
भारत संप्रभुता एकता तथा अखंडता का वैश्विक स्वच्छ एवं साफ-सुथरी छवि वाला एकमात्र बड़ा लोकतांत्रिक देश है। अमेरिका में भी लोकतंत्र है पर वहां पूंजीवादी व्यवस्था तथा व्यापक व्यवसायीकरण ने अनेक राष्ट्रपतियों को विस्तार वादी तथा साम्राज्यवादी मानसिकता का बना दिया है। अमेरिका की शक्ति संपन्नता अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसे एक संवेदनहीन,लोकतांत्रिक एवं निरंकुश राष्ट्र के रूप में स्थापित कर चुकी है। अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में अमेरिका और विभिन्न काल खंडों में अलग-अलग देशों को एक दूसरे से युद्ध करने के उकसाने के लिए बदनाम रहा है, और उसकी इस इस कूटनीति का सबसे बड़े एवं तात्कालिक उदाहरण अफगानिस्तान में तालिबान आतंकवादियों का कब्जा एवं और रूस यूक्रेन युद्ध में यूक्रेन अमेरिकी तथा अमेरिकी समर्थित नैटो एवं यूरोपीय देशों की भूमिका ही रही है। इसी तरह इसराइल हमास युद्ध में इसराइल को खुला समर्थन देकर अमेरिका ने विस्तारवाद तथा साम्राज्यवाद की आग को हवा देने का काम किया है और लगभग 2 हजार लोगों की जान को जिंदगी से वंचित कर दिया है। दूसरी तरफ भारत एक विशाल लोकतांत्रिक देश होने के साथ-साथ शांति सौहार्द्र और गुटनिरपेक्षता का पक्षधर रहा है। भारत देश में सदैव वैश्विक शांति का संदेश ही दिया है, यह अलग बात है कि भारत में धार्मिक सामाजिक आर्थिक विविधता विषमता के कारण अंदरूनी विवादों तथा आतंकवादी गतिविधियों के कारण अशांत रहने पर मजबूर किया है। भारत की आंतरिक सुरक्षा भी पिछले 20 वर्षों से अलग-अलग शहरों यहां तक संसद भवन के हमलों और कश्मीर में विभिन्न समय तथा स्थानों पर आतंकवादी हमलों ने भारत की आंतरिक व्यवस्था में उथल-पुथल मचाने का प्रयास किया है, भारत की शक्ति और सामर्थ्य इतनी सक्षम है कि आतंकवादियों के हमलों का भारत सरकार ने समय-समय पर मुंहतोड़ जवाब भी दिया है। पठानकोट और पुलवामा हमले इसके सबसे सशक्त और सक्षम मामले हैं जहां भारत ने पाकिस्तान में घुसकर आतंकवादियों के ठिकानों को नष्ट किया है। जम्मू कश्मीर में भी छुटपुट घटनाओं के अलावा स्वतंत्रता के बाद से शांति का माहौल स्थापित हुआ है। जहां तक भारत की सीमा के विवाद का प्रश्न है तो भारत भौगोलिक रूप से एशिया के दक्षिणी भाग में स्थित है और भारत की सीमाएं 7 जिनमें चीन, नेपाल, म्यानमार,भूटान,श्रीलंका, बांग्लादेश और पाकिस्तान देश शामिल हैं। भारत सदैव अपने पड़ोसियों से शांति के संबंध स्थापित रखना चाहता है। भारत की विदेश नीति गुटनिरपेक्ष एवं शांति, सद्भावना की रही है। भारत के साथ पड़ोसी देशों में भूटान,बांग्लादेश श्रीलंका ,मालदीव ,सदैव भारत के साथ मित्रवत रहे हैं किंतु चीन तथा पाकिस्तान ने हमेशा भारत के हितों का नुकसान की चाहा है भूटान, बांग्लादेश, और बांग्लादेश ने भारत से अपने संबंध अपने हितों से जोड़कर कई संधियों में हस्ताक्षर किए ,जिसके कारण दोनों देशों ने मिलकर कई पावर प्लांट, पावर ट्रांसमिशन लाइन,1 बंदरगाह की विकास रेल लाइन निर्माण आदि में एक दूसरे का साथ दिया है। मालदीव एक एसा देश है जिसका दक्षिण तथा अरब सागर में सामरिक महत्व है, इसलिए भारत के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। चीन पाकिस्तान के अलावा नेपाल से भी भारत के संबंध बहुत मधुर कभी नहीं रहे हैं नेपाल में चीन तथा पाकिस्तान के हस्तक्षेप के कारण नेपाल भारत की आलोचना करता आया है। पाकिस्तान का इस्लामिक कट्टरपंथ एवं वहां की सेना तथा पाकिस्तानी शासन के हुक्मरान भारत को अपना दुश्मन नंबर एक मानते हैं। भारत का नेपाल के साथ सीमा विवाद है जिसके चलते नेपाल का नजरिया भारत के प्रति बदलता गया है। भारत और चीन के संबंध 1962 के बाद से सभी सामान्य नहीं रहे हैं। लाइन आफ एख्ुअल कंट्रोल में चीन ने अरुणाचल प्रदेश तथा लद्दाख में सदैव अतिक्रमण किया है और भारत का चीन से डोकलाम, पपेंगांग, गलवान क्षेत्रों में सैनिक स्तर का विवाद होता रहा है और एलएसी पर चीन और भारत में बड़ी संख्या में सैनिकों को तैनात किया है। इसी बात में अमेरिका भारत के साथ है किंतु रूस इस मामले में निरपेक्ष नीति अपनाए हुए हैं। यह अलग बात है कि अमेरिका भारत का स्वतंत्रता के बाद से तभी सहयोगी मित्र नहीं रहा है और रूस ने परंपरागत रूप से अपनी मित्रता भारत के साथ अलग-अलग घटनाओं तथा युद्धों में साबित की है। यह तो तय है कि भारत में आतंकी गतिविधियां आंतरिक सुरक्षा के लिए हमेशा खतरा बनी हुई थी और है। इसके अलावा एल ए सी तथा एलओसी में चीन तथा पाकिस्तान जैसे देशों से हमें मुकाबला करना होगा। पाकिस्तान दिवालिया होने की कगार पर है पर चीन की मदद तथा उकसावे के कारण पाकिस्तान भारत को एक बड़ा दुश्मन मानती है। वैसे तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत सरकार की सभी देशों से अच्छी मित्रता है एवं भारत को शांति का पक्षधर माना जाता है किंतु रूस यूक्रेन युद्ध में यह बात एकदम स्पष्ट उभर कर आई है कि किसी भी युद्ध में देश को अपनी सुरक्षा खुद की शक्ति एवं सामर्थ्य से करनी होगी। अमेरिका जैसे देश बाहर से तमाशा देखने वाले देशों में माने जाते हैं। अतः भारत को अपनी आंतरिक तथा सीमा की सुरक्षा स्वयं के शक्ति तथा सामर्थ से ही करनी होगी एवं हमेशा सतर्कता बरतनी होगी।
संजीव ठाकुर,
रायपुर छत्तीसगढ़
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