
झुमका बना प्रयोगशाला, जनता बनी दर्शक और बजट हुआ मुख्य कलाकार
-जिला प्रतिनिधि-
कोरिया,19 फरवरी 2026(घटती-घटना)। महोत्सव का मौसम आया,मंच सजा,बैनर टंगे,एलईडी चमकीं और स्वागत गीतों की गूंज के बीच मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय का आगमन हुआ,कैमरे क्लिक हुए, तालियां बजीं,भाषण हुआ-और जैसे ही काफिला आगे बढ़ा, महोत्सव की आत्मा भी मानो साथ ही विदा हो गई,पीछे बचीं-खाली कुर्सियां,उखड़ती झालरें और करोड़ों के खर्च पर खड़े अनुत्तरित सवाल।
भीड़: जनसमर्थन या “समयबद्ध उपस्थिति”?- पिछले एक आयोजन में खाली कुर्सियों की तस्वीरें प्रशासन के गले की फांस बनी थीं, इस बार वह गलती दोहराने की गुंजाइश नहीं छोड़ी गई, भीड़ आई—समय पर आई—और मुख्य अतिथि के भाषण तक टिकी रही, लेकिन जैसे ही कार्यक्रम का मुख्य हिस्सा खत्म हुआ, कुर्सियों ने फिर लोकतंत्र का असली चेहरा दिखा दिया—जनता धीरे-धीरे गायब और सवाल स्थायी, यदि जनता केवल “फोटो फ्रेम” तक सीमित हो जाए, तो उसे जनभागीदारी कहना जनमत का अपमान है।
झुमका जलाशय: विकास का केंद्र या बजट की प्रयोगशाला?- महोत्सव का मुख्य मंच बना झुमका जलाशय—जहां हर साल नया निर्माण, नया गेट, नई लाइट, नया ढांचा और नया खर्च दिखाई देता है, इस बार चर्चा का केंद्र रहा नया ओपन थियेटर, सवाल यह नहीं कि ओपन थियेटर क्यों बना, सवाल यह है कि—किसकी अनुमति से बना? किस योजना के तहत बना? उसकी वास्तविक उपयोगिता क्या है? और क्या जल संसाधन विभाग से विधिवत अनुमति ली गई? हर साल करोड़ों खर्च होते हैं, पर्यटन के नाम पर तर्क दिए जाते हैं, पर पर्यटक कहां हैं? स्थायी रोजगार कहां है? आर्थिक लाभ का हिसाब कहां है? झुमका अब प्राकृतिक स्थल कम और कंक्रीट की प्रदर्शनी ज्यादा लगता है।
ओपन थियेटर: संस्कृति का मंच या बजट का मंच?- ओपन थियेटर का निर्माण ऐसे प्रस्तुत किया गया जैसे जिले की सांस्कृतिक क्रांति की शुरुआत हो गई हो, पर स्थानीय लोगों का कहना है— जिले में खेल मैदान की कमी है, स्थायी सांस्कृतिक केंद्र की कमी है, शिक्षा ढांचे की कमी है, लेकिन प्राथमिकता किसे मिली? फोटो-फ्रेंडली ढांचों को।
शिक्षा पर प्रहार, आयोजन पर प्यार- रामानुज हायर सेकेंडरी स्कूल का मैदान वर्षों से प्रशासनिक आयोजनों का भार उठाता रहा है, कार्यक्रम के दौरान पढ़ाई बाधित होना मानो परंपरा बन चुकी है, महाविद्यालय परिसर में प्रशासनिक कार्यालय स्थापित होना और विद्यालयों में बार-बार आयोजन—यह संकेत देता है कि शिक्षा “सहायक गतिविधि” बनकर रह गई है, जिला शिक्षा हब था, अब मंच हब बनता जा रहा है।
करोड़ों का खर्च : हिसाब कौन देगा?- सबसे बड़ा प्रश्न— महोत्सव पर कुल खर्च कितना हुआ? क्या जनता को बताया गया? क्या सोशल ऑडिट हुआ? क्या स्वतंत्र एजेंसी से गुणवत्ता जांच हुई? यदि सब कुछ नियमसम्मत है, तो आंकड़े सार्वजनिक करने में हिचक क्यों? पारदर्शिता होगी तो विश्वास होगा, अन्यथा “भ्रष्टाचार की बैटिंग” का आरोप लगता रहेगा।
भ्रष्टाचार की बैटिंग: चौके-छक्के जारी- स्थानीय हलकों में व्यंग्य चल पड़ा है— महोत्सव नहीं, भ्रष्टाचार प्रीमियर लीग चल रही है, हर साल नई पारी, नया ठेका, नया बजट, और गेंदबाज? वह शायद चयन सूची में ही अटका है, जब तक जवाबदेही का तेज गेंदबाज मैदान में नहीं उतरेगा, तब तक चौके-छक्के लगते रहेंगे—और तालियां भी बजती रहेंगी।
असली सवाल:
क्या महोत्सव स्थायी विकास दे रहा है?
क्या पर्यटन में वास्तविक वृद्धि हुई?
क्या स्थानीय युवाओं को रोजगार मिला?
क्या जिले की बुनियादी जरूरतें पूरी हुईं?
यदि जवाब “नहीं” की ओर झुकता है, तो महोत्सव केवल चकाचौंध बनकर रह जाएगा।
रोशनी बुझी, सवाल जलते रहे- मुख्यमंत्री का दौरा सम्पन्न हुआ, मंच की रोशनी मंद पड़ी, झालरें उतरीं, पर कोरिया की जनता अब केवल मंच नहीं, मंच के पीछे का हिसाब मांग रही है, महोत्सव यदि संस्कृति का उत्सव बने—स्वागत है, लेकिन यदि वह “खर्चोत्सव” बन जाए—तो सवाल उठना लोकतंत्र का अधिकार है, अब देखना यह है—क्या प्रशासन जवाब देगा? या अगला महोत्सव फिर वही पटकथा दोहराएगा?
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