- विद्यालयों से कुत्ते भगाओ, दफ्तर में पालो: कोरिया डीईओ कार्यालय का दोहरा चेहरा
- शिक्षकों को आदेश, खुद दफ्तर में कुत्ता राज: कोरिया डीईओ कार्यालय में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश बेअसर
- कुर्सियों पर कुत्ते, फाइलों में कानून: जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय का हाल
- ग्रह-नक्षत्र के नाम पर सरकारी दफ्तर में आवारा कुत्तों का संरक्षण!
- शिक्षा कार्यालय है या आवारा कुत्तों का स्थायी डेरा?
- सुप्रीम कोर्ट के निर्देश फेल, कोरिया डीईओ कार्यालय में आवारा कुत्तों की भरमार
- डीईओ कार्यालय: जहां दरबान की कुर्सी पर आदमी नहीं कुत्ता बैठता है
- शिक्षा अधिकारी कार्यालय में कुत्तों का शासन, कानून फाइलों में कैद!
- विद्यालयों को आदेश, दफ्तर में कुत्ता पालना—यह कैसा प्रशासन?
- कुर्सियों पर कुत्ते, जिम्मेदारी शून्य: डीईओ कार्यालय की अराजकता
- कुत्तों के लिए दफ्तर पर जनता के लिए खतरा!
- यह कार्यालय है या कुत्तों का विश्राम गृह?
- जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय कोरिया में गंभीर प्रशासनिक चूक
- शासन के निर्देशों की अनदेखी, कार्यालय परिसर में खुलेआम पाले जा रहे आवारा कुत्ते


-रवि सिंह-
बैकुंठपुर,03 फरवरी 2026 (घटती-घटना)। कार्यालय जिला शिक्षा अधिकारी कोरिया इन दिनों शिक्षा नीति, शैक्षणिक गुणवत्ता या शिक्षकों की समस्याओं के लिए नहीं,बल्कि आवारा कुत्तों के सुरक्षित आश्रय स्थल के रूप में चर्चित है।
यह कोई पशु-प्रेम केंद्र नहीं, न ही नगर निगम का शेल्टर होम—फिर भी यहां दर्जनों आवारा कुत्ते पूरे शान से सरकारी कुर्सियों पर विराजमान दिखाई देते हैं। बता दे की कार्यालय जिला शिक्षा अधिकारी कोरिया में एक गंभीर और चौंकाने वाली प्रशासनिक लापरवाही सामने आई है, शासन के स्पष्ट निर्देशों और सार्वजनिक सुरक्षा से जुड़े दिशा-निर्देशों के बावजूद जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय परिसर में दर्जनों की संख्या में आवारा कुत्तों का खुलेआम विचरण किया जा रहा है, जिससे कार्यालय आने वाले शिक्षक,कर्मचारी एवं आम नागरिक स्वयं को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं, यह मामला केवल आवारा कुत्तों का नहीं,बल्कि प्रशासनिक लापरवाही, दोहरे मापदंड और जवाबदेही के पतन का प्रतीक है, शिक्षा विभाग अगर खुद अपने कार्यालय को सुरक्षित नहीं रख सकता, तो वह स्कूलों में अनुशासन और सुरक्षा की क्या मिसाल देगा?
कभी बाहर, कभी अंदरज्कुर्सियों पर आराम फरमाते कुत्ते- जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय का हाल यह है कि आवारा कुत्ते कभी बाहर रखी कुर्सियों पर तो कभी अंदर बाबुओं की कुर्सियों पर बेधड़क आराम फरमाते नजर आते हैं,
ये कुत्ते पूरे कार्यालय परिसर में स्वच्छंद विचरण करते हैं और अब तो किसी भी कुर्सी को अपना ठिकाना बनाने के आदि हो चुके हैं। कार्यालय आने वाले लोगों के लिए यह दृश्य आम हो चुका है, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह सामान्य प्रशासनिक व्यवस्था कही जा सकती है?
“बड़े बाबू” का संरक्षण और ग्रह-नक्षत्र का तर्क- सूत्रों की मानें—और यह बात कार्यालय से जुड़ा लगभग हर व्यक्ति जानता है—कि इन आवारा कुत्तों को एक कार्यालयीन बाबू का खुला संरक्षण प्राप्त है, बताया जाता है कि उक्त बाबू की मान्यता है कि कुत्तों को पालने से ग्रह-नक्षत्र स्थिर रहते हैं, अब यह ग्रह-नक्षत्र क्यों और कैसे बिगड़ सकते हैं, यह तो वही जानें, लेकिन इतना तय है कि इस अंधविश्वास की कीमत सार्वजनिक सुरक्षा चुका रही है।
दर्जनों कुत्ते, अब पूरा कुनबा- स्थिति यहां तक पहुंच चुकी है कि कार्यालय में कुत्तों की संख्या दर्जनों में दिखाई देना आम बात हो गई है, केवल यही नहीं, अब इन कुत्तों का पूरा कुनबा जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय परिसर में निश्चिंत होकर निवास कर रहा है, इनके छोटे-छोटे बच्चे भी अब दहाई के आंकड़े को छू चुके हैं, जिससे आने वाले समय में खतरा और बढ़ने की आशंका है।
हर कमरे में बेरोकटोक आवाजाही, लोगों पर गुर्राहट- ये आवारा कुत्ते सिर्फ कुर्सियों तक सीमित नहीं हैं, वे कार्यालय के हर कमरे में निडर होकर चले जाते हैं, प्रतिदिन सैकड़ों की संख्या में आने वाले शिक्षक, पालक, व्यापारी, नेता और पत्रकारों को देखकर कई बार ये कुत्ते गुर्राते हुए भी नजर आते हैं, जिससे किसी भी समय अप्रिय घटना की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
खतरे की आदत डाल चुका कार्यालय- चिंताजनक तथ्य यह है कि इस संभावित खतरे से कार्यालय का अधिकारी-कर्मचारी वर्ग पूरी तरह निश्चिंत दिखाई देता है, वजह साफ है—वे इन कुत्तों को इस तरह घूमते देखने के आदी हो चुके हैं।
लेकिन सवाल यह है कि क्या आदत पड़ जाना खतरे को खत्म कर देता है?
दरबान की कुर्सी पर कुत्ता!- ताजा तस्वीर जिला शिक्षा अधिकारी के कक्ष के सामने की बताई जा रही है, यह वही कुर्सी है, जिस पर कभी दरबान बैठता है या फिर बाहर से मिलने आए शिक्षक, पालक, नेता, पत्रकार या व्यापारी बैठते हैं, आज उसी कुर्सी पर आवारा कुत्ता विराजमान है—और यही तस्वीर पूरे मामले की सच्चाई बयां करने के लिए काफी है।
शिक्षकों को ज्ञान, दफ्तर में कुत्तों को सम्मान– विडंबना देखिए यही विभाग स्कूलों को आदेश जारी करता है कि “आवारा कुत्तों को परिसर से बाहर भगाया जाए”, और दूसरी ओर खुद के कार्यालय में कुत्तों को, कभी बाहर रखी कुर्सियों पर, तो कभी बाबुओं की कुर्सियों पर आराम फरमाते हुए देखा जा सकता है, लगता है शिक्षा विभाग ने “अनुशासन” की परिभाषा बदल दी है शिक्षकों के लिए नियम, कार्यालय के लिए छूट! सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि यही विभाग स्कूल परिसरों में आवारा कुत्तों को भगाने के निर्देश शिक्षकों को जारी करता है, लेकिन अपने ही कार्यालय में इन कुत्तों को खुले संरक्षण में रखा जा रहा है, यह स्थिति न केवल विभागीय अनुशासन पर सवाल खड़े करती है, बल्कि शासन की मंशा और आदेशों की अवहेलना को भी उजागर करती है।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश भी “काट” गए?- सार्वजनिक स्थलों पर आवारा कुत्तों से संभावित खतरे को लेकर माननीय उच्चतम न्यायालय के निर्देश समय-समय पर जारी होते रहे हैं, लेकिन कोरिया का शिक्षा कार्यालय शायद किसी अलग ही संविधान से संचालित हो रहा है, जहां कानून की किताबें अलमारी में और कुत्ते कुर्सियों पर दिनभर कार्यालय आने वाले शिक्षक, महिलाएं, बुजुर्ग और फरियादी डर के साए में काम निपटाने को मजबूर हैं, अगर कोई अप्रिय घटना होती है तो क्या विभाग यह कहकर पल्ला झाड़ लेगा कि—”कुत्ता सरकारी नहीं था”?
कुर्सियों पर आराम फरमाते आवारा कुत्ते- प्रत्यक्षदर्शियों और सूत्रों के अनुसार, ये आवारा कुत्ते कभी कार्यालय के बाहर रखी कुर्सियों पर तो कभी अंदर बाबुओं की कुर्सियों पर आराम करते देखे जाते हैं। कई बार कार्यालय समय के दौरान कुत्तों के झुंड परिसर में घूमते रहते हैं, जिससे फरियादियों और शिक्षकों में भय का माहौल बना रहता है, कार्यालय आने वाले बुजुर्ग, महिलाएं और दिव्यांगजन स्वयं को विशेष रूप से असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।
उच्चतम न्यायालय के निर्देशों की अवहेलना का आरोप- सूत्रों का कहना है कि सार्वजनिक कार्यालयों में इस तरह आवारा कुत्तों का खुलेआम रहना माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा समय-समय पर दिए गए सार्वजनिक स्थलों की सुरक्षा संबंधी निर्देशों की भावना के भी विपरीत है, यदि कार्यालय परिसर में किसी शिक्षक, कर्मचारी या आम नागरिक के साथ कोई अप्रिय घटना घटती है, तो उसकी जिम्मेदारी किसकी होगी—यह एक गंभीर प्रश्न बन गया है।
जनसुरक्षा बनाम विभागीय लापरवाही- यह मामला अब केवल कार्यालय की अव्यवस्था तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि जनसुरक्षा और प्रशासनिक जवाबदेही से सीधा जुड़ गया है, स्थानीय शिक्षकों और कर्मचारियों का कहना है कि वे कई बार इस समस्या की ओर मौखिक रूप से ध्यान दिला चुके हैं, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई।
उठते सवाल
क्या जिला शिक्षा अधिकारी को इस स्थिति की जानकारी नहीं है?
क्या एक कार्यालयीन कर्मचारी शासन के निर्देशों से ऊपर है?
यदि किसी को चोट या नुकसान होता है तो जिम्मेदारी कौन लेगा?
क्या प्रशासन इस मामले में संज्ञान लेगा या इसे नजरअंदाज किया जाएगा?
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