
हर वर्ष 6 अगस्त को हिरोशिमा दिवस मनाया जाता है, जो केवल जापानी शहर हिरोशिमा पर परमाणु बम गिराए जाने की त्रासदी का स्मरण नहीं,बल्कि संपूर्ण मानवता के लिए आत्मचिंतन और चेतना का दिवस है। 6 अगस्त 1945 को अमेरिका द्वारा गिराया गया “लिटिल बॉय” नामक परमाणु बम महज कुछ ही सेकंड में हिरोशिमा शहर को राख बना गया, हजारों लोगों की जान गई और आने वाली कई पीढç¸याँ विकलांगता व बीमारियों की चपेट में आ गईं। आज, हिरोशिमा पर गिरे बम की भयावहता को 79 वर्ष हो चुके हैं,लेकिन क्या हम उस त्रासदी से कुछ सीख पाए? दुर्भाग्यवश, नहीं। आज दुनिया में ऐसे परमाणु बमों का जखीरा मौजूद है,जो हिरोशिमा पर गिरे बम से सैकड़ों गुना अधिक शक्तिशाली हैं। अमेरिका,रूस, चीन,फ्रांस,ब्रिटेन, भारत,पाकिस्तान,उत्तर कोरिया और इजरायल जैसे देश अपने-अपने परमाणु भंडार को लगातार उन्नत कर रहे हैं। यह वैश्विक नेतृत्व का ऐसा विवेकहीन और विनाशकारी दौर है, जहां शांति के नाम पर युद्ध की तैयारी हो रही है। हिरोशिमा दिवस आज और भी अधिक प्रासंगिक इसलिए हो गया है क्योंकि हम एक बार फिर उसी विनाशकारी चौराहे पर खड़े हैं, जहां से आगे का रास्ता या तो शांति और सहयोग की ओर जाएगा या सर्वनाश की ओर। आज की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिन राष्ट्रो्रं को विश्व शांति का प्रहरी कहा जाता है,वही राष्ट्र अपने राजनीतिक और सामरिक हितों के लिए दुनिया को बारूद के ढेर पर बैठा रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाएं भी बड़ी शक्तियों की कठपुतली बन गई हैं, जिनकी निष्कि्रयता से आज युद्धरत राष्ट्र्र खुलेआम नरसंहार कर रहे हैं और मानवाधिकारों की धज्जियाँ उड़ा रहे हैं। इस समय रूस-यूक्रेन युद्ध,
गाजा-पट्टी संघर्ष और एशियाई समुद्री क्षेत्रों में तनातनी इस बात का संकेत हैं कि बड़े देशों की अधिनायकवादी नीतियां और सैन्य वर्चस्व की हवस विश्व शांति को निगल रही हैं। यह एक खतरनाक विचारधारा है, जिसमें सत्ता में बैठे नेता युद्ध को ही समाधान मानते हैं। परंतु यह भूल जाते हैं कि अगला युद्ध यदि परमाणु हुआ, तो न कोई विजेता होगा और न कोई इतिहास पढ़ने वाला बचेगा।
इसलिए हिरोशिमा दिवस केवल शोक मनाने का नहीं, बल्कि संकल्प लेने का दिन होना चाहिए। हमें प्रयास करना होगा कि लोकतंत्र में जनता द्वारा चुने गए नेता शांति, सह-अस्तित्व और मानवीय मूल्यों को प्राथमिकता दें। जनमत, यानी आम नागरिकों की सोच और शक्ति ही विश्व के युद्धोन्मादी नेतृत्व को जवाबदेह बना सकती है।
हिरोशिमा की राख से यदि कुछ जन्म लेना चाहिए, तो वह है मानव विवेक। हमें अब यह तय करना होगा कि हम अपने बच्चों के हाथों में किताबें देना चाहते हैं या बंकर की चाबियाँ। क्योंकि यदि हमने समय रहते चेतना नहीं दिखाई, तो अगला हिरोशिमा शायद पूरी मानवता को लील लेगा।
सुभाष बुड़ावनवाला
,528,काटजू नगर, रतलाम मध्यप्रदेश
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