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कोरिया@ पत्रकारों की जागरूकता से जागा सिस्टम, जले ट्रक ने खोली प्रतिबंधित थाई मांगुर की पोल

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  • आग में जले ट्रक से खुला बड़ा खेल, खबर छपी तो हरकत में आया मत्स्य विभाग
  • प्रतिबंध कागजों में सख्त, सड़क पर धड़ल्ले से कारोबार — हादसे ने खोल दी हकीकत
  • दैनिक घटती घटना की खबर का असर : प्रतिबंधित थाई मांगुर मछली का किया गया डिस्पोज
  • मीडिया की नजर पड़ी तो चली कार्रवाई, वरना चलता रहता प्रतिबंधित मछली का खेल
  • हादसा बना सबूत, सिस्टम बना मूकदर्शक — जले ट्रक से उजागर हुआ अवैध नेटवर्क
  • जब आग लगी तब खुली आंखें : प्रतिबंधित थाई मांगुर की सप्लाई पर सवाल
  • जांच चौकियां खामोश क्यों? जले ट्रक ने बता दी सच्चाई
  • दैनिक घटती घटना फॉलो-अप खबर

-रवि सिंह-
कोरिया,12 फरवरी 2026(घटती-घटना)।
जिले में प्रतिबंधित थाई मांगुर मछली के अवैध परिवहन का मामला अब प्रशासनिक सुस्ती और निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है,पत्रकारों की सक्रियता और दैनिक घटती-घटना में खबर को प्रमुखता से प्रकाशित किए जाने के बाद आखिरकार प्रशासन और मत्स्य विभाग हरकत में आया और बरामद मछलियों को नियमानुसार नष्ट करने की कार्रवाई की गई। जिला मुख्यालय से करीब 15 किलोमीटर दूर उस वक्त हड़कंप मच गया,जब उड़ीसा से मध्यप्रदेश की ओर जा रहे एक ट्रक में शॉर्ट सर्किट के कारण आग लग गई, आग बुझाने और जांच के दौरान जब ट्रक के भीतर झांककर देखा गया,तो बड़ी मात्रा में प्रतिबंधित थाई मांगुर मछली मिलने से पूरा मामला उजागर हो गया,यह वही मछली है,जिसके पालन, परिवहन और भंडारण पर पूरे भारत में प्रतिबंध है,फिर भी खुलेआम इसका अवैध कारोबार चलता रहा।
देर शाम डिस्पोज की गई प्रतिबंधित मछलियां
घटना सामने आने के बाद देर शाम रामदईया धाम के आगे सहायक मत्स्य अधिकारी रविन्द्र शर्मा की उपस्थिति में जब्त की गई थाई मांगुर मछलियों को सुरक्षित तरीके से डिस्पोज किया गया। अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि यह प्रजाति पर्यावरण और स्थानीय जैव विविधता के लिए हानिकारक मानी जाती है, इसलिए इसके परिवहन पर पूर्ण प्रतिबंध है और नियमानुसार इसे नष्ट करना अनिवार्य था। फिलहाल पूरे मामले की जांच जारी बताई जा रही है।
हादसा नहीं होता तो शायद दबा रहता सच
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस ट्रक में प्रतिबंधित मछली भरी थी, वह जशपुर, सरगुजा और सूरजपुर जैसे जिलों से गुजरते हुए कोरिया तक पहुंच गया, लेकिन किसी भी स्तर पर रोकथाम नहीं हो पाई। यदि ट्रक में आग नहीं लगती, तो शायद यह अवैध खेप बिना किसी कार्रवाई के अपने गंतव्य तक पहुंच जाती, इससे साफ संकेत मिलता है कि निगरानी तंत्र या तो पूरी तरह निष्कि्रय था या फिर केवल कागजों तक सीमित रह गया था।
मीडिया पहुंची तो जागा विभाग
स्थानीय लोगों का कहना है कि घटना की जानकारी पहले सीमित दायरे में ही थी, लेकिन जैसे ही मीडिया मौके पर पहुंची और खबर को प्रमुखता से प्रकाशित किया गया, तब जाकर संबंधित विभागों की नींद खुली। इसके बाद प्रशासन और मत्स्य विभाग ने तेजी दिखाते हुए मछलियों को नष्ट करने की कार्रवाई की। यह घटनाक्रम एक बार फिर यह साबित करता है कि कई बार प्रशासनिक कार्रवाई तब ही होती है, जब मामला सार्वजनिक दबाव में आता है।
सिस्टम पर उठे कड़े सवाल- यह मामला सिर्फ एक ट्रक या एक खेप तक सीमित नहीं माना जा रहा। सवाल यह उठ रहा है कि आखिर इतनी बड़ी मात्रा में प्रतिबंधित मछली राज्यों की सीमाएं पार करते हुए कैसे आगे बढ़ती रही? क्या जांच चौकियां केवल औपचारिकता बनकर रह गई हैं? क्या संबंधित विभागों को इसकी भनक नहीं थी, या फिर जिम्मेदार लोग जानबूझकर अनदेखी करते रहे?
आगे की जांच पर टिकी नजरें- प्रशासन ने कहा है कि पूरे मामले की विस्तृत जांच की जा रही है और अवैध परिवहन में शामिल लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी, हालांकि आम लोगों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि केवल मछलियों को नष्ट कर देने से जिम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती, असली कार्रवाई तब मानी जाएगी, जब इस अवैध नेटवर्क में शामिल लोगों की पहचान कर कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाए, फिलहाल एक जला हुआ ट्रक पूरे सिस्टम के लिए आईना बन गया है — जिसने दिखा दिया कि प्रतिबंध कागजों पर सख्त हैं, लेकिन जमीन पर उनकी हकीकत कितनी कमजोर है, पत्रकारों की जागरूकता से हुई यह कार्रवाई अब प्रशासनिक जवाबदेही की बड़ी परीक्षा बन चुकी है।


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