- धन्यवाद के बहाने श्रेय की राजनीति? बैकुंठपुर अस्पताल पर फोटो बनाम हकीकत
- अस्पताल अधूरा… श्रेय पूरा ! बैकुंठपुर में आभार की आड़ में सियासी संदेश
- धन्यवाद या दावा? 23 करोड़ की स्वीकृति के बाद शुरू हुई श्रेय की दौड़
- ईंट किसकी,फोटो किसका? अस्पताल निर्माण पर सियासी ‘सेल्फी’ युद्ध
- आभार की पोस्ट या क्रेडिट की कोशिश? बैकुंठपुर में अस्पताल से ज्यादा चर्चा तस्वीरों की
- अस्पताल से पहले श्रेय का उद्घाटन! बैकुंठपुर की राजनीति पर व्यंग्य…


-रवि सिंह-
बैकुंठपुर,05 फरवरी 2026 (घटती-घटना)। कोरिया जिले में लंबे समय से अधूरे पड़े 200 बिस्तर वाले जिला चिकित्सालय के निर्माण को आखिरकार नई रफ्तार मिलने जा रही है, छत्तीसगढ़ शासन के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग द्वारा 23 करोड़ रुपये से अधिक की प्रशासकीय स्वीकृति मिलने के बाद जहां जिलेवासियों में खुशी का माहौल है, वहीं इस स्वीकृति के बाद शुरू हुई राजनीतिक हलचल और श्रेय की चर्चा भी अब खुलकर सामने आने लगी है, खासकर बैकुंठपुर की पूर्व विधायक द्वारा सोशल मीडिया पर किए गए आभार पोस्ट ने इस मुद्दे को नया राजनीतिक रंग दे दिया है, लेकिन जैसे ही निर्माण की राह साफ हुई, बैकुंठपुर की राजनीति में एक पुराना खेल फिर से शुरू हो गया — धन्यवाद भी हमारा…और श्रेय भी हमारा। बता दे की अस्पताल की इमारत अभी पूरी तरह खड़ी भी नहीं हुई, लेकिन सोशल मीडिया की दीवारों पर राजनीतिक तस्वीरें जरूर खड़ी हो गईं,पूर्व विधायक का आभार पोस्ट सामने आया, जिसमें स्वास्थ्य मंत्री और क्षेत्रीय विधायक को धन्यवाद दिया गया। पर उसी पोस्ट में अपने कार्यकाल की यादें और पुरानी तस्वीरें भी शामिल थीं, अब जनता पूछ रही है — यह कृतज्ञता है या ‘क्रेडिट कार्ड’ का बिल पहले से भरने की कोशिश? सियासत का यह पुराना नियम है कि काम चाहे किसी का भी हो, फोटो में सबको जगह चाहिए, फर्क बस इतना है कि पहले मंच पर माला पहनाई जाती थी, अब टाइमलाइन पर पोस्ट सजाई जाती है, व्यंग्य यह है कि अस्पताल का निर्माण वर्षों तक फाइलों में सोता रहा, लेकिन जैसे ही स्वीकृति आई, राजनीति जाग गई, सवाल यह भी उठ रहा है कि अगर यह परियोजना इतनी ही महत्वपूर्ण थी, तो पहले इसे डीएमएफ के भरोसे क्यों छोड़ा गया? क्या तब नीति सही थी और अब गलत है, या फिर हर दौर में नीति वही सही होती है जिसमें राजनीतिक फायदा ज्यादा दिखे? जानकारों का कहना है कि अगर शुरुआत से ही स्वास्थ्य विभाग की सीधी स्वीकृति ली जाती, तो शायद आज मरीजों को जमीन पर लेटकर इलाज नहीं कराना पड़ता, जिले की जनता के लिए अस्पताल कोई राजनीतिक मंच नहीं, बल्कि जीवन की जरूरत है, लेकिन यहां चर्चा इलाज से ज्यादा इमेज की हो रही है। एक तरफ सरकार के समर्थक इसे वर्तमान नेतृत्व की उपलब्धि बता रहे हैं, तो दूसरी तरफ विपक्ष यह याद दिलाने में लगा है कि नींव उनके समय में रखी गई थी, जनता के बीच अब नया व्यंग्य चल पड़ा है — ‘ईंटें किसने रखीं और छत किसने डाली, इसका हिसाब तो नेता करेंगे… मरीजों को बस बिस्तर चाहिए। ‘
विपक्ष ने भी जताया आभार, पूर्व विधायक का पोस्ट चर्चा में
प्रशासकीय स्वीकृति के बाद जहां आम नागरिकों और विभिन्न संगठनों ने स्वास्थ्य मंत्री और सरकार को धन्यवाद दिया, वहीं जिले का विपक्ष भी खुलकर आभार जताता नजर आया, इसी बीच बैकुंठपुर की पूर्व विधायक द्वारा किया गया सोशल मीडिया पोस्ट चर्चा का विषय बन गया, उन्होंने अपने पोस्ट में स्वास्थ्य मंत्री और क्षेत्रीय विधायक को धन्यवाद देते हुए अपने कार्यकाल में अस्पताल निर्माण की शुरुआत का भी उल्लेख किया और कुछ पुरानी तस्वीरें साझा कीं।
अधूरा सपना,अब पूरी होने की उम्मीद
जिला चिकित्सालय बैकुंठपुर का नया भवन वर्षों से अधूरा पड़ा हुआ था, इस परियोजना की शुरुआत पूर्ववर्ती कांग्रेस शासनकाल में हुई थी, लेकिन पर्याप्त और नियमित फंडिंग के अभाव में निर्माण कार्य बीच में ही रुक गया, बताया जाता है कि निर्माण के लिए डीएमएफ (जिला खनिज न्यास निधि) मद पर निर्भर रहने की रणनीति अपनाई गई थी, जिसके कारण समय पर पर्याप्त राशि उपलब्ध नहीं हो सकी और अस्पताल का ढांचा अधूरा रह गया, अब वर्तमान भाजपा सरकार के कार्यकाल में स्वास्थ्य विभाग ने सीधे प्रशासकीय स्वीकृति देते हुए 23 करोड़ से अधिक राशि मंजूर की है, इससे निर्माण कार्य दोबारा शुरू होने का रास्ता साफ हो गया है और उम्मीद जताई जा रही है कि जल्द ही जिले को आधुनिक सुविधाओं वाला 200 बिस्तरों का अस्पताल मिल सकेगा।
मरीजों की परेशानी बनी थी बड़ी वजह
अस्पताल निर्माण में देरी का खामियाजा जिले के हजारों मरीजों को भुगतना पड़ा, पुराने जिला चिकित्सालय में सीमित बिस्तरों के कारण कई मरीजों को जमीन पर लेटकर इलाज करवाने की मजबूरी रही, जबकि गंभीर मरीजों को दूसरे शहरों का रुख करना पड़ता था, ऐसे में नई स्वीकृति को स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है, स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर यह भवन समय पर पूरा हो जाता तो जिले की स्वास्थ्य तस्वीर काफी पहले बदल चुकी होती।
आभार या श्रेय? लोगों के बीच उठे सवाल
पूर्व विधायक के पोस्ट के बाद जिले में यह बहस तेज हो गई है कि यह केवल कृतज्ञता ज्ञापन है या फिर अपने हिस्से का श्रेय याद दिलाने की कोशिश, कई लोग इसे राजनीतिक परंपरा का हिस्सा मानते हुए कहते हैं कि बड़े प्रोजेक्ट्स में हर नेता अपनी भूमिका दिखाना चाहता है, जबकि कुछ लोग इसे श्रेय की होड़ बताते हुए तंज कस रहे हैं— ‘अस्पताल अभी बना नहीं, लेकिन श्रेय की राजनीति पहले से तैयार है। ‘
डीएमएफ मॉडल पर भी उठे सवाल
जानकारों का मानना है कि शुरुआत में डीएमएफ मद पर निर्भर रहने के बजाय यदि सीधे स्वास्थ्य विभाग से प्रशासकीय स्वीकृति ली जाती, तो निर्माण कार्य वर्षों पहले पूरा हो सकता था, अब विभागीय स्तर से मिली स्वीकृति को प्रशासनिक दृष्टि से सही कदम माना जा रहा है, जिससे फंडिंग में स्पष्टता आएगी और निर्माण की गति बढ़ेगी।
राजनीति से परे जनता की उम्मीद
हालांकि श्रेय और आभार की राजनीति अपनी जगह जारी है, लेकिन आम लोगों की प्राथमिकता सिर्फ इतनी है कि अस्पताल जल्द से जल्द बनकर तैयार हो और जिले को बेहतर स्वास्थ्य सुविधा मिले, जिले के वरिष्ठ नागरिकों का कहना है कि अस्पताल किसी एक सरकार या नेता का नहीं, बल्कि पूरे समाज की जरूरत है, इसलिए राजनीतिक बहस से ज्यादा ध्यान निर्माण कार्य की गुणवत्ता और समय-सीमा पर होना चाहिए।
आगे क्या?
अब सबकी नजर इस बात पर है कि स्वीकृति के बाद निर्माण कार्य कितनी तेजी से आगे बढ़ता है और कब तक यह बहुप्रतीक्षित 200 बिस्तर वाला जिला चिकित्सालय पूरी तरह तैयार होकर जनता की सेवा में समर्पित होता है,अगर काम समय पर पूरा होता है तो यह परियोजना कोरिया जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए मील का पत्थर साबित हो सकती है।
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