शिवप्रसादनगर धान खरीदी केंद्र: क्या प्रशासन के “दामाद” हैं समिति प्रबंधक और कथित धान माफिया?
घोटाला या गठजोड़? शिवप्रसादनगर में धान से ज्यादा भारी प्रशासन की चुप्पी
सब जानते हैं, पर कोई मानता नहीं: शिवप्रसादनगर धान घोटाले पर सत्ता की चुप्पी
अगर घोटाला नहीं है, तो जांच से डर क्यों? धान खरीदी नहीं, सबूतों की सफाई हुई
किसान लुटा, सिस्टम मौन: धान घोटाले की असली कहानी, जहां अंधेरा किया जाता है, वहां सच्चाई दिखती नहीं
बारदाना बोला नहीं, इसलिए रात में हटा दिया गया?
घोटाला धान का नहीं, हिम्मत का है, कानून सो गया, घोटाला जाग गया”
शिवप्रसादनगर: जांच नहीं होगी, यह भी तय है? घोटाला सबको दिखा, प्रशासन को नहीं!
6000 बारदाना, एक रात, और सन्नाटा
-ओंकार पाण्डेय-
सूरजपुर,03 फरवरी 2026 (घटती-घटना)। जिला सूरजपुर का शिवप्रसादनगर धान खरीदी केंद्र इन दिनों किसी अच्छी व्यवस्था या किसानों को राहत देने के लिए नहीं, बल्कि करोड़ों के कथित धान घोटाले को लेकर सुर्खियों में है, सवाल अब केवल घोटाले का नहीं, बल्कि उस संरक्षण का है, जिसने अब तक प्रशासन को भी मौन साधने पर मजबूर कर दिया है।
घोटाला सबको दिख रहा, पर प्रशासन को नहीं?- शिवप्रसादनगर क्षेत्र का शायद ही कोई किसान होगा जिसे यह न पता हो कि इस धान खरीदी केंद्र में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी हुई है, धान की वास्तविक खरीदी कम, टोकन और एंट्री ज्यादा यही वजह है कि यहां हजारों की संख्या में बारदाना बचा, इसके बावजूद प्रशासन यह मानने को तैयार नहीं कि यहां कोई घोटाला हुआ है, अब सवाल उठना लाजिमी है की कौन सी शक्ति है जो इस घोटाले को ढाल बनकर बचा रही है? राजनीतिक? प्रशासनिक? या फिर पैसों की ताकत?
“प्रशासन के दामाद” होने की चर्चा क्यों?- स्थानीय स्तर पर अब यह सवाल खुलेआम पूछा जा रहा है कि
क्या समिति प्रबंधक, धान खरीदी केंद्र प्रभारी और कथित धान माफिया प्रशासन के दामाद हैं? यह सवाल यूं ही नहीं उठ रहा,
बल्कि इसलिए उठ रहा है क्योंकि दो बार सत्यापन हुआ, शिकायतें ऊपर तक पहुंचीं, बिना नाम की गोपनीय शिकायतें भी गईं, फिर भी न जांच हुई, न कार्रवाई इस चुप्पी ने प्रशासन को ही संदेह के घेरे में ला खड़ा किया है।
खरीदी बंद होते ही “सबूत मिटाओ अभियान” शुरू?- धान खरीदी केंद्र में खरीदी की अंतिम तिथि 30 जनवरी 2026 थी, इसके बाद अब केवल धान उठाव होना था, लेकिन सूत्रों के अनुसार, धान उठाव से पहले ही सबूत मिटाने का काम शुरू हो गया, 2 फरवरी 2026 की रात: 6000 बारदाना “गायब”, सूत्रों से मिली सनसनीखेज जानकारी के अनुसार
2 फरवरी 2026 की रात शिवप्रसादनगर धान खरीदी केंद्र से 6000 से अधिक बारदाना चोरी-छिपे बाहर निकाला गया, रात 9:55 बजे एक पिकअप वाहन समिति में प्रवेश करता है, रात 10:27 बजे वही पिकअप बाहर निकलता है, जब गाड़ी अंदर जाती है—लाइट चालू, जब गाड़ी बाहर निकलती है—मरकरी सहित पूरे परिसर की लाइट बंद क्यों? क्या यह इसलिए किया गया ताकि सीसीटीवी कैमरे में वाहन कैद न हो, यदि प्रशासन चाहे तो सीसीटीवी फुटेज, समय, वाहन की मूवमेंट, सब कुछ जांचा जा सकता है, पर बड़ा सवाल यही है— क्या प्रशासन जांच करना चाहता भी है?
10 हजार बारदाना क्यों थे अतिरिक्त?– सूत्र बताते हैं कि धान की वास्तविक खरीदी नहीं हुई, पर टोकन काटे गए, एंट्री की गई, इसी वजह से केंद्र में 10,000 से अधिक बारदाना बच गया, यदि यह बारदाना प्रशासन के हाथ लग जाता,
तो पूरा घोटाला कागजों से बाहर आ जाता, इसी डर में, 2 फरवरी की रात बारदाना “ठिकाने” लगा दिया गया।
खबरें छपीं, सबूत दिए गए फिर भी सन्नाटा- इस पूरे मामले में कई बार खबरें प्रकाशित हुईं तथ्य दिए गए, समय, तारीख, तरीका बताया गया,लेकिन प्रशासन ने कान में रूई, आंखों पर पट्टी बांध रखी है। अब यह चुप्पी अज्ञान नहीं, सहमति जैसी दिखने लगी है।
सवाल जो अब दबाए नहीं जा सकते
क्या प्रशासन घोटाला मान चुका है, पर कार्रवाई नहीं करना चाहता?
क्या कोई “अदृश्य शक्ति” जांच से रोक रही है?
क्या जांच की हिम्मत किसी में नहीं, या सब नतमस्तक हैं?
अगर यही हाल रहा, तो किसान न्याय की उम्मीद किससे करे?
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