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लेख @ दतुअन वाली बुढि़या

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तड़के सुबह गली में हमेशा की तरह बेसुरा आवाज में गला फाड़ती बçुढ़या मुखारी ले ला ओ मुखारी।
रोज मेरी मीठी नींद टूट जाती,मन किया की बçुढ़या को डांट डपट कर कर भगा दूं कम से कम मेरे घर के सामने डंका ना दे । यह सोचकर भन्नाया हुआ घर से बाहर आया,बçुढ़या काफी दूर जा चुकी थी उसके सिर का बाल पक कर रेशम हो गया था । कमान की भांति झूका हुआ कमर,मांस सिकुड़ कर मज्जा से लटका हुआ,मलीन लिवास में लिपटी बुढç¸या,मज्जा जमा देने वाली ठंड को चुनौती दे रही थी।
उस बुढç¸या के कारण आज मेरा दुर्भाग्य रहा,मैं अपने धर्मपत्नी के प्यार भरे चुम्बन से जो वंचित रहा । शादी को हुए अभी महज छः माह ही हुआ था प्रभा मुझे रोज सुबह बेड टी के साथ एक प्यार भरे चुंबन पेश कर जगाती। कभी-कभी आंख खुल जाने के बावजूद भी मैं आंख बंद कर
बिस्तर पर पड़ा रहता । प्रभा जब बेडरूम में चाय लेकर आई तो बेड खाली था चाय का कप रख कर बाहर आई तो सामने मुझे देखकर मुस्कुराई। उत्तर में मैं भी मुस्कुरा दिया। परंतु कुछ क्षण बाद प्रभा के मुस्कुराने का मतलब समझ में आया तब मैं झेप गया। पल्लू से निकलकर अब जिम्मेदारी समझ में आई,यही प्रभा का मतलब था। क्यों जनाब? मॉर्निंग वॉक पर जाना है अगर ऐसी बात थी तो कल से जल्दी उठा दिया करूंगी। मॉर्निंग वॉक का नाम सुनते ही मेरे तन बदन में कपकपी होने लगी। बाप रे बाप इस ठंड में मार्निंग वाक कहता हुआ अनायास दोनों हथेली को आपस में रगड़ते हुए वापस बिस्तर में घुस गया। प्रभा मेरे भोलेपन पर मुस्कुराती हुई मेरे पिचके गाल को चुटकी काटी और मटकती हुई कमरे से बाहर चली गई। प्रभा के इस हरकत ने मेरे सोचने का नजरिया ही बदल दिया,मन चंचल हो गया। ऐसी दशा में अक्सर रिकॉर्ड ऑन कर मुकेश का यह नगमा सुना देता चंदन सा बदन चंचल चितवन धीरे से तेरा ये मुस्काना….। रिकॉर्ड ऑन किया चल अकेला-चल अकेला तेरा मेला पीछे छूटा राही…जवानी नींद भर सोया …। आवाज कमरे में कुंज गया लपक का रिकॉर्ड बंद किया,प्रभा ना जाने कब से दरवाजे के पास खड़ी हंसी के मारे लोटपोट हो रही थी। यह उसी की शरारत थी पल भर के लिए प्रभा के प्रति गुस्सा आया मगर उसे डांट नहीं सकता क्योंकि उसकी नाराजगी मेरे लिए कष्टप्रद होता है इतना जरूर था कि मुकेश का यह
नगमा मुझे कभी प्रिय थे परंतु आज मुझे खला नहीं, शायद यह नगमा मेरे जीवन की कमजोरियों को उजागर कर सच्चाई व्यक्त कर रहा था। कोई आपकी हर कर्म का समर्थन करता रहे तो अच्छा, मगर आपकी बुराई का खुलासा करें तो अपना मुंह मिठू कर शर्मिंदा होने के बजाय तेवरियां चढ़ा लेते हैं । सत्य हमेशा कड़वा होता है यही दशा मेरी थी,दिन दुनिया से अलग धर्मपत्नी के पल्लू को अपना ठिकाना बना लिया था जहां से मैं निकलना नहीं चाहता। सही राह का अनुसरण मानव तब तक नहीं करता जब तक वह ठोकर ना खाले।
प्रभा मेरे करीब आ कर कहने लगी परेशान लग रहे हो,क्यों तबीयत ठीक नहीं है? मैं तो कहती हूं तुम रोज मॉर्निंग वॉक पर जाया करो फ्रे श रहोगे। एकाएक पूछ बैठा क्या तुम बैचलर लाइफ में मॉर्निंग वॉक को जाती थी।
हां। तो अब क्यों नहीं जाती हो।?
तुम जाने का अवसर ही कब देते हो जनाब। शरमाती हुई शिकायत की थी। उसके इस जवाब ने उसके प्रति मेरी नाराजगी दूर कर दिया। बात बदलते हुए कहा प्लीज मेरे कपड़े प्रेस कर दो आफिस को लेट हो जाऊंगा।
आज संडे है जनाब इतना भी होश नहीं। वाकई में मेरा याददाश्त दिनों दिन ढीली होने लगी थी,होता भी कैसे नहीं। प्रेम के आसक्त ने मेरा सोचने समझने का नजरिया ही बदल दिया था। कभी किसी बारे में सोचा नहीं सोचता तो सिर्फ इतना कि प्रभा को कैसे खुश रखा जाए,उसे क्या चीज लाकर दूं जो वह मुझसे कभी रूठे ना। अर्धांगिनी द्वारा किसी वस्तु को पाने की,की गई इच्छा,उसके पूर्ति के लिए स्वयं पर कर्ज का भार लाद कर झूठी शान बताने का चलन पुरुषों के स्वभाव में है,एक दिन कर्ज का भार इस हद तक बढ़ जाता है की जीवन नईया डगमगाने लगता है। परंतु हम दोनों के जीवन में ऐसा बुरा वक्त कभी नहीं आएगा मैं कर्ज लेकर प्रभा को झूठी स्वांग रचने ना दूंगा,भगवान ना करें कि मुझे कर्ज लेना पड़े दफ्तर में अच्छा खासा ऊपरी कमाई है। इस लिए दफ्तर में पूरा दिन बैठकर इस गुणा-भाग में लगा रहता की किस काम से कितना रुपया लेना है ताकि प्रभा को उसके मनपसंद का सरप्राइज दे सकूं।
धन की लालच और प्रेम की आसक्तता मनुष्य को इस हद तक अंधा बना देता है कि उसे वैभव और रुपसी के सुन्दर मुखड़ा के अलावा कुछ भी दिखाई नहीं देता।
शाम को गांव से मां-बाबू जी आ गये,दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की देखकर फूला नहीं समाये। और तरक्की के लिए भगवान से दुआ करने लगे। अपनी शान बताने आफिस का चपरासी को घर का काम काज के लिए बुला लिया,इससे मां बाबूजी के सामने मेरा एश्वर्य और बढ़ गया।
भोर में किसी की आवाज कान से टकराई नींद खुल गया,बाहर आकर देखा तो वही दातुअन वाली बçुढ़या थी। मां उससे दतुअन ले रही थी आगे बढ़कर उसके सामने पांच रुपए का सिक्का बढ़ा दिया पूछा भी नहीं की कितना पैसा होगा पूछता तो शायद मेरे शान के खिलाफ होता। बçुढ़या सिक्का न ले कर मेरा चेहरा देखने लगी,मैं समझ गया,छोटे लोग कितना लालची और लोभी होते हैं पांच रुपए का सिक्का और निकाल कर देने लगा वह बड़े ही दीनता से बोली बाबू पैसा के बदला मा एक ठोम्हा चउर दे देते त अच्छा होतीस। मैं उसका मतलब नहीं समझ सका और छेड़ते हुए पूछा चावल काहे पैसा क्यों नहीं? बाबू सब दातुन ला पैसा म दहां त दस रुपया ले जादा के नइ होय अउ चउर म कम से कम 2 किलो चाउर मिल्ही तभे तो तीन परानी के पेट चला पहां। उसकी बातें सुन कर उसके बारे में जानने की इच्छा हुई। कहां ले आथस? टारपाली रगड़ के दो कस भूइयां हे बाबू…..।
अउ कभू बीमार पर जाबे ता? बाबू संझा बिहिनिया के हवा लख रुपया के दवा।
उसकी आवाज मुझे कभी कर्कश लगती थी परन्तु आज मुझे उसकी वाणी मंत्र लग रहा था। हृदय के किसी कोने में सुषुप्त दशा में पड़ा उदारता धीरे से जागने लगा था। मैं उसके विचारों के सामने अपने आप को बौना महसूस करने लगा था।
बाबू पेंशन बर बाबू मन के चक्कर काटत राशन कार्ड गहना धरागे, फेर हमर दूनो परानी के पेंशन नइ बनिस दूधोगे दूहनोगे। अब मुझमें कुछ पूछने की हिम्मत नहीं रही। क्यों कि इसका गुनहगार मैं हूं आज तक जो भी कार्य किया स्वार्थ से किया। घर के अंदर जाकर शेर भर चावल लाकर उसके सामने रख दिया। अपने मास विहीन मुठ्ठी से दो बार निकाल कर अपने थैली में रख ली और चलते बनी। मैं देखता रह गया इतना परिश्रम के बाद एक मुट्ठी चावल। और एक मैं जिसे सरकार पर्याप्त वेतन देने के उपरांत गरीबों से लूट-खसोट करता रहा। जी चाहा कि बुलाकर शेर भर चावल दे दूं। परंतु यह सोचकर रुक गया की उसकी दीनता का मजाक उड़ा कर अपने आप को नहीं सुधार सकता।


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