Breaking News

लेख@ दम तोड़ती प्याऊ की परंपरा

Share

किसी समाज या समूह में लंबे समय से चली आ रही किसीपरंपरा का अंत हो जाना कई बार खुशियां देता है,पर कई बार यह भीतर से रुला देता है। परंपराओं का प्रारंभ और अंत विकासशील समाज के लिए आवश्यक भी है। परंपराएं टूटने के लिए ही होती हैं, पर कुछ परंपराएं ऐसी होती हैं, जिनका टूटना मन को दुखी कर जाता है। कुछ ऐसा ही अनुभव तब हुआ, जब बोतलबंद पानी की संस्कृति के बीच इन दिनों प्याऊ की परंपरा दम तोड़ती दिख रही है। पहले गांव, कस्बों और शहरों में कई प्याऊ देखने को मिल जाते थे। कई बार रेलवे स्टेशनों पर गर्मियों में पानी पिलाने का पुण्य कार्य किया जाता था। पानी पिलाने वालों की केवल यही प्रार्थना होती,जितना चाहे पानी पीएं,चाहे तो सुराही में भर लें, पर पानी बर्बाद न करें। उनकी यह प्रार्थना उस समय लोगों को भले ही प्रभावित न करती हों, पर आज जब उन्हीं रेलवे स्टेशनों में पानी की बोतलें खरीदनी पड़ती हैं, तब समझ में आता है कि सचमुच उनकी प्रार्थना का कोई अर्थ था। मुहावरों में पानी पिलाना यानी भले ही मजा चखाना होता हो, पर यह सनातन सच है कि पानी पिलाना एक पुण्य कार्य है। अच्छी भावना के साथ किसी प्यासे को पानी पिलाना तो और भी पुण्य का काम है।
विजय गर्ग
चांद मलोट
पंजाब


Share

Check Also

लेख@ सरगुजिहा बोली का प्रथम महाकाव्य

Share राम हनुमान गोठ,अर्थात सरगुजिहा छत्तीसगढ़ी रमायनश्री बंशीधर लाल जो सामान्यतः बी0डी0लाल के में संबोधित …

Leave a Reply