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@लेख@ भ्रष्टाचार से सभी को होता लाभ

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भ्रष्टाचार एक ऐसा जादू है जो हर सरकारी दफ्तर में चुपचाप काम करता है। यह बाहर से बुरा दिखता है, लेकिन अंदर से बहुत काम का होता है। जहाँ नियम-कायदे रेंगते हैं, वहाँ भ्रष्टाचार दौड़ता है। यह अफसरों को थकान से बचाता है,बाबुओं को मुस्कुराने की वजह देता है और आम आदमी को जल्दी काम होने की उम्मीद भी।
अब सोचिए,एक आदमी अगर नियम से फॉर्म भरकर सरकारी दफ्तर जाए तो महीनों लग सकते हैं। लेकिन अगर वह थोड़ा प्रोत्साहन शुल्क यानी रिश्वत दे दे, तो वही काम एक दिन में हो जाता है। यह भ्रष्टाचार का असली कमाल है। यह न तो आंदोलन मांगता है, न अदालत का चक्कर — बस थोड़ी सी समझदारी और जेब में थोड़े रुपए। भ्रष्टाचार ने अफसरों के जीवन को आसान बना दिया है। अब उन्हें ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती,बस मीठे लहजे में काम करवाना होता है। उन्हें ऊपर की कमाई भी हो जाती है जिससे वे अपनी गाड़ी,बंगला और विदेश यात्रा का सपना पूरा कर लेते हैं। और मज़ेदार बात ये कि आयकर विभाग को भी कानों-कान खबर नहीं होती! यह रिश्वत देना और लेना अब कोई अपराध नहीं लगता, बल्कि यह एक नया तरीका बन गया है जिससे काम जल्दी और आराम से हो जाता है। इससे अफसर खुश, कर्मचारी संतुष्ट और आम आदमी चैन में रहता है। तो अब साफ है कि जब हर किसी को फायदा हो रहा हो,काम समय पर हो रहा हो, और सब तरफ मुस्कान हो—तो यह कहना गलत नहीं होगा कि भ्रष्टाचार से सभी को होता लाभ। अधिकारियों को लाभ :सरकारी अधिकारी का जीवन जितना दिखने में सरल लगता है, वास्तव में वह उतना ही जटिल और संघर्षपूर्ण होता है। सुबह से शाम तक फाइलें पढ़ना, बैठकों में झक मारना, ऊपर से मंत्री जी के मूड के अनुसार फैसले बदलना — इन सबसे अगर कोई मानसिक संतुलन बचा है तो केवल एक ही कारण है,और वह है भ्रष्टाचार। यह ‘अनौपचारिक प्रोत्साहन नीति’ अधिकारियों को प्रेरित,ऊर्जावान और ‘रचनात्मक’ बनाए रखती है।
अब जरा सोचिए,एक जिलाधिकारी,जो महीनों तबादले के डर में जीता है, अगर उसे कोई ठेकेदार ‘प्रसन्नता शुल्क’ दे दे, तो वह स्वयं भी मुस्कराएगा और काम को भी गति देगा। विभागीय निरीक्षण के दौरान अगर कोई व्यापारी ‘सहयोग राशि’ प्रदान करे, तो रिपोर्ट भी रेशमी हो जाती है और अधिकारी की रातें भी चैन से गुजरती हैं। अधिकारियों को मिलने वाली ये ‘उपरी कमाई’ न केवल उनके भौतिक जीवन को समृद्ध करती है, बल्कि उनके सामाजिक रुतबे को भी चमकदार बनाती है। अब अधिकारी भी अपने बच्चों को विदेश भेज सकते हैं, आलीशान बंगला बनवा सकते हैं, और एक सम्माननीय जीवन जी सकते हैं, जिसे केवल ‘सरकारी वेतन’ पर जीना लगभग असंभव है। और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ये ‘प्रोत्साहन राशि’ इतनी गोपनीय होती है कि आयकर विभाग भी संदेह नहीं कर पाता। इससे ना सिर्फ अधिकारी सुखी रहते हैं, बल्कि विभागीय टकराव और तनाव भी घटते हैं। जब हर फाइल के साथ थोड़ा प्रेम पत्र हो, तो अधिकारी स्वयं पहल करता है,वरना फाइलें कागज़ों की कब्रगाह में तब्दील हो जाती हैं। अतः अधिकारी वर्ग के इस मानसिक, आर्थिक और सामाजिक कल्याण में जो अनदेखा सहयोगी है, उसका नाम है — भ्रष्टाचार से सभी को होता लाभ। धन देकर नौकरी पर लगे कर्मचारियों को लाभ : नौकरी की दुनिया में योग्यता अब केवल एक औपचारिक दस्तावेज़ है, असली जादू तो वो ‘नोटों की भाषा’ है जो हर साक्षात्कारकर्ता समझता है। जब कोई अभ्यर्थी धन देकर नौकरी प्राप्त करता है, तो यह महज सौदा नहीं, एक स्थायी निवेश है। भले ही वह परीक्षा में फेल हो गया हो,लेकिन रिश्वत के बल पर जब उसे सरकारी नौकरी मिलती है,तो वह अपने पूरे वंश की आर्थिक स्थिति बदल देता है।
धन देकर नौकरी पाना कोई नैतिक अपराध नहीं,बल्कि आज के युग में ‘डिप्लोमैटिक एंट्री’ है, जिसमें समय और प्रयास दोनों की बचत होती है। यह उन लाखों युवाओं के लिए उम्मीद की किरण है जो मेहनत करके भी हर बार रिजल्ट लटकते देखते हैं। अब अगर वह थोड़ा धन देकर सरकारी दफ्तर में बाबू बन जाए, तो न केवल उसे स्थायी नौकरी मिलती है, बल्कि वह स्वयं भी भ्रष्टाचार की सेवा में लग जाता है—यानी इस व्यवस्था का सक्रिय भागीदार बन जाता है।
इससे दोहरा लाभ होता है— पहला, उसे सैलरी मिलती है, और दूसरा,वह भी दूसरों से ‘सहयोग राशि’ लेकर अपना निवेश वसूल करता है। यह चक्र इतना सुंदर और संतुलित है कि अर्थशास्त्री भी इसे स्थायी पूंजी मॉडल कह सकते हैं। और हाँ,यह कर्मचारी अपने दोस्तों और रिश्तेदारों को भी यही मार्ग दिखाता है, जिससे एक पूरी पीढ़ी का स्मार्ट एंप्लॉयमेंट चैनल बनता है। इसमें ना कंपीटीशन की टेंशन, ना रैंक की चक्कर,और ना ही कटऑफ की चिंता—बस सही दर पर सौदा, और उज्जवल भविष्य की गारंटी। अतः जब नौकरी पाने वाला और व्यवस्था दोनों प्रसन्न हों, तो यही कहने का समय है—भ्रष्टाचार से सभी को होता लाभ काम आसानी से होने का लाभ :जब बात किसी जरूरी सरकारी काम की हो, और वो भी समय पर, तो आम आदमी जानता है कि फॉर्म भरने और प्रक्रिया पूर्ण करने से ज़्यादा ज़रूरी है संकेत समझना और सहयोग करना। नियमों और प्रक्रियाओं की चौखट पर अटक कर जब आम जन थक हार जाते हैं, तब भ्रष्टाचार उन्हें वह मार्ग दिखाता है जहाँ ‘सीधा संवाद, स्पष्ट समाधान’ की नीति चलती है। अगर कोई व्यक्ति जन्म प्रमाण पत्र बनवाने जाए और बिना रिश्वत दिए तीन महीने इंतजार करे, और वही प्रमाण पत्र अगर 500 रुपये दे देने से अगले दिन बन जाए, तो क्या यह त्वरित सेवा व्यवस्था का चमत्कार नहीं?
आज की भागदौड़ भरी दुनिया में किसी के पास समय नहीं हैः यह समय बचाने की तकनीक है जिसे हम भ्रष्टाचार के नाम से जानते हैं। यह व्यवस्था वह है जो ‘फाइल में नोटिंग डालो’ की जगह ‘फाइल को फुर्ती से दौड़ाओ’ का सिद्धांत अपनाती है। इससे अफसर का भी समय बचता है, बाबू का भी और सबसे ज़्यादा, नागरिक का। ये प्रशासन की वो गुप्त एक्सप्रेस सेवा है जो चुनिंदा जानकार नागरिकों को ही प्राप्त होती है। यदि आप चाहें कि आपके घर का बिजली मीटर तुरंत लगे, राशन कार्ड नए पते पर तत्काल स्थानांतरित हो, या फिर नगर निगम आपके गड्ढे वाले रास्ते को रातोंरात समतल कर दे—तो भ्राताओं और भगिनियों! बस एक छोटा-सा प्रेरणा भत्ता दीजिए, और चमत्कार देखिए। नियमों से बंधे रहकर जो जीवन सूखता है, उसे रिश्वत की कुछ बूँदें सींच देती हैं। अतः जब काम आसानी से, बिना झंझट, शीघ्र और सटीक रूप से होने लगे, तो यही प्रमाण है कि भ्रष्टाचार से सभी को होता लाभ।
-डॉ. शैलेश शुक्ला-
नई दिल्ली


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