
कोरिया,16 फरवरी 2026(घटती-घटना)। प्रदेश के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के कोरिया जिला प्रवास के बीच एक ऐसा मुद्दा उभरकर सामने आया है,जिसने स्वास्थ्य व्यवस्था की जमीनी हकीकत को उजागर कर दिया है,जिले की मितानिनें, ब्लॉक समन्वयक,स्वास्थ्य पंचायत समन्वयक और हेल्प डेस्क से जुड़ी कार्यकर्ता पिछले पाँच महीनों से लंबित मानदेय के भुगतान की मांग को लेकर आंदोलन की स्थिति में हैं,जिन महिलाओं को शासन स्वास्थ्य सेवाओं की रीढ़ कहता है, वे आज खुद आर्थिक संकट के आईसीयू में भर्ती हैं।
कोरिया जिले में मितानिनों की यह पुकार केवल स्थानीय मुद्दा नहीं, बल्कि प्रदेशव्यापी व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह है,अब सबकी निगाहें मुख्यमंत्री के फैसले पर टिकी हैं, अगर शीघ्र समाधान निकलता है तो यह संदेश जाएगा कि सरकार जमीनी कार्यकर्ताओं के साथ खड़ी है,अन्यथा,दिया तले अंधेरा वाली कहावत फिर सच साबित होगी। (यह समाचार संगठन प्रतिनिधियों, ज्ञापनों और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर तैयार किया गया है,प्रशासन का आधिकारिक पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।
प्रशासनिक चुप्पी या तंत्र की जटिलता?
स्वास्थ्य विभाग के सूत्रों का तर्क है कि बजट आवंटन और तकनीकी स्वीकृति में विलंब के कारण भुगतान अटका है। परंतु सवाल यह है कि,जब योजनाओं की मॉनिटरिंग समय पर हो सकती है,तो भुगतान प्रक्रिया क्यों नहीं? विशेषज्ञों का मानना है कि मितानिन प्रणाली सामुदायिक स्वास्थ्य मॉडल का अहम हिस्सा है। यदि इनके मनोबल में गिरावट आती है तो ग्रामीण स्वास्थ्य ढांचा सीधे प्रभावित होगा।
मुख्यमंत्री प्रवास उम्मीद या औपचारिकता?
मुख्यमंत्री के प्रवास को लेकर जिले में प्रशासनिक हलचल तेज है, कार्यक्रमों और घोषणाओं की तैयारी चल रही है, मितानिनों की अपेक्षा है कि मुख्यमंत्री उनके प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात कर स्पष्ट निर्देश देंगे। उनका कहना है— हमें भाषण नहीं,भुगतान चाहिए।
सेवा निरंतर,भुगतान बंद
मितानिनें गांव-गांव जाकर टीकाकरण,गर्भवती महिलाओं की निगरानी, कुपोषण सर्वे, मलेरिया-जांच,आयुष्मान पंजीयन और विभिन्न स्वास्थ्य योजनाओं का क्रियान्वयन करती हैं। कोविड काल में भी इन्होंने घर-घर सर्वे कर जोखिम उठाया,लेकिन अक्टूबर माह से मानदेय अटका हुआ है,सूत्रों के अनुसार—प्रोत्साहन राशि आंशिक रूप से जारी हुई, भुगतान का स्पष्ट ब्योरा (राज्यांश-केंद्रांश) उपलब्ध नहीं,दावा पत्रक के मुकाबले राशि कम मिली,नियमित बजट प्रवाह बाधित बताया जा रहा है,मैदानी स्तर पर असंतोष गहरा है,परंतु जिम्मेदार विभागों की ओर से स्पष्ट जवाब अब तक सामने नहीं आया।
आर्थिक संकटः परिवारों पर सीधा असर
- कर्ज का बोझ
मानदेय न मिलने के कारण कई समन्वयकों ने निजी उधार लिया है। ब्याज दरें 2त्न से 5 प्रतिशत मासिक तक बताई जा रही हैं, पाँच महीने की देरी ने कर्ज को दोगुना कर दिया। - बच्चों की पढ़ाई प्रभावित
स्कूल फीस जमा न होने से नोटिस मिल रहे हैं, कुछ परिवारों ने बच्चों को निजी स्कूल से निकालकर सरकारी स्कूल में भेजने का निर्णय लिया। - बुजुर्गों का इलाज अधूरा
स्वास्थ्य कार्यकर्ता होने के बावजूद अपने घर के बुजुर्गों का इलाज कराने में असमर्थता विडंबना बन गई है, एक ब्लॉक समन्वयक ने नाम न छापने की शर्त पर कहा—हम दूसरों के घर प्रसव के लिए रात में भी जाते हैं, लेकिन हमारे घर में राशन की चिंता बनी रहती है।
ज्ञापन से जनप्रतिनिधि तकः पर समाधान दूर
मितानिन संगठन ने सीएमएचओ कार्यालय, जिला प्रशासन और राज्य स्तर तक ज्ञापन सौंपे हैं।
पुष्पेंद्र राजवाड़े,अध्यक्ष कोरिया जन सहयोग समिति,ने कहा… मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपा गया है। सरकार को शीघ्र लंबित भुगतान करना चाहिए ताकि इन महिलाओं की आर्थिक स्थिति सुधरे।
वहीं,सरोज सिंह सेंगर,प्रदेश अध्यक्ष,स्वास्थ्य मितानिन संघ छत्तीसगढ़, का कहना है—ब्लॉक से राज्य स्तर तक गुहार लगा चुके हैं। अक्टूबर से फरवरी तक का मानदेय तुरंत जारी हो। परिवार चलाना मुश्किल हो गया है।
सामाजिक और राजनीतिक संदेश
यह मुद्दा केवल वेतन का नहीं, बल्कि व्यवस्था की संवेदनशीलता का भी है।
यदि जमीनी स्तर की महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता आर्थिक असुरक्षा में रहेंगी, तो योजनाओं की सफलता प्रभावित होगी,मुख्यमंत्री का यह दौरा प्रशासन के लिए एक परीक्षा भी है,क्या सरकार अपने स्वास्थ्य तंत्र की “रीढ़” को मजबूती देगी,या फिर आश्वासन की परंपरा जारी रहेगी?
मुख्य मांगें…
अक्टूबर से लंबित 5 माह का पूरा मानदेय तत्काल जारी किया जाए।
प्रोत्साहन राशि में पारदर्शिता हो,राज्यांश और केंद्रांश का स्पष्ट उल्लेख मिले।
भविष्य में नियमित भुगतान सुनिश्चित करने के लिए स्थायी बजट व्यवस्था बने।
हेल्प डेस्क व समन्वयकों की भूमिका को औपचारिक मान्यता मिले।
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