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बैकुण्ठपुर@ झुमका से कोरिया तक…महोत्सव बदला या मंशा? फरवरी की तारीखों पर उठे तीखे सवाल

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  • नाम बदला…मंच वही…झुमका महोत्सव हुआ गायब,कोरिया महोत्सव की एंट्री पर चर्चा तेज
  • वीआईपी दौरा और चमकता शहरः क्या कोरिया महोत्सव बना प्रशासनिक परफॉर्मेंस शो?
  • जिला स्थापना मई में,उत्सव फरवरी में! कोरिया महोत्सव की टाइमिंग पर घिरा प्रशासन
  • स्कूल परिसर में महोत्सव,बोर्ड परीक्षा किनारे-कोरिया उत्सव पर उठे नए सवाल…
  • अमृतधारा से झुमका और अब कोरियाःमहोत्सवों की बदलती राजनीति का नया अध्याय

रवि सिंह
बैकुण्ठपुर,13 फरवरी 2026 (घटती-घटना)।
कोरिया जिला मुख्यालय इन दिनों किसी फिल्मी सेट की तरह सजाया जा रहा है, सड़कों के गड्ढे अचानक विकास की रफ्तार पकड़ चुके हैं, अतिक्रमणों को प्रशासनिक ‘डाइट प्लान’पर भेज दिया गया है, टेंट-पंडाल ऐसे खड़े हो रहे हैं मानो शहर में लोकतंत्र नहीं,बल्कि शादी-ब्याह का सीजन आ गया हो,वजह भी खास है—तीन दिवसीय कोरिया महोत्सव, मुख्यमंत्री के आगमन की खबर ने प्रशासनिक मशीनरी में ऐसा जोश भर दिया है कि वर्षों से सुस्त पड़े काम भी अचानक ‘फास्ट ट्रैक’ पर दौड़ते नजर आ रहे हैं, लेकिन जितनी तेज़ी से तैयारियाँ हो रही हैं,उतनी ही तेजी से सवाल भी उठ रहे हैं—और व्यंग्य की धार भी।
25 मई का जिला,फरवरी का उत्सव इतिहास छुट्टी पर क्यों?
कोरिया जिले का जन्मदिन 25 मई 1998 बताया जाता है,लेकिन उत्सव फरवरी में मनाया जा रहा है,अब यह प्रशासनिक कैलेंडर की नई गणित है या फिर इतिहास से छुट्टी लेने का प्रयोग-यह जनता की समझ से बाहर है,लोग पूछ रहे हैं कि जब जिले का अस्तित्व मई में आया तो फरवरी में महोत्सव मनाने की ऐसी कौन-सी ज्योतिषीय मजबूरी थी? या फिर तारीखें भी अब वीआईपी शेड्यूल देखकर तय होती हैं?
झुमका महोत्सवः नाम बदला या याददाश्त मिटाई गई?
कुछ साल पहले तक इसी मौसम में झुमका महोत्सव हुआ करता था,पर्यटन को बढ़ावा देने की बात होती थी,झुमका बांध के तट पर रंगीन कार्यक्रम होते थे और प्रशासन पर्यटन की बातें करता था। अब अचानक झुमका गायब और कोरिया महोत्सव हाजि़र! ऐसा लग रहा है जैसे जिले के महोत्सव भी मोबाइल ऐप की तरह हैं—अपडेट आते ही नाम और आइकन बदल जाते हैं,लेकिन यूजर यानी जनता वही पुरानी कहानी देखती रहती है, झुमका महोत्सव 2023 में शुरू हुआ, दो बार ही आयोजित हो पाया, और अब तीसरे साल उसका नामो-निशान ही बदल गया, करोड़ों खर्च कर ब्रांडिंग की गई,और फिर एक दिन नया बोर्ड लगा दिया गया—‘अब हम कोरिया महोत्सव हैं।’ पर्यटन की योजनाएँ शायद फाइलों में ही घूम रही हैं।
तैयारियाँ इतनी भव्य कि पदोन्नति की खुशबू भी आने लगी
शहर की साज-सज्जा देखकर लोगों के बीच फुसफुसाहट है कि यह सिर्फ उत्सव नहीं, बल्कि प्रशासनिक ‘परफॉर्मेंस शो’ भी हो सकता है, सड़कें चमक रही हैं, लाइटें जगमगा रही हैं और हर विभाग अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में लगा है, कहने वाले तो यह भी कह रहे हैं कि कहीं यह आयोजन प्रशासनिक सीवी में गोल्डन लाइन जोड़ने का प्रयास तो नहीं? हालांकि आधिकारिक तौर पर कोई कुछ नहीं कह रहा, लेकिन व्यंग्य यही है कि जिले की समस्याएँ सालभर इंतजार करती हैं और वीआईपी दौरा आते ही समाधान भी ‘एक्सप्रेस मोड’ में आ जाता है।
विद्यालय परिसर में महोत्सव—बोर्ड परीक्षाओं की ‘साउंड टेस्ट’- कोरिया जिला शायद प्रदेश का इकलौता जिला बनने जा रहा है, जहां बोर्ड परीक्षाओं के ठीक पहले विद्यालय परिसर में महोत्सव का मंच सज रहा है,दो-दो स्कूल चल रहे हैं,परीक्षा केंद्र भी है,और उसी के बीच तीन दिन का ध्वनि-प्रदूषण पैकेज तैयार है, विद्यार्थी किताब खोलें या डीजे की बीट गिनें—यह सवाल अब अभिभावकों के बीच चर्चा का विषय है। प्रशासन के लिए यह शायद सांस्कृतिक कार्यक्रम है,लेकिन परीक्षार्थियों के लिए यह ‘म्यूजिक सिस्टम वाला सिलेबस’ साबित हो सकता है।
पर्यटन का सपना या खर्च का नया बहाना?- झुमका महोत्सव पर्यटन बढ़ाने के नाम पर शुरू हुआ था,अब कोरिया महोत्सव किस उद्देश्य से हो रहा है—यह स्पष्ट नहीं है, पर्यटन स्थल पर आयोजन नहीं, बल्कि स्कूल परिसर में कार्यक्रम… तो फिर सवाल उठना लाज़मी है कि क्या यह सांस्कृतिक उत्सव है, प्रशासनिक प्रदर्शन है या सिर्फ सरकारी कैलेंडर का एक नया इवेंट?
पर्यटन नहीं तो फिर महोत्सव क्यों? नाम बदला या जिम्मेदारी से बचने की कोशिश
जब जिले के पास बड़े पर्यटन स्थलों की कमी बताई जाती रही है,तो सवाल उठना लाज़मी है कि आखिर कोरिया महोत्सव के नाम पर लाखों रुपये खर्च करने की जरूरत क्या है. संकेत साफ नजर आ रहे हैं कि अब झुमका महोत्सव का आयोजन शायद अतीत की बात बन चुका है। मुख्यमंत्री का दौरा झुमका क्षेत्र में जरूर होगा,लेकिन मंच पर झुमका नाम नहीं दिखाई देगा। ऐसे में चर्चा यह भी है कि क्या जिला प्रशासन ने नाम इसलिए बदला क्योंकि झुमका पर्यटन की दृष्टि से अपेक्षित पहचान नहीं बना पाया? यदि खुद प्रशासन ही जिले में पर्यटन की संभावनाओं को लेकर आश्वस्त नहीं दिख रहा,तो फिर बार-बार नए नामों से महोत्सव आयोजित कर सरकारी खजाने पर बोझ डालने का औचित्य क्या है—यह सवाल अब आम लोगों की जुबान पर भी साफ सुनाई देने लगा है।
अमृतधारा से झुमका,झुमका से कोरिया-महोत्सवों की ट्रांसफर पोस्टिंग
जब कोरिया और एमसीबी एक साथ थे,तब अमृतधारा महोत्सव चलता था,जिला बंटा तो अमृतधारा उधर चला गया और झुमका इधर आ गया,अब झुमका की जगह कोरिया महोत्सव आ गया,लगता है महोत्सव भी सरकारी कर्मचारियों की तरह हैं—हर कुछ साल में नई पोस्टिंग,नया नाम और नई जिम्मेदारी।
नाम बदलो, सवाल मत पूछो?
झुमका में करोड़ों खर्च करने के बाद अचानक नया नाम देना लोगों को चौंका रहा है, लगता है जिले में महोत्सवों की पहचान भी मौसम की तरह बदलती है-कभी अमृतधारा,कभी झुमका,अब कोरिया…और शायद अगले साल कोई नया नाम भी आ जाए,जनता पूछ रही है-क्या महोत्सव बदलने से जिले की समस्याएँ भी बदल जाएंगी, या सिर्फ पोस्टर और बैनर ही बदलेंगे? कुल मिलाकर, कोरिया महोत्सव की चमकदार तैयारियों के बीच सवालों की परछाइयाँ भी उतनी ही लंबी होती जा रही हैं, शहर सज रहा है, मंच तैयार हो रहे हैं, लेकिन लोगों के मन में यह जिज्ञासा बनी हुई है कि यह उत्सव वास्तव में जिले की पहचान बनेगा या सिर्फ प्रशासनिक प्रयोग की एक और कहानी बनकर रह जाएगा।


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