अपने यहां ऐसे भी दीवाने हैं जो कलाई पर घड़ी नहीं हेलमेट बांधते हैं। भारत में ट्रैफिक नियम उस प्रेमिका की तरह हैं जिनसे सब वादा करते हैं पर निभाता कोई नहीं। ट्रैफिक सिग्नल उस बुजुर्ग की तरह होता है जिसे सब सम्मान से देखते हैं, पर जिसकी मानता कोई नहीं। यहां सड़कों पर सबसे विश्वसनीय सहारा न तो हेलमेट है,न सीट बेल्ट,न ही गाड़ी के कागज और न ही ड्राइविंग लाइसेंस। सबसे कारगर सुरक्षा कवच है-मोबाइल। एक बार अपने प्रभावशाली चाचा-मामा का मोबाइल मिलाकर ट्रैफिक पुलसिये को दे दो,बस सारी सिट्टीपिट्टी गुम हो जायेगी। ये फोन कॉल एक ऐसा महामंत्र है जिसे उच्चकोटि की भारतीय चालकों की आत्मा में संस्कार स्वरूप डाल दिया जाता है। बच्चा जब साइकिल छोड़ स्कूटी पर चढ़ता है तो मां कहती है- बेटा! ध्यान से चलाना और पिता कान में फुसफुसाते हैं कि कुछ हो जाये तो चाचा को फोन कर लेना। भारत में अधिकांश गाçड़यां दो इंजन से चलती हैं-एक पेट्रोल या डीजल इंजन और दूसरा प्रभावशाली कनेक्शन इंजन। आम आदमी बेचारा कितना दयनीय प्राणी है! जिसके पास न तो विधायक या पार्षद चाचा-ताऊ का नंबर है, न अपने किसी परिचित उच्चाधिकारी का। ट्रैफिक पुलिस जब रुकवाती है तो चालक जेब से न तो ड्राइविंग लाइसेंस निकालता है,न आरसी या इंश्योरेंस। सबसे पहले वह मोबाइल निकालता है और तेजी से उंगलियां घुमाते हुए अपने परिचित का ताकतवर नाम ढंूढ़ कर कॉल मिलाता है। किसी पॉवरफुल आदमी से पहचान सचमुुच अदृश्य बीमा है। ये अदृश्य बीमे हर नियम को सिर के ऊपर से कुदवा देते हैं।देश सड़क पर नहीं बिगड़ता,देश उस मोबाइल कॉल से बिगड़ता है जिसमें कोई ड्राइवर गरजता है कि लो, बात करो मेरे विधायक चाचा से। जहां संबंधों से देश चलता हो,वहां कानून-कायदे मात्र एक बुकलेट बनकर रह जाते हैं और ट्रैफिक पुलिस एक कन्फ्यूज्ड किरदार या यूं कहें कि किसी हिंदी सीरियल का जूनियर आर्टिस्ट बनकर रह जाती है। जब तक गाçड़यों में दस्तावेज़ कम और परिचय-पत्र ज्यादा मिलेंगे,तब तक सड़कें असुरक्षित रहेंगी और कानून हाशिये पर। यह देश तब बदलेगा जब ‘कौन जानता है’ कि जगह ‘क्या सही है’ पूछा जायेगा। अन्यथा आगे चालान कट रहे हैं पता चलते ही राहें पलटती रहेंगी और सिफारिशें चालान काटने वालों को चुप करवाती रहेगी
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