गुरुजी के आंगन में छिटकी है रोशनी।
नाम है सुप्रीति मानो कविता बनी।।
ज्ञानदाता के आँगन में खिली है जो कली।
उसके खिलने से जç¸न्दगी हुई है मखमली।।
मन्द-मन्द मुस्कान संग मीठी-मीठी बातें।
झिलमिल सितारों वाली खिलखिलाती रातें।।
उसके क¸दमों की छुअन में है खुशियों की बहार।
झलके चांद से चेहरे पर समझदारी का संसार।।
शब्दों के जादूगर की गोद में जब दिखती है।
खिलखिलाकर खुद एक नई कहानी लिखती है।।
वह गुरु जी का गर्व है और माँ की है दुआ।
उसकी हरकत से जीवन में बरकत हुआ।।
प्यारी परी सुप्रीति! तुम हँसती रहो सदा।
मधुर-मधुर मुस्कान पर है कौन नहीं फç¸दा।।
तुम बड़ी होकर जहां में जहां कहीं भी जाना।
माता-पिता का नाम रोशन करके दिखाना।।
अंशवी चौरसिया
गांगरानी,कुशीनगर
उत्तरप्रदेश
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