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एमसीबी@ संकल्प बजट में कोरिया को मिला झुनझुना जनता ने बजाकर जताया रोष!

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  • संकल्प बजट” में कोरिया के हिस्से आया संकल्प विकास का नहीं, धैर्य का!
  • एमसीबी पर मेहरबानी, कोरिया पर खामोशी — नेता प्रयासहीन या सरकार उदासीन?
  • कोरिया का विकास ठहरा क्यों? अब कौन बनेगा जिले का नया “विकास पुरुष”?
  • विरासत से विराम तक: कोरिया में विकास की रफ्तार पर सवाल
  • कभी सौगातों की धरती, आज बजट से मायूस—कोरिया किसके भरोसे?
  • झुमका तक सिमटा विकास? कोरिया की बड़ी उम्मीदें अधूरी
  • घोषणाओं से हकीकत तक: कोरिया को कब मिलेगा मजबूत नेतृत्व?
  • विकास पुरुष की तलाश में कोरिया—इतिहास दोहराएगा या बदलेगा?
  • विभाजन के बाद विकास का विभाजन? कोरिया की राजनीति पर बड़ा प्रश्न
  • बजट में सूखा, उम्मीदों में दरार—कोरिया का अगला चेहरा कौन?
  • विकास नहीं तो झुनझुना सही! बजट पर कोरिया का अनोखा विरोध
  • कोरिया के हिस्से आया ‘खाली पन्ना’ बजट! बजट 2026: सौगातों की सूची में कोरिया गायब?
  • जनता पूछे सवाल — क्या कोरिया की आवाज कमजोर पड़ गई?
  • झुनझुने से गूंजा कोरिया, बजट पर उठी नाराज़गी की झंकार, विकास की जगह प्रतीकात्मक सौगात?

-रवि सिंह-
एमसीबी,25 फरवरी 2026 (घटती-घटना)।
छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा प्रस्तुत वर्ष 2026-27 के संकल्प बजट में स्वास्थ्य क्षेत्र को व्यापक और ऐतिहासिक प्राथमिकता दी गई है, प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल ने बजट को प्रदेश की 3 करोड़ जनता के बेहतर स्वास्थ्य,सामाजिक सुरक्षा और समग्र विकास के लिए समर्पित बताया है, उन्होंने मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और वित्त मंत्री ओ.पी. चौधरी का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि यह बजट छत्तीसगढ़ अंजोर 2047 के लक्ष्य की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
स्वास्थ्य मंत्री ने कहा… छत्तीसगढ़ सरकार के वर्ष 2026-27 के बजट में स्वास्थ्य क्षेत्र को सुदृढ़ करने का व्यापक संकल्प लिया गया है,राज्य में आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं,मेडिकल शिक्षा और उन्नत उपचार व्यवस्था के विस्तार के लिए महत्वपूर्ण प्रावधान किए गए हैं,जो प्रदेश को स्वस्थ और विकसित छत्तीसगढ़ की दिशा में आगे बढ़ाने वाले माने जा रहे हैं।
बजट आयाज् सौगात नहीं, इसलिए कोरिया ने बजाया झुनझुना!- कोरिया शहर में बजट में जिले को कोई बड़ी घोषणा न मिलने से नाराज़ एक युवक ने सड़क पर खड़े होकर हाथों में झुनझुना लेकर विरोध का अनोखा तरीका अपनाया,
दोनों हाथों में रंगीन झुनझुना लिए युवक का संदेश साफ है —”जब विकास नहीं मिला, तो कम से कम आवाज तो हो!” तस्वीर में युवक बाजार क्षेत्र में खड़ा दिखाई दे रहा है, मानो यह प्रतीक हो कि आम नागरिक अब सिर्फ सुनने वाला नहीं, बल्कि बजट पर प्रतिक्रिया देने वाला बन चुका है।
कोरिया बनाम एमसीबी: उपलब्धियों की विरासत, बजट की उम्मीदें और नेतृत्व पर उठते सवाल- कोरिया जिले के इतिहास पर नजर डालें तो यह जिला लंबे समय तक अपनी हरियाली, सिंचाई परियोजनाओं और योजनाबद्ध विकास के लिए जाना जाता रहा है, पूर्व मंत्री एवं बैकुंठपुर विधानसभा से कई बार विधायक रहे रामचन्द्र सिंहदेव के कार्यकाल को जिले की विकास यात्रा का स्वर्णिम दौर माना जाता है।
स्वर्णिम दौर: सिंचाई और संरचनात्मक विकास- रामचन्द्र सिंहदेव के कार्यकाल में लघु एवं दीर्घ सिंचाई योजनाओं, जलाशयों और बांधों का निर्माण हुआ, जिसने जिले की कृषि व्यवस्था को नई दिशा दी। हसदेव अंचल की सिंचाई परियोजनाएं आज भी जिले की हरियाली और कृषि उत्पादन का आधार मानी जाती हैं. उस दौर में जिला बजट से कभी निराश नहीं हुआ—विकास योजनाएं निरंतर मिलती रहीं और कोरिया की पहचान मजबूत होती गई।
भईयालाल राजवाड़े का कार्यकाल: निरंतरता और सौगातें- इसी क्रम में वर्तमान दौर से पहले के कार्यकालों में भईयालाल राजवाड़े का नाम भी उपलब्धियों के साथ जुड़ा रहा, संसदीय सचिव और मंत्री रहते हुए उन्होंने जिले के लिए कई विकास कार्य स्वीकृत कराए, उनके पूर्व के कार्यकाल में कोरिया को बजट से अपेक्षा से बेहतर प्रावधान मिलते रहे—यह धारणा आज भी जनमानस में मौजूद है।
इस पारी में क्यों अछूता रह गया कोरिया?- वर्तमान बजट में कोरिया जिला, खासकर जिला मुख्यालय, अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर पाया। शहर की सड़कों के चौड़ीकरण जैसी बहुप्रतीक्षित मांग भी बजट में शामिल नहीं हुई। यह वह एक बड़ी अपेक्षा थी जिस पर शहरवासियों की निगाहें टिकी थीं, बजट शब्द भले ही आम जनता के लिए एक औपचारिक सरकारी दस्तावेज हो—वार्षिक वित्तीय प्रतिवेदन, प्रावधान और समीक्षाएं आमजन कम ही समझते हैं—लेकिन अपने क्षेत्र के हिस्से पर सबकी नजर रहती है। जब पड़ोसी जिले को अधिक मिलता दिखाई देता है, तो तुलना स्वाभाविक है।
एमसीबी को मिली सौगातें, तुलना ने बढ़ाया सवाल- कोरिया के विभाजन के बाद बने मनेन्द्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर जिला (एमसीबी) को इस बजट में कई महत्वपूर्ण प्रावधान मिले हैं, मेडिकल कॉलेज की शुरुआत के लिए बजट में प्रावधान और नगरीय निकायों में व्यापक वित्तीय आवंटन ने एमसीबी को विकास की नई गति दी है, यही तुलना अब कोरिया में चर्चा का विषय है—क्या मंत्रित्व कार्यकाल का प्रभाव बजट आवंटन में परिलक्षित हो रहा है? क्या नेतृत्व की सक्रियता से क्षेत्रीय लाभ तय हो रहे हैं? यह प्रश्न सार्वजनिक बहस का हिस्सा बन चुका है।
विभाजन की स्मृतियां और वर्तमान मायूसी- कोरिया जिले का विभाजन एक भावनात्मक विषय रहा, लोगों ने अनिच्छा के बावजूद नए जिले का स्वागत किया, लेकिन आज जब नया जिला तेजी से आगे बढ़ता दिख रहा है और पुराना जिला अपेक्षाकृत ठहरा हुआ प्रतीत होता है, तो विभाजन का दौर फिर चर्चा में आ जाता है, तब नेतृत्व ने विभाजन पर मौन साधा था—ऐसी धारणा जनता के एक वर्ग में रही। आज वही नेतृत्व यदि बजट और विकास योजनाओं के मामले में प्रभावी नहीं दिखता, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
नेतृत्व के लिए आत्ममंथन का समय?- कोरिया की जनता निराशा से अधिक स्पष्टता चाहती है—क्या योजनाएं प्रस्तावित नहीं हुईं? क्या प्रशासनिक स्तर पर कमी रही? या राजनीतिक प्रभाव घटा? इतिहास बताता है कि जब नेतृत्व सक्रिय और प्रभावी होता है तो जिला बजट से निराश नहीं होता, आज आवश्यकता है रणनीतिक प्रयासों, ठोस प्रस्तावों और समन्वित पैरवी की—ताकि कोरिया फिर से अपनी विकास यात्रा को उसी आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ा सके, जैसा उसने पहले देखा था।
कोरिया के “विकास पुरुष” का खाली होता स्थान: अब किस पर टिकेगी उम्मीद?- कोरिया जिले की राजनीति और विकास यात्रा में कभी “विकास पुरुष” की पहचान एक मजबूत प्रतीक हुआ करती थी, लंबे समय तक बैकुंठपुर से विधायक रहे और पूर्व मंत्री रामचंद्र सिंहदेव का कार्यकाल सिंचाई परियोजनाओं, जलाशयों, बांधों और संरचनात्मक विकास के लिए याद किया जाता है, उस दौर में जिला बजट से निराश नहीं होता था—लघु और दीर्घ सिंचाई योजनाएं आज भी उनकी विरासत मानी जाती हैं, इसी क्रम में भईयालाल राजवाड़े के पूर्व के दो कार्यकाल भी उपलब्धियों वाले माने गए, संसदीय सचिव और मंत्री रहते हुए जिले को कई सौगातें मिलीं। उस समय यह धारणा बनी कि कोरिया की आवाज सत्ता के गलियारों तक प्रभावी ढंग से पहुंचती है।
अब क्यों सुनाई दे रहा है “सूखा” शब्द?- वर्तमान परिदृश्य इसके उलट नजर आता है, पूर्व विधायक का कार्यकाल घोषणाओं और अधूरे निर्माण कार्यों के लिए चर्चित रहा, साथ ही जिला विभाजन का निर्णय भी उसी दौर में तय हुआ, विभाजन को लेकर जनभावनाएं आज भी मिश्रित हैं—कई लोग इसे जिले की पहचान कमजोर होने के रूप में देखते हैं, 2023 के बाद शुरू हुए वर्तमान कार्यकाल में भी अपेक्षित बड़ी उपलब्धियां सामने नहीं आईं। विकास की जगह मरम्मत और छोटे कार्य अधिक दिखाई दे रहे हैं—यह धारणा जनमानस में बन रही है, घोषणाओं और क्रियान्वयन के बीच की दूरी सवाल खड़े कर रही है।
2018 के बाद से बजट में उपेक्षा?- 2018 के चुनाव के बाद से कोरिया की बजटीय हिस्सेदारी को लेकर असंतोष की चर्चा लगातार रही है। मेडिकल कॉलेज जैसी बड़ी परियोजनाएं विभाजन के बाद अलग हुए मनेन्द्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर जिला (एमसीबी) के हिस्से में चली गईं, अब तुलना स्वाभाविक है—एमसीबी को नई सौगातें मिलती दिख रही हैं, जबकि कोरिया में अपेक्षाएं अधूरी रह जा रही हैं, सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या राजनीतिक प्रभाव और सत्ता में भागीदारी का सीधा असर बजट आवंटन पर पड़ रहा है?
क्या कोरिया “झुमका” तक सिमट गया?- स्थानीय चर्चाओं में एक वाक्य बार-बार सुनाई देता है—”क्या कोरिया अब सिर्फ झुमका तक रह गया है?” झुमका डैम और उसके आसपास के विकास कार्यों की चर्चा जरूर होती है, लेकिन जिला मुख्यालय और अन्य क्षेत्रों में बड़ी परियोजनाओं की कमी महसूस की जा रही है। क्या विकास का दायरा सीमित हो गया है? क्या बाकी क्षेत्र प्रतीक्षा में हैं?
बड़ा सवाल: अब कौन बनेगा “विकास पुरुष”?– स्थिति का सार यही है—कोरिया की जनता नेतृत्व से प्रतीकात्मक नहीं, ठोस परिणाम चाहती है, जनता पूछ रही है कौन ऐसा होगा जो जिले के लिए दीर्घकालिक योजनाएं लाए? कौन बजट में कोरिया की मजबूत पैरवी कर पाएगा? किस पर भरोसा किया जाए कि जिला फिर से बड़े विकास मानचित्र पर लौटे? “विकास पुरुष” का तमगा सिर्फ भाषणों से नहीं मिलता—उसके लिए योजनाओं की स्वीकृति, समयबद्ध क्रियान्वयन और राजनीतिक प्रभाव जरूरी होता है, कोरिया की जनता अब घोषणाओं से आगे बढ़कर परिणाम चाहती है, आने वाले समय में यही तय करेगा कि जिले की राजनीति में अगला “विकास पुरुष” कौन कहलाएगा—या फिर यह उपाधि इतिहास की किताबों तक सिमट जाएगी।
विभाजन के बाद से जारी है ‘संकुचन’- कोरिया जिले का विभाजन जब हुआ था, तब इसे प्रशासनिक सुविधा बताया गया, लोगों ने दिल पर पत्थर रखकर स्वीकार किया, पर अब स्थिति यह है कि— मेडिकल कॉलेज अलग जिले को, नई परियोजनाएं अलग जिले को, बजट की प्राथमिकताएं अलग जिले को और कोरिया के हिस्से रह गईं सिर्फ यादें और उम्मीदें।
“विकास” अब सिर्फ झुमका तक?- जिले में चर्चा है कि विकास की पूरी कहानी अब “झुमका” तक सीमित है, झुमका में योजनाएं, झुमका में घोषणाएं, झुमका में तस्वीरें तो क्या बाकी कोरिया अब सिर्फ नक्शे में बचा है? जनता पूछ रही है क्या जिला मुख्यालय का विकास सिर्फ फाइलों में रहेगा? क्या बाकी ब्लॉक “अगली सूची” का इंतजार करते रहेंगे?
नेताओं के प्रयास में कमी या अनदेखी?- यही सबसे बड़ा सवाल है, क्या कोरिया के जनप्रतिनिधियों ने ठोस पैरवी नहीं की? या फिर उनकी मांगों को प्राथमिकता सूची में नीचे रख दिया गया? सत्ता के गलियारों में आवाज वही सुनी जाती है जो लगातार गूंजे, अगर आवाज धीमी हो जाए, तो बजट के पन्ने भी चुप रह जाते हैं।
बजट का आईना और कोरिया की परछाई– बजट सरकार की प्राथमिकताओं का आईना होता है, इस आईने में इस बार कोरिया की परछाई धुंधली दिखी, एमसीबी की तस्वीर चमकदार है, कोरिया की फीकी, अब यह समय है आत्ममंथन का—नेताओं के लिए भी और जनता के लिए भी, क्योंकि अगर जिला अपनी आवाज मजबूत नहीं करेगा, तो “संकल्प बजट” हर साल संकल्प ही देता रहेगा— सौगात नहीं।


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