
आज से चार शतक पूर्व एक वह भी समय था जब हर भारतीय की थाली में कोदो भोजन उसकी प्रतीक्षा करता और यह एक मोटे अनाज के रूप में हर घर की पहचान हुआ करता था। बचपन की स्मृतियों में कोदो और उसका स्वाद आज भी मस्तिष्क में तरोताजा है। कोदो कम बरसात में पैदा होने वाला अनाज है[ जिसे भारतीय किसान अपने खेतों से विदा करते जा रहे है और नाममात्र के जो किसान कोदो की फसल लगाते है, वे इसका लाभ ही उठाते है। कोदो को अधिकांश ग्रामीण क्षेत्र के लोग चावल की तरह मिटटी की हांड़ी में पकाकर खाते थे तो कुछेक लोग मोटा अनाज और शरीर के लिए फायदेमंद होने से उसे घर की चक्की में इसका आटा बनाकर रोटिया भी बनाते थे, आज यह चक्कियों और मिलों के द्वारा भी पीसा जाता है।
कोदो के सम्बन्ध में जिला आयुष अधिकारी नर्मदापुरम डॉ श्रीराम कनोजिया ने बताया कि आयुर्वेद में कोदो का विशेष महत्व है जिसे हर हां आदमी को कोदो को अपने भोजन में शामिल करना चाहिए। श्री कनौजिया के अनुसार कोदो की रोटियां खाने से मधुमेह, गुर्दे व मूत्राशय के रोगियों को लाभ मिलता है और कोदो चावल-भात की भांति बनाये जाने के बाद काफी लाभकारी मानी जाती है और उच्च रक्तचाप के मरीजों के लिए यह फायदेमंद है। इसमें पर्याप्त मात्रा में कैल्शियम मिलता है। इससे हड्डियां मजबूत होती हैं। कोदो में पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन की उपलब्धता के साथ खाने में पौष्टिक हुआ करता है। आयुर्वेद के अनुसार कोदो सुपोषण के लिए सबसे बढिय़ा अन्न है। डॉ कनोजिया के अनुसार मरीजों को चिकित्सक से सलाह लेकर है अनाज और उसकी मात्रा चयन करना चाहिए ताकि लापरवाही से संतुलित आहार लेने से मरीज बच सके। यह अलग बात है की हरित क्रांति ने गेहूं और चावल की फसल आने के बाद कोदो को चलन से बाहर कर दिया है, किंतु इसकी उपयोगिता आज भी होने से इसकी मांग कम नहीं हुई है।
कोदो कम वर्षा में भी पैदा हो जाता है किन्तु आज कही भी पानी की कमी नहीं है इसलिए लोग उन क्षेत्रों में ही कोदो की खेती करते है जहां अन्य आधुनिक संसाधन की पहुच नही होने पर प्राचीन हल बक्खर के द्वारा ही कोदो की खेती करने की विवशता हो। धान आदि के कारण इसकी खेती अब कम होती जा रही है बावजूद आज कोदो का चावल, इसकी रोटी या इसका दाना काफी लाभदायक है। पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन की उपलब्धता वाले इस अन्न में पौष्टिकता की खान होती है। यानि यह सुपोषण के लिए सबसे बढिय़ा अन्न है। कोदो पुराने समय से देश के विभिन्न हिस्सों में उपजाया जाता रहा है इसलिए यह एक पारंपरिक अन्न भी माना गया है। इसके दाने में 8.3 फीसद प्रोटीन, 1.4 फीसद वसा तथा 65.9 फीसद कार्बोहाइड्रेट मिलता है। कोदो-कुटकी मधुमेह नियंत्रण, गुर्दे और मूत्राशय के लिए लाभकारी है। यह रासायनिक उर्वरक और कीटनाशक के प्रभावों से भी मुक्त है। कोदो-कुटकी उच्च रक्तचाप के रोगियों के लिए रामबाण है। इसमें चावल के मुकाबले कैल्शियम भी 12 गुना अधिक होता है। शरीर में आयरन की कमी को भी यह पूरा करता है। इसके उपयोग से कई पौष्टिक तत्वों की पूर्ति होती है।
कोदो के विषय में ग्राम महुआ खेड़ा,तहसील सोहागपुर के 80 वर्षीय किसान बेनी प्रसाद पालीवाल कि कोदो का पौधा धान या बड़ी घास के आकार का होता है। इसकी फसल पहली वर्षा होते ही बो दी जाती है और भादों में तैयार हो जाती है। इसके लिये बढिया भूमि या अधिक परिश्रम की आवश्यकता नहीं होती।अधिक पकने पर इसके दाने झड़कर खेत में गिर जाते हैं, इसलिये इसे पकने से कुछ पहले ही काटकर खलिहान में डाल देते हैं। छिलका उतारने पर उसके अंदर से एक प्रकार के गोल चावल निकलते हैं जो खाए जाते हैं। महज 50 साल पहले हमारा फूड कल्चर बिल्कुल अलग था और हम कोदो खाकर ही हष्ठपुष्ठ थे और बीमारी कोसो दूर हुआ करती थी। थाली से कोदो गायब हो जाने पर उन्होंने चिंता जाहिर करते हुए कहा की हमारे समय जितना कोदो का रकबा था उसका पांच प्रतिशत भी रकबा कोदो के लिए नहीं बचा है, जो जंगलों के गांव है वहा के ही लोग कोदो की फसल को लगाते है शेष लोगों ने कोदो की खेती का रकवा ही समाप्त कर दिया है।
कृषक श्री पालीवाल के अनुसार आज पौष्टिकता से भरपूर अनाजों में कोदो का नाम आने से कोदो को मांग बढ़ना उन्हें अच्छा लगा, साथ ही ज्वार, बाजरा, रागी (मडुआ), सवां,आदि इसी क्रम के मोटे अनाजों की कोदों और इसी तरह के अन्य मोटे अनाजों वैश्विक बाजार में डिमांड बढ़ने लगी है। हम सभी लोगों को इन मोटे अनाजों के बारे में जन-जन तक जानकारी पहुंचानी चाहिए
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आत्माराम यादव पीव
ग्वालटोली नर्मदापुरम
मध्यप्रदेश
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