में संलग्न हो जाते हैं, परिणाम यह होता है कि जिन बच्चों के लिए ये शिक्षक नियुक्त किए गए थे, वे बिना नियमित मार्गदर्शन के रह जाते हैं, कई स्कूलों में एक या दो शिक्षकों के भरोसे पूरा संचालन किया जा रहा है. कहीं-कहीं तो अतिथि शिक्षकों या अस्थायी व्यवस्थाओं से काम चलाया जा रहा है, दूसरी ओर, मुख्यालय या शहरी क्षेत्र के स्कूलों में अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति दिखाई देती है, यहां शिक्षकों की संख्या अधिक होने के बावजूद संलग्न शिक्षक कार्यालयों में तैनात हैं या नजदीकी संस्थानों में समायोजित हैं, इससे ग्रामीण और शहरी शिक्षा के बीच असमानता और गहरी हो रही है।
जनाक्रोश: “हमारे बच्चों का भविष्य कौन संभालेगा?”- वनांचलों के ग्रामीणों में इस स्थिति को लेकर गहरा असंतोष व्याप्त है। कई अभिभावकों का कहना है कि उनके बच्चे रोज स्कूल जाते हैं, लेकिन पढ़ाने वाला नियमित शिक्षक नहीं मिलता, एक ग्रामीण अभिभावक का कहना है, “सरकार कहती है शिक्षा का अधिकार सबको है, लेकिन हमारे गांव के स्कूल में शिक्षक ही नहीं है, शहर के स्कूलों में अतिरिक्त व्यवस्था है, यहां बच्चों को भगवान भरोसे छोड़ दिया गया है, ग्रामीणों का आरोप है कि संलग्नीकरण की यह व्यवस्था प्रभावशाली लोगों के हित में काम करती है, जबकि दूरस्थ क्षेत्रों के बच्चे उपेक्षित रह जाते हैं। यदि आदेश के बाद भी स्थिति नहीं बदली, तो जनाक्रोश और बढ़ सकता है।
बीईओ और डीईओ कार्यालयों में संलग्नीकरण का खेल- संलग्नीकरण का मुद्दा केवल स्कूलों तक सीमित नहीं है। जानकारी के अनुसार, खंड शिक्षा अधिकारी और जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालयों में भी कई शिक्षक गैर-शिक्षकीय कार्यों में लगे हुए हैं, नियम स्पष्ट कहते हैं कि शिक्षक का मूल कार्य अध्यापन है, उन्हें स्थायी रूप से कार्यालयीन दायित्वों में लगाना शिक्षा व्यवस्था के मूल उद्देश्य के विपरीत है, अपवाद स्वरूप अल्पकालिक आवश्यकता में ऐसा किया जा सकता है, लेकिन कोरिया जिले में यह व्यवस्था स्थायी स्वरूप ले चुकी है, सूत्रों के अनुसार कुछ शिक्षक सोनहत से बैकुंठपुर ब्लॉक में, तो कुछ बैकुंठपुर से सोनहत ब्लॉक में संलग्न हैं, कई शिक्षक वर्षों से स्कूल की कक्षा छोड़ कार्यालय में सेवा दे रहे हैं, इससे न केवल विद्यार्थियों को नुकसान हो रहा है, बल्कि शिक्षकीय पेशे की मूल भावना भी प्रभावित हो रही है।
आदेश बनाम क्रियान्वयन: क्या इस बार फर्क पड़ेगा?- राज्य शासन द्वारा इससे पहले भी संलग्नीकरण समाप्त करने और शिक्षकों को मूल शाला में भेजने के निर्देश जारी किए जाते रहे हैं, लेकिन जिला स्तर पर इन आदेशों का प्रभाव सीमित ही दिखाई देता है, स्थानीय जानकारों का मानना है कि संलग्नीकरण के पीछे एक “सिस्टम” काम करता है—जिसमें आपसी सांठगांठ, राजनीतिक दबाव और प्रशासनिक लचीलापन शामिल है, आदेश आते हैं, रिपोर्ट तैयार होती है, लेकिन व्यवहार में बहुत कम बदलाव दिखाई देता है, अब जब लोक शिक्षण संचालनालय ने फिर सख्ती दिखाई है, तो कोरिया जिला प्रशासन की परीक्षा है कि वह कितनी गंभीरता से इस आदेश को लागू करता है।
छात्रावास अधीक्षक प्रकरण: पदोन्नति के बाद भी ‘प्रभार’ का इंतजार- शिक्षा व्यवस्था से जुड़ा एक और महत्वपूर्ण मामला जिले में चर्चा का विषय बना हुआ है। कार्यालय आयुक्त, आदिम जाति एवं अनुसूचित जाति विकास विभाग से पदोन्नत होकर छात्रावास अधीक्षक बने कई कर्मचारियों को जॉइनिंग दिए हुए चार माह से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन उन्हें अब तक संबंधित छात्रावासों का वास्तविक कार्यभार नहीं सौंपा गया है, नियमों के अनुसार पदोन्नति के बाद संबंधित अधिकारी को तत्काल प्रभाव से प्रभार सौंपा जाना चाहिए, लेकिन जिले के कई छात्रावासों में पुराने अधीक्षक या वैकल्पिक व्यवस्था के तहत कार्यरत कर्मचारी चार्ज छोड़ने में देरी कर रहे हैं।
प्रशासनिक अस्पष्टता और जवाबदेही का संकट- प्रभार न मिलने से कई प्रशासनिक समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं, वित्तीय निर्णय लंबित पड़े हैं, छात्रावास संचालन में पारदर्शिता प्रभावित हो रही है, जिम्मेदारी तय करना कठिन हो गया है, यदि किसी छात्रावास में अनियमितता या वित्तीय गड़बड़ी सामने आती है, तो यह स्पष्ट नहीं हो पाता कि जिम्मेदार कौन है—जॉइनिंग दे चुका पदोन्नत अधीक्षक या पूर्व प्रभारधारी? एक पदोन्नत अधीक्षक ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “हमने चार महीने पहले जॉइनिंग दे दी है, लेकिन जब तक लिखित में प्रभार नहीं मिलता, हम कोई वित्तीय या प्रशासनिक निर्णय नहीं ले सकते। यह हमारी वरिष्ठता और मनोबल पर सीधा आघात है।”
टालमटोल या संगठित खेल?- लब्जी, तेलीमुड़ा, घुघरा, कटगोड़ी जैसे छात्रावासों में जॉइनिंग के बावजूद प्रभार लंबित होने की चर्चा है, सूत्रों का कहना है कि इसमें केवल प्रशासनिक सुस्ती नहीं, बल्कि एक लंबा ‘खेल’ हो सकता है, आरोप है कि जिला स्तर पर फाइलों को जानबूझकर रोका जा रहा है या बहाने बनाकर टालमटोल की जा रही है, यदि ऐसा है, तो यह न केवल पदोन्नत कर्मचारियों के अधिकारों का हनन है, बल्कि शासन के आदेशों की अवमानना भी है।
शिक्षा व्यवस्था पर व्यापक प्रभाव- संलग्नीकरण और प्रभार विवाद दोनों ही मुद्दे शिक्षा व्यवस्था को सीधे प्रभावित करते हैं, स्कूलों में शिक्षक नहीं होंगे तो गुणवत्ता गिरती है, छात्रावासों में स्पष्ट प्रशासनिक व्यवस्था नहीं होगी तो छात्रों की सुविधाएं प्रभावित होती हैं, कोरिया जिला वनांचल क्षेत्र होने के कारण पहले ही भौगोलिक और सामाजिक चुनौतियों से जूझ रहा है, ऐसे में यदि प्रशासनिक स्तर पर भी शिथिलता रहे, तो शिक्षा की स्थिति और कमजोर हो सकती है।
प्रशासन और विभाग के सामने चुनौती- लोक शिक्षण संचालनालय का ताजा आदेश कोरिया जिले के लिए निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है, यदि जिला प्रशासन सभी संलग्न शिक्षकों की सूची सार्वजनिक करे, उन्हें समयबद्ध तरीके से मूल शाला में भेजे, और पदोन्नत अधीक्षकों को तत्काल प्रभार सौंपे, तो यह शिक्षा व्यवस्था में सुधार की दिशा में ठोस कदम होगा, लेकिन यदि आदेश केवल कागजों में सीमित रह गया, तो यह संदेश जाएगा कि स्थानीय स्तर पर अनौपचारिक व्यवस्थाएं शासन के निर्देशों से अधिक प्रभावी हैं।
शिक्षा बनाम व्यवस्था का संघर्ष- कोरिया जिले की शिक्षा व्यवस्था इस समय एक दोराहे पर खड़ी है, एक ओर शासन की मंशा है कि स्कूलों में शिक्षक लौटें और व्यवस्था पारदर्शी बने, दूसरी ओर, वर्षों से चली आ रही संलग्नीकरण संस्कृति और प्रशासनिक ढिलाई है, अब यह देखना होगा कि क्या जिला प्रशासन सख्ती दिखाते हुए वनांचलों के स्कूलों को उनका हक दिला पाएगा और पदोन्नत अधीक्षकों को सम्मानपूर्वक प्रभार सौंपेगा, क्योंकि अंततः सवाल केवल आदेशों का नहीं है—सवाल उन बच्चों के भविष्य का है, जो शिक्षा के भरोसे अपना कल संवारना चाहते हैं।
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