- नेत्रहीन दंपत्ति की टूटी ज़िन्दगी, योजनाएं फाइलों में और हकीकत अंधेरे में
- अंत्योदय छीना, पेंशन अधूरी: पंडो समाज के बुजुर्ग दंपत्ति की अनसुनी पीड़ा
- आजादी से पहले जन्म, अमृतकाल में उपेक्षा: पंडो समाज का दर्दनाक सच
- हम नहीं देख सकते साहबज् सरकार तो देख सकती है? नेत्रहीन बुजुर्ग की करुण पुकार
- नेत्रहीन पंडो दंपत्ति को नहीं मिल रहा योजनाओं का लाभ, सिस्टम पर सवाल
- गरीबी कम नहीं हुई, रोटी कम हो गई: अंत्योदय से प्राथमिकता तक पंडो परिवार की पीड़ा
- आधा महतारी वंदन, शून्य पेंशन और कटे राशन कार्ड ने बढ़ाई नेत्रहीन दंपत्ति की मुश्किलें



-राजन पाण्डेय-
सोनहत 21 जनवरी 2026 (घटती-घटना)। देश जब आज़ादी के अमृतकाल में प्रवेश कर चुका है, जब हर मंच से “सबका साथ–सबका विकास–सबका विश्वास” के नारे गूंज रहे हैं, उसी दौर में छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले के सोनहत विकासखंड से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो इन दावों पर गंभीर प्रश्न खड़े करती है, यह तस्वीर है विशेष संरक्षित जनजाति पंडो समाज के एक वृद्ध, नेत्रहीन और दिव्यांग दंपत्ति की, जिनका जीवन आज शासन की योजनाओं, प्रशासनिक प्रक्रियाओं और संवेदनहीन व्यवस्था के बीच दम तोड़ता नजर आ रहा है।
आज़ादी से पहले जन्म, आज अमृतकाल में संघर्ष- ग्राम पंचायत पोड़ी, विकासखंड सोनहत निवासी सोमार साय (लगभग 80 वर्ष, जन्म 1945) आज़ादी से पूर्व जन्मे हैं, वे दोनों आंखों से पूरी तरह नेत्रहीन हैं और एक पैर से दिव्यांग भी हैं, लंबे समय से पूर्ण रूप से दृष्टिहीन हैं, दोनों वृद्धों के पास न खेती की जमीन, न पेंशन की स्थायी आय, न कोई कमाने वाला परिजन, न नियमित सरकारी सहायता, उनकी पूरी जिंदगी आज सरकारी योजनाओं पर टिकी हुई है जो कागजों में तो मौजूद हैं, पर जमीन पर नहीं।
अंधेरे में गुजरती जिंदगी- जिस घर में बिजली की रोशनी तक बेअसर हो, वहां यह दंपत्ति पूरी तरह दूसरों के सहारे जीवन काट रहा है, चलने के लिए एक टूटी लाठी, खाने के लिए सरकारी राशन, इलाज के लिए पड़ोसियों की मदद यही इनकी पूरी दुनिया है, एक-दूसरे का हाथ थामे ये दोनों बुजुर्ग अब जीवन नहीं, बल्कि जीवित रहने की जद्दोजहद लड़ रहे हैं।
सिस्टम की मार: अंत्योदय छीना, रोटी कम हुई- इस परिवार की स्थिति तब और भयावह हो गई जब उनका अंत्योदय राशन कार्ड जो देश के सबसे गरीब, असहाय और निराश्रित परिवारों के लिए होता है बदलकर प्राथमिकता श्रेणी में कर दिया गया, इस बदलाव के बाद प्रति माह मिलने वाला राशन घट गया, अनाज की सुरक्षा खत्म हो गई, जीवन और असुरक्षित हो गया स्थानीय ग्रामीणों का सवाल है अगर यह परिवार अंत्योदय का पात्र नहीं है, तो फिर पात्र कौन है?
योजनाएं सिर्फ पोस्टर पर
सरकार की अनेक कल्याणकारी योजनाएं इस परिवार की चौखट तक पहुंचते-पहुंचते दम तोड़ देती हैं।
■ दिव्यांग पेंशन
नेत्रहीन और पैर से विकलांग होने के बावजूद आज तक नियमित पेंशन शुरू नहीं हो सकी। कभी दस्तावेज की कमी, कभी तकनीकी त्रुटि — फाइल वर्षों से प्रक्रिया में बताई जाती है।
■ महतारी वंदन योजना
महिला को योजना का लाभ तो मिल रहा है, लेकिन केवल ₹500 प्रतिमाह। कारण बताया जाता है कि उन्हें वृद्धा पेंशन मिलती है, जबकि वास्तविकता यह है कि वह भी अपर्याप्त है।
■ आवास योजना
कच्चा जीवन, टूटी दीवारें और असुरक्षित छत — फिर भी अब तक किसी आवास योजना का लाभ नहीं।
■ सहायक उपकरण
न व्हीलचेयर, न ट्राइसाइकिल — जबकि मुखिया चलने में असमर्थ हैं।
राष्ट्रपति का दत्तक पुत्र कहलाने वाला समाज आज उपेक्षित- पंडो समाज देश की विशेष संरक्षित जनजातियों में शामिल है, जिसे “राष्ट्रपति का दत्तक पुत्र” कहा जाता है, परंतु जमीनी हकीकत यह है कि इसी समाज का यह परिवार आज अपने बुनियादी अधिकारों के लिए दर-दर भटक रहा है।
प्रशासनिक व्यवस्था पर उठते सवाल
जिस घर में दोनों सदस्य नेत्रहीन हों, उसका अंत्योदय कार्ड किस आधार पर बदला गया?
दिव्यांग पेंशन वर्षों से क्यों लंबित है?
क्या विभागीय सर्वे सिर्फ कागजों में हो रहे हैं?
क्या प्रशासन ऐसे परिवारों तक स्वयं पहुंचने की जिम्मेदारी नहीं रखता?
मानवीय हस्तक्षेप की जरूरत
अंत्योदय राशन कार्ड तत्काल बहाल हो
दिव्यांग व वृद्धा पेंशन तुरंत स्वीकृत की जाए
महतारी वंदन योजना की पूरी राशि दिलाई जाए
प्रधानमंत्री/मुख्यमंत्री आवास योजना से लाभ दिया जाए
ट्राइसाइकिल या व्हीलचेयर उपलब्ध कराई जाए
नियमित स्वास्थ्य परीक्षण की व्यवस्था हो
एक वाक्य जो व्यवस्था को कठघरे में खड़ा करता है- नेत्रहीन बुजुर्ग सोमार साय की कांपती आवाज में सिर्फ एक सवाल है हम नहीं देख सकते साहबज् लेकिन सरकार तो देख सकती है न? यह सवाल केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि उन हजारों अदृश्य गरीबों की आवाज है, जिन तक योजनाएं अब भी नहीं पहुंच पाईं।
अब नजरें प्रशासन पर- अब यह जिम्मेदारी जिला प्रशासन की है कि वह स्वयं इस परिवार तक पहुंचे, जमीनी सच्चाई को देखे और यह सुनिश्चित करे कि शासन की योजनाएं वास्तव में अंतिम व्यक्ति तक पहुंचें, क्योंकि यदि अमृतकाल में भी कोई नेत्रहीन बुजुर्ग भूखा सोने को मजबूर है, तो विकास केवल आंकड़ों तक ही सीमित रह जाता है।
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