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कविता@तारे…..

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झिलमिलाता आसमां और टिमटिमाते असंख्य तारे,
खुद के अंदर झांक देखो कितने खोजे और निखारे,
जी रहा है ये जो जीवन कभी जीते होंगे और हारे,
देखो खुद का मनन करके कितनों के बने हो तुम सहारे,
छोटे तारों में खुद का प्रकाश होता है,
धरती के असंख्य तारे अभावों में क्यों रोता है,
चंद पैसों के खातिर तारे चमक क्यों खोने लगे,
सोने का नाटक ये छोड़ो रहना होगा जगे ही जगे,
पत्थरों में धनवर्षा से तुमको क्या क्या मिल है पाता,
गढ़ना है गर देश अच्छा किसी गरीब को भी पढ़ाता,
लाखों कलाम भरे पड़े हैं हर गली और हर मुहल्ले,
कर दो मदद एक दो की ताकि कहे न कोई निठल्ले,
एक सूर्य भीम जी था दूसरा भी जल्दी खोज लाओ,
तारे वतन के कम नहीं है सारी दुनिया को बताओ।

राजेन्द्र लहिरी
पामगढ़
छत्तीसगढ़


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