
कभी भी कोई देश अपने आप में अकेला नहीं रहा! व्यापार, संस्कृति, विश्व शांति आदि मामलों को लेकर दूसरे देशों के साथ संबंध बनाकर रखने पड़ते हैं! इससे संबंधित नीति को ही विदेश नीति कहते हैं! प्रत्येक देश की अपनी-अपनी विदेश नीति होती है जिसका उद्देश्य दूसरे देशों के साथ मेलजोल बढ़ाना, लोगों का एक दूसरे के यहां आना-जाना और एक दूसरे से कुछ सीखना, व्यापार आदि बातें शामिल होती है।
स्वतंत्र भारत की भी अपनी विदेश नीति रही है। जब पंडित जवाहरलाल नेहरू देश के प्रधानमंत्री थे उस समय हमारे देश ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन नाम के संगठन की श्रीलंका, इंडोनेशिया,मिश्र, युगोस्लाविया आदि देशों के साथ मिलकर स्थापना की थी। दूसरे विश्व युद्ध के बाद विश्व रशियन ब्लॉक तथा अमेरिकन ब्लॉक नाम से बंटा हुआ था। दोनों में शीत युद्ध चलता रहता था। परंतु भारत की नीति दोनों ब्लॉकों से दूर रहने की थी ताकि विश्व को युद्धों से बचाया जा सके। वैसे भारत की विदेश नीति के तहत हमने एशिया, अफ्रीका,ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका मंहद्वीपों के अलावा अरब देशों के साथ मधुर संबंध स्थापित किया! विदेश नीति के कारण भारत की दुनिया में बहुत ज्यादा इज्जत थी! इसी नीति को भारत ने पंडित जवाहरलाल नेहरू के समय से लेकर डॉ मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री रहने तक अपनाया! लेकिन धीरे-धीरे अंतरराष्ट्रीय माहौल तथा संबंधों में परिवर्तन आने लगा! रशियन ब्लॉक समाप्त हो गया! अमेरिका विश्व की सुपर पावर बन गया! लेकिन संयुक्त सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस का दबदबा कम नहीं हुआ! रूस हमारा निकटतम तथा विश्वसनीय मित्र बना रहा! बेशक 1962 में चीन ने भारत पर आक्रमण करके हमारा बहुत सारा इलाका अपने कब्जे में ले लिया था लेकिन इसके बावजूद भी मजबूरी में चीन के साथ हमें व्यापारिक संबंध बढ़ाने पड़े! हम अपनी जरूरत का 80त्न तेल विदेशों से आयात करते हैं। भारत के करोड़ों लोग खाड़ी के देशों के अतिरिक्त अन्य देशों में काम करते हैं। हमारी लाख कोशिशें के बावजूद पाकिस्तान और चीन के साथ हमारे संबंध नहीं सुधर सके। वर्तमान प्रधानमंत्री,नरेंद्र मोदी समय-समय पर विदेशी दौरे करके दूसरे देशों के साथ संबंध सुधारने की कोशिश करते रहते हैं। परंतु चीन और पाकिस्तान हमारे खेल को हमेशा बिगाड़ने की कोशिश करते रहते हैं। चीन ने हमारे पड़ोस के देशों जैसे नेपाल, श्रीलंका, म्यांमार, पाकिस्तान आदि में बहुत ज्यादा निवेश करके या इन्हें कर्ज देकर भारत के खिलाफ माहौल पैदा कर दिया है। पाकिस्तान भी कश्मीर समस्या को लेकर अरब देशों को भारत के खिलाफ उकसाता रहता है। पाकिस्तान भारत में आतंकवादी भेज कर हत्या, हिंसा, तोड़फोड़, लोगों में फूट डलवाने का काम करता रहता है। अभी कुछ समय पहले पहलगाम में पाकिस्तानी आतंक वादियों ने 26 लोगों की धर्म पूछकर हत्या कर दी। इससे दोनों देशों में सैनिक संघर्ष हुआ। भारत ने पाकिस्तान में कई आतंकवादी ठिकानों तथा एयरबेस को तबाह कर दिया। लेकिन हैरानी की बात यह हुई कि इस संघर्ष में चीन तथा तुरकिया ने पाकिस्तान का समर्थन किया जबकि विश्व के किसी देश ने भी पाकिस्तानी आतंकवाद के खिलाफ भारत के पक्ष में आवाज तक नहीं उठाई। यह भारत की विदेश नीति की विफलता मानी जाएगी। डोनाल्ड ट्रंप के द्वारा दूसरी बार अमेरिका के राष्ट्रपति बनने के बाद इस सैनिक संघर्ष में पाकिस्तान और भारत को एक समान दर्जा दिया और पाकिस्तान को अपना प्यारा मित्र बताया। अमेरिका फर्स्ट…इस नीति पर चलते हुए डोनाल्ड ट्रंप ने दुनिया के अलग-अलग देशों पर भेदभाव वाली टैरिफ नीति लागू की। ट्रंप साहब एक तरफ नरेंद्र मोदी को अपना निकटतम मित्र कहते रहे और दूसरी तरफ भारत के ऊपर 50त्न टैरिफ लगा दिया और साथ में यह भी धमकी दी कि क्योंकि भारत रूस से हथियार और तेल मंगवा कर रूस यूक्रेन युद्ध में रूस की मदद कर रहा है इसलिए भारत
के द्वारा रूस से तेल मंगवाने पर जो पेनल्टी लगाई जाएगी। अमेरिका चाहता है कि भारत उसी से ही हथियार तथा तेल मंगवाए। लेकिन भारत ने कहा कि वह अपने फायदे के अनुसार ही जिस से जो लेना होगा लेगा। इसको भी भारत कूटनीति की विफलता ही कहां जाएगा। किसी समय भारत की विदेश नीति में फिलिस्तीन तथा अरब देश विशेष सूची पर होते थे लेकिन आजकल फिलिस्तीन के मुकाबले में भारत इजराइल के साथ रक्षा सामग्री को लेकर संबंध बढ़ा रहा है। फिलिस्तीन के मामले को लेकर भारत इंदिरा गांधी के जमाने की तरह दिलचस्पी नहीं ले रहा। अब जब ट्रंप ने भारत पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगा दिया है और भारत अमेरिका की विशेष सूची में नहीं है तो भारत को भी रूस, चीन, ईरान तथा अन्य देशों के साथ मिलकर ब्रिक्स को मजबूत करना होगा जिसके देश विश्व की अर्थव्यवस्था में लगभग 30 प्रतिशत योगदान करते हैं। भारत को ना चाहते हुए भी अपनी विदेश नीति में परिवर्तन करके चीन के साथ व्यापारिक संबंध और मजबूत करने होंगे। अंतरराष्ट्रीय संबंधों को लेकर कोई किसी का स्थाई मित्र या शत्रु नहीं होता। जरूरत के मुताबिक संबंधों में परिवर्तन होता रहता है। किसी जमाने में रूस तथा अमेरिका एक दूसरे के खून के प्यासे थे लेकिन अब ट्रंप और पुतिन एक दूसरे के नजदीक आ रहे हैं, न चाहते हुए भी अमेरिका चीन के साथ व्यापारिक संबंध बढ़ाना चाहता है। ऐसी स्थिति में भारत को भी अपने विदेश नीति तथा कूटनीति में इस प्रकार का परिवर्तन करना चाहिए कि हमारे ज्यादा से ज्यादा देशों के साथ राजनीतिक, कूटनीतिक, सांस्कृतिक तथा व्यापारिक संबंध मजबूत हों। क्या भारत अपनी विदेश नीति में परिवर्तन करके मनमाफिक उद्देश्य प्राप्त कर सकेगा। यह तो आने वाला समय ही बताएगा।
प्रोफेसर शाम लाल कौशल
रोहतक-124001( हरियाणा)
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