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सोनहत (कोरिया)@ सेमरिया की पुलिया: विकास के पोस्टर पर मुस्कुराहट, ज़मीन पर दरार, 6–7 महीने से बदहाल रास्ता, स्कूल जाते बच्चों के लिए रोज़ का ‘एडवेंचर ट्रैक’

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-राजन पाण्डेय-
सोनहत (कोरिया),21 फरवरी 2026(घटती-घटना)।
वनांचल क्षेत्र के ग्राम सेमरिया में विकास की गंगा शायद नक्शे पर बह रही है, ज़मीन पर तो पुलिया की मिट्टी पिछले साल की बरसात में बह गई—और तब से प्रशासन की नींद भी उसी धारा में बहती चली गई,गांव की मुख्य बस्ती से स्कूल जाने वाले मार्ग पर बनी पुलिया करीब छह-सात महीनों से क्षतिग्रस्त पड़ी है,बरसात में किनारों की मिट्टी बह गई,ढांचा दरक गया,किनारे खिसक गए, तब से लेकर आज तक मरम्मत का नामोनिशान नहीं,लगता है जैसे यह पुलिया नहीं, विकास के दावे का स्मारक हो—जिसे देखिए, फोटो खींचिए और आगे बढ़ जाइए।
हादसे का इंतज़ार?- ग्रामीण कहते हैं—यह रास्ता गांव की लाइफलाइन है, इसी से बच्चे स्कूल जाते हैं, किसान खेत, मरीज अस्पताल, लेकिन पुलिया की हालत ऐसी है कि हर कदम सोच-समझकर रखना पड़ता है, बरसात में तो दृश्य और भी रोमांचक हो जाता है—फिसलन, गड्ढे, ढीली मिट्टी, बच्चों के लिए यह रोज़ का ‘एडवेंचर ट्रैक’ है, फर्क बस इतना है कि यहां हेलमेट और सुरक्षा बेल्ट नहीं मिलती, प्रशासन की चुप्पी देखकर ग्रामीणों के बीच यह तंज चल पड़ा है—”शायद कोई बड़ी दुर्घटना प्रशासन के लिए उद्घाटन का अवसर बनती हो।
शिक्षा का रास्ता या जोखिम का पुल?- सरकारें शिक्षा के अधिकार, स्कूल चलें हम और डिजिटल इंडिया की बातें करती हैं, पर सेमरिया में सवाल सीधा है—जब स्कूल पहुंचने का रास्ता ही सुरक्षित नहीं, तो शिक्षा तक पहुंच कैसे होगी? कई अभिभावक बारिश और अंधेरे के समय बच्चों को स्कूल भेजने से कतराते हैं। उपस्थिति प्रभावित हो रही है, पर आंकड़ों में यह “ड्रॉप-आउट रिस्क” शायद दर्ज नहीं होता।
रात का सफर: हिम्मत हो तो पार करो- दिन में ही पुलिया पार करना जोखिम भरा है, तो रात में यह किसी परीक्षा से कम नहीं। आसपास जंगल, वन्यजीवों की आवाजाही, और नीचे ढीली मिट्टी—मानो प्रशासन ने ग्रामीणों के लिए “सर्वाइवल टेस्ट” तैयार कर दिया हो, आपात स्थिति में एंबुलेंस या वाहन का गुजरना भी खतरे से खाली नहीं। मुख्य बस्ती का संपर्क टूटने की कगार पर है, लेकिन मरम्मत की फाइल शायद अभी भी “प्रक्रिया में” होगी।
चुनावी वादे बनाम जमीनी हकीकत- ग्रामीणों का आरोप है कि चुनाव के समय नेता इस रास्ते से गुजरते हैं—वोट मांगने, तब पुलिया “संपर्क मार्ग” कहलाती है, अब वही पुलिया “तकनीकी स्वीकृति” और “बजट आवंटन” की प्रतीक्षा में है, सेमरिया के लोगों का कहना है कि कई बार शिकायतें की गईं, लेकिन जवाब मिला—”देखेंगे।” लगता है यह “देखेंगे” ही असली विकास योजना है।
ग्रामीणों की नाराज़गी-
अवध यादव, एलएलबी छात्र एवं ग्रामीण (सेमरिया) का कहना है:
पिछले साल मिट्टी बह गई थी, तब से हम डरते-डरते इसे पार करते हैं। बच्चों के लिए यह बेहद खतरनाक है। अगर जल्द मरम्मत नहीं हुई, तो ग्रामीण आंदोलन के लिए मजबूर होंगे।”
वहीं पुष्पेंद्र राजवाड़े, अध्यक्ष (कोरिया जन सहयोग समिति) ने चेतावनी दी:
“नन्हे स्कूली बच्चों को टूटी पुलिया से गुजरना पड़ रहा है। ग्राम पंचायत और खंड स्तरीय प्रशासन की कुंभकर्णी नींद ग्रामीणों के जीवन पर भारी है। यदि शीघ्र व्यवस्था बहाल नहीं हुई, तो जनपद का घेराव होगा।”
अस्थायी जुगाड़ या स्थायी समाधान?- ग्रामीणों की मांगें साधारण हैं, पुलिया की तत्काल तकनीकी जांच, अस्थायी मरम्मत नहीं, मजबूत और स्थायी पुनर्निर्माण, सुरक्षा बैरिकेड और चेतावनी बोर्ड, बरसात से पहले सुदृढ़ीकरण, यह कोई पुल का महाकाव्य नहीं, बस एक छोटी-सी पुलिया है—लेकिन इसी पर गांव का भविष्य चलता है।
विकास की दिशा?- जब छोटे गांवों की बुनियादी समस्याएं महीनों तक अनसुनी रहें, तो बड़े-बड़े विकास दावों की चमक फीकी लगने लगती है, सेमरिया की पुलिया याद दिलाती है कि विकास की असली परीक्षा शहरों के मंचों पर नहीं, गांव की पगडंडियों पर होती है।
पुलिया नहीं, प्राथमिकता टूटी है- सेमरिया की यह पुलिया केवल सीमेंट और मिट्टी का ढांचा नहीं—यह प्रशासनिक प्राथमिकताओं का आईना है, जब तक इसकी मरम्मत नहीं होती, तब तक हर दिन बच्चे डर के साथ इसे पार करेंगे और हर दिन विकास का दावा एक दरार और चौड़ी करेगा, अब सवाल यह है क्या मरम्मत की शुरुआत किसी हादसे के बाद होगी? या प्रशासन समय रहते इस “छोटी” समस्या को गंभीरता से लेगा? ग्रामीणों ने चेतावनी दे दी है। अब गेंद प्रशासन के पाले में है।


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