जब तक मानव का अस्तित्व है तब तक प्रेम का स्वरूप धरा पर मौजूद रहेगा।प्रेम ही एक ऐसा भाव है जो मनुष्य के जीवन में निस्वार्थ शब्द को परिभाषित करता है। एक मां नौ माह तक अपने बच्चें को कोख में रखती है और बड़े होते तक हर समस्याओं से लड़ कर बच्चें को तैयार करती है।एक मां कभी अपेक्षा नही रखती प्रसव पीड़ा और संतान परवरिश के दौरान क्योंकि मां का प्रेम पूर्णतः निस्वार्थ है। निस्वार्थ प्रेम अपेक्षा से कहीं अधिक उपेक्षा से प्रेरित होता है। निस्वार्थ प्रेम अपेक्षा से नहीं बल्कि उपेक्षा से प्रायः पोषित होता है। गोस्वामी तुलसीदास जी अपने पत्नी रत्नावली से बेपनाह प्रेम करता है और प्रेम के खातिर भरे बरसात के माह में तुलसीदास जी अपने पत्नी से मिलने जब जाता है तो नदी को पार करते समय शव को नाव समझ बैठता है और घर के अंदर जाने के लिए सर्प को डोर समझ लेता है और उसके सहारे पत्नी के पास पहुंच जाते है।देख तुलसीदास जी को उनके पत्नी उलाहना भरें शब्दों में कहती है कि आप जितना प्रेम मुझसे करते हो उतना ही प्रेम यदि तुम ईश्वर से करते तो आप का मुक्ति हो जाता है। पत्नी के इस तीखे शब्द से तुलसीदास जी के मन में वैराग्य उत्पन्न हो जाता है और गागर में सागर जैसे महाकाव्य श्री राम चरित मानस का रचना कर पूरे मानव समाज का आदि अनन्त तक मार्गदर्शक बन जाता है। मां-बेटे का प्रेम तो स्वाभाविक है पर माता कैकेई ने श्री राम जी के लिए चौदह वर्ष का वनवास अपने पति राजा दशरथ से मांगा भले यहां पर हमारे नजर में कैकेई का स्वार्थ नजर आता है और कैकेई माता को समाज स्वार्थंी समझता है पर श्रीराम जी के वनवास में माता कैकेई का निस्वार्थ प्रेम समायी हुई थी। माता सीता जी ने एक रजक के लोकापवाद के कारण श्री राम जी के कहने पर महल छोड़ वन को चली जाती हैं। माता कैकेई और माता सीता के निस्वार्थ प्रेम ही श्रीराम जी को एक सामान्य पुरुष से मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम जी के रूप में समाज में प्रकट करता है।
लक्ष्मीनारायण सेन
खुटेरी गरियाबंद (छ.ग.)
घटती-घटना – Ghatati-Ghatna – Online Hindi News Ambikapur घटती-घटना – Ghatati-Ghatna – Online Hindi News Ambikapur