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कविता @ जलने लगा है पर्यावरण…

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मचा हुआ है हाहाकार, इस भीषण गर्मी के कारण
धरती अम्बर धधक रहा है, जलने लगा है पर्यावरण।
जीव-जगत हैं,त्राहि-त्राहि, हरियाली भी है हलाकान
पेड़-पौधे ये झूलस रहे है,और झूलसे हैं सारा जहान।
पेड़-पौधे बिलख रहे हैं,और ये छाया भी है परेशान
पेड़ों की कोई दर्द न जाने अनजां बना है यह‌ इंसान।
एक पेड़ कोई, लगाता नही, सैकडों उजाड़ जाता है
यह इंसान अपने पैरों पर खुद कुल्हाड़ी मार जाता है।
जब पड़ती है भीषण गर्मी,वह छाया तलाश करता है
जिस पेड़ों में शरण लेता,फिर उसी पेड़ को काटता है।
कौन समझाए इन जालिमों को,पेड़ है तो जिंदगी है
पेड़ बिना जिंदगी नामुमकीन है इसी से ही जिंदगी है।


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