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लेख@ कथावाचक श्री अनिरुध्दाचार्य के बयान पर राजनीतिक ड्रामा क्यों?

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आज के कलयुग में सच बोलना और लिखना दोनों गुनाह हो गया है। श्री अनिरुध्दाचार्य जी ने मथुरा में कथा कहने के दौरान देश के भविष्य के बारे में चिंता करते हुए समसामयिक घटना पर एक टिप्पणी की। जिसे लेकर अवसरवादी व उनके विरोधियों को एक मौका मिल गया है,आचार्य जी के बातों को तोड़-मरोड़कर उस पर उंगली उठाने का।
आचार्य जी ने इंदौर हनीमून कपल मर्डर केस के बारे जिक्र करते हुए ऐसी घटनाएं लगातार क्यों हो रही है। इसके बारे में तर्क और आक्रोश जाहिर करते हुए उन्होनें यह बात कही कि आजकल 25 वर्ष की लड़की को लोग शादी करके घर लाते हैं। जिस कारण लड़की शादी से पहले 4 जगह मुँह मारकर आयी होती है। उन्होंने यह भी कहा था कि सभी लड़कियां नहीं परन्तु बहुत सी लड़कियां ऐसी होती हैं। अब इस बात पर लोगों ने बेवजह बहस करके अपनी नासमझी का परिचय देना शुरू कर दिया है। सोशल मीडिया में दर्शक बढ़ाने के लिए बिना तर्क¸ किए लोग आचार्य जी के बयान को तोड़-मरोड़कर कर पेश कर रहे हैं।
जबकि सभी लोग यह जानते हैं, कि देश के लगभग 85 प्रतिशत से अधिक महिलाओं का ठीक वैसा ही हाल है। जैसा की महाराज जी ने अपने बयान में कहा था। भले ही
न्यूज चैनल वाले और कुछ चंद लोग इस बात पर नाराजगी जता रहे हैं और महाराज जी को माफ़ी मांगने के लिए कह रहें हैं। परन्तु सोशल मीडिया के कमेंट को पढ़ने पर सच्चाई की पता चल रही है, जहाँ 95 प्रतिशत लोगों ने आचार्य जी की बातों का समर्थन किया है।
इस बात से कोई भी इंकार नहीं कर सकता है कि,आजकल महिलाओं को भी पुरुषों के समान आजादी है। वह भी स्वच्छंद पढ़ने-लिखने तथा रोजगार करने लिए स्वतंत्र हैं। जिस कारण वर्तमान में युवक-युवती के मध्य आपसी संपर्क होने के बहुत ही ज्यादा अवसर मिलते हैं। महिलाओं की स्वतंत्रता सकारात्मक परिवर्तन के बजाय नकारात्मक परिवर्तन की ओर ज्यादा बढ़ रही है। इसके लिए मुख्य रूप से हमारे देश की कानून व्यवस्था जिम्मेदार है,क्योंकि महिलाओं को एक-तरफा कानूनी अधिकार मिला है। जिसका वर्तमान में बहुत ही ज्यादा दुरुपयोग किया जा रहा है। जिससे शादी को लेकर पुरुषों के मन में भय का माहौल है। लोग शादी करने से डरने लगे हैं, क्योंकि शादी करने के बाद एक-तरफा महिला कानून की वजह से बहुत सारे मर्दों की जिंदगी तबाह हो रही है।
इसलिए आजकल लोग शादी करने के बजाय लिव इन रिलेशन में ज्यादा दिलचस्पी दिखा रहे हैं। क्योंकि आजकल समाज के सामने किसी को अपनाना गुनाह हो गया है। बल्कि चोरी-छिपे किसी के साथ शारीरिक-संबंध बनाने को ज्यादा पसंद किया जा रहा है। (इस बात की पुष्टि इस तरह होती है कि वर्तमान में प्रेमी और पत्नी मिलकर पति की हत्या कर दे रहें हैं।)
यह बिल्कुल भी जरूरी नहीं है कि जो मामले समाज के सामने उजागर हुई हो, केवल उतने ही संख्या में घटना घटित हुआ हो। क्योंकि सभी मामले समाज में उजागर नहीं हो पाते हैं। कुछ लोग पैसे की लालच, पारिवारिक दबाव, डर इत्यादि कारणों से मामले को दबा देते हैं। जब सैंकड़ो अवैध-संबंध पर पर्दा डलता है, तब जाकर किसी एक अवैध-संबंध के मामले कोर्ट तक पहुँचता है। (इस बात की पुष्टि इस तरह होती है कि आजकल कोर्ट में अक्सर यह मामले सामने आते हैं, कि शादी करने का झांसा देकर लगातार 7-8 वर्षों तक महिला का शोषण किया गया। अब यदि जो महिला इस बात को 7-8 वर्षों तक अपने माँ-बाप और समाज से छुपा सकती है। तो वह इस मामले को किसी लालच में आकर समझौता करके दबा भी तो सकती है। लोगों को उसके अवैध-संबंध के बारे में 7-8 वर्षों तक पता नहीं था। जब मामला कोर्ट में सामने आयी तब लोगों को पता चला।)
यही हमारे कानून व्यवस्था की विडंबना है,कि 7-8 वर्षों तक जो लड़की किसी के साथ शारीरिक-संबंध बनाती है। उसके नाम और चेहरे को मीडिया में छुपाया जाता है। जिस कारण वह लड़की किसी दूसरे पुरुष से आसानी से विवाह कर लेती है। यही कारण है कि लड़की अवैध-संबंध बनाने से बिल्कुल भी नहीं डरती है। क्योंकि न तो उसको समाज से खौफ है और न ही कानून से। महिलाओं को एक-तरफा कानून ने बेलगाम कर दिया है, जो एक सभ्य समाज के लिए बिल्कुल भी अच्छा नहीं है।
इसलिए जिन लोगों में सच को बोलने व लिखने की क्षमता नहीं है, कम से वे लोग जो सत्य बोलने की क्षमता रखता हो, उसका विरोध औरों के देखा-देखी बिल्कुल भी न करें। आचार्य जी की बातों पर विवाद करने के बजाय इस बात पर चिंता करें कि आजकल महिलाओं का चरित्र व व्यवहार दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। यदि हमारे समाज में ऐसी घटनाएं होती ही नहीं, तो महाराज जी भला ऐसे बयानबाज़ी क्यों करते? एक कथावाचक का यह कर्तव्य है, कि वह हमाज के भविष्य व हित के लिए सोचें।
अतः श्री अनिरुध्दाचार्य जी ने जो कहा वो बिल्कुल उचित है, इस पर बेवजह बहसबाजी करना गलत बात है। क्योंकि जब तक महिला शब्द के शुरू में में सभी शब्द का प्रयोग न किया गया हो,तब तक कोई भी टिप्पणी सभी महिलाओं के लिए बिल्कुल भी नहीं है। यदि किसी के नाम को बारी-बारी से लेकर उस पर टिप्पणी किया जाये, तो एक ही बात को कहने में पूरा दिन निकल जायेगा। वो भी किसी ऐसी घटना पर जो कि बार-बार घटित हो रही हो। इसलिए विशेष परिस्थिति में जब तक जातिवाचक संज्ञा के शुरू में सभी शब्द का जिक्र न किया गया हो, तब तक उसका आशय पूरे जाति के लिए नहीं माना जाना चाहिए। ऐसी स्थिति में जातिवाचक संज्ञा का बोध केवल उन्हीं लोगों के लिए है, जो लोग टिप्पणी किये गये घटना से संबंधित हो। क्योंकि किसी घटना पर व्यक्तिगत नाम लेकर कहने से कानून अनुसार निजता के अधिकार का उल्लंघन हो जाता है।


हितेश्वर बर्मन ‘चैतन्य बाबा’
डंगनिया, सारंगढ़ (छत्तीसगढ़)


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