
सुनो,सुनो,सुनो आखिर लालसा किसके भीतर नहीं होती हर किसी के भीतर दस गुना पाने की लालसा होती ही है। चाहे महिला हो या पुरुष संसार में ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं की जिसमें लालसा ना समाई हो चाहे फिर तो कोई तपस्वी हो, साधू हो या आम इंसान हर कोई चाहता कि हम एक लगाएं तो उसके बदले हम दस मिले। अरे भाई लालसा के मकड़जाल से भला कोई बचा भी सका है क्या?
बताओ-बताओ है मेरे सवाल का उत्तर किसी के पास नहीं ना।
अरे भला होगा भी कैसे क्यों कि ये दुनिया ही लालसा पर चलती है। अब आप सोचेंगे भला लालसा में वैराग्य जीवन जीने वाले तपस्वी व साधू कैसे आ गये? और यही सोच कर आप मेरा विरोध भी करेंगे मन के भीतर ही सही पर करेंगे जरूर मैं जानती हूॅं। चलो आपके मन में उठे मेरे प्रति विरोध की ज्वालामुखी को शांत किये देती हूॅं।
दरअसल तपस्वी व साधू व अन्य वैराग्य धारी लोगों में लालसा अपनी भक्ति से भगवान को पूर्णतः रूप से पा लेने की होती है और वो भी जल्द से जल्द अर्थात अपनी भक्ति का कुछ अंश लगा कर भगवान को दस गुना पा लेने की इच्छा ही तो वैरागी की लालसा है। भूतकाल में सत्ययुग में भक्तों की लालसा पूरी भी होती थी भगवान दर्शन भी देते थे अपने भक्त को परंतु आज के युग में मुमकिन है भगवान को पाना परंतु समाज का पूरा मोह त्याग कर अपने आप को समर्पित करने वाला भगवान को सिर्फ महसूस करने अपने आस-पास होने की बहुत ही बेहतरीन तरीके से अनुभूति कर सकता परंतु साक्षात दर्शन भगवान के ये तो सिर्फ सपनों में होता है। सच रात को सोते समय सपने में हमारी लालसा को भगवान चरितार्थ जरूर कर दर्शन देते हैं। परंतु हकीकत में सिर्फ आभास करा कर हमारी लालसा पूरी करते हैं। अरे भाई! आप आम लोगों की सोच का क्या कहना। लालसा सिर्फ आर्थिक नहीं होती ये बात समझो लालसा तो हृदय से भगवान को पाकर उनके रूह में उतर जाने की भी होती है।
आम जिंदगी में भी इंसा बहुत सी लालसा दिल में लिए चलता है जैसे व्यवसाय से लालसा कि जो लागत लगाई उसका दस गुना लाभ हो। व्यवसाय चाहे छोटा हो या बड़ा हर कोई दुगने से अधिक मुनाफा चाहता जिसके लिये वो हर जी जान कोशिश भी करता। कुछ तो अपनी लालसा से कहीं अधिक पा लेते और कुछ ठीक इसके विपरित मतलब लालसा से भी कम या सरल शब्दों में लागत से भी बहुत कम ऐसे में फिर तो व्यवसाय बंद करने तक की नौबत भी आ जाती है और अच्छा-खासा इंसान डिप्रेशन का शिकार हो जाता है।
अब ये तो हो गयी आर्थिक लालसा की चाहत। अरे लालसा के भी अलग-अलग प्रकार होते हैं। चलो अब दूसरी लालसा की हम बात कर लेते हैं। ये लालसा क्या छोटे, क्या बड़े सभी को होती है बच्चा तक इस लालसा से अछूता नहीं रह पाता। पता है ये लालसा क्या है? वो लालसा है प्रेम, सम्मान की भूख। हर कोई इस लालसा को पाकर धनवान बनना चाहता है। मतलब की चाहे बच्चा हो, जवान या बूढ़ा व्यक्ति हर कोई किसी अपने या दूसरों से सम्मान की चाहत रखता है।
भाई अगर सम्मान दोगे तो सम्मान मिलेगा भी ना।
मैं एक विशेष रिश्ते में सम्मान के बारे मे जरूर बताना चाहूंगी वो खास रिश्ता है पति-पत्नी का रिश्ता जी हॉं पति-पत्नी का रिश्ता वो रिश्ता है जिसमें दो अनजान शख्स समाजिक रिति-रिवाजों से एक बंधन में बंध जाते जिसे तोड़ पाना किसी के लिये संभव नहीं है। हॉं ये रिश्ता तब कमजोर हो जाता जब एक व्यक्ति पूरी जिम्मेदारी के साथ सम्मान देते-देते रिश्ता निभाता चला जाता है और दूसरा ठीक उसी के विपरित सदा अपमान करता रहे दूसरे का बस यही कारण होता। आखिर एक इंसान कब तक सहन करता चला जाएगा एक दिन तो आएगा की वो भी सह-सह कर अपना मुंह खोलेगा ही। गलत तो नहीं कह रही ना मैं? अरे जैसे आप हड्डी-मांस से बने पुतले हैं, आप में जान है, आप में भावना है ठीक उसी तरह सामने वाले व्यक्ति अर्थात आपके जीवनसाथी या संगनी मे भी तो है ही ना? फिर आप कैसे किसी दूसरे की भावना को ठेस पहुंचा सकते। जब आप सम्मान की उम्मीद रखते हैं तो सम्मान देना भी सीखना जरूरी है ना। आप दूसरों से दस गुना सम्मान चाहते हैं तो दस गुना से अधिक देना भी, सीखें तो! वरना एक दिन वो भूचाल आएगा जिसकी आपने कल्पना भी नहीं की थी मतलब आपने सोचा भी नहीं था कि सामने वाला आपको जवाब दे सकता वो भी आपको ऐसा करारा जवाब देगा की आपके वारे न्यारे हो जाएंगे। अर्थात आपकी जगह आपको दिखा दी जाएगी। अरे वो एक कहावत है ना जो बोएगा वही पाएगा,तेरा दिया…लालसा सम्मान की है वो भी दस गुना तो दस गुना दो भी,लालसा सिर्फ आपकी नहीं होती हर एक व्यक्ति की होती है एक-दूसरे से तभी तो जिंदगी की गाड़ी मधुर तालमेल बैठा कर चल सकेगी।
वीना आडवानी तन्वी
नागपुर,महाराष्ट्र
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