
ट्रेन की खिड़की से आती गर्म हवा दिल्ली की ओर बढ़ते सफर की थकान को थोड़ा कम कर रही थी। मैं अपनी सीट पर शांत बैठी थी—मन में अगले दिन के सरकारी काव्यपाठ और सम्मान समारोह की हल्की-सी तैयारी और उतनी ही सहजता। तभी एक महिला मेरे सामने वाली सीट पर आकर बैठीं।
उम्र रही होगी कोई सत्तर के आस-पास। कपड़े बेमेल, बाल अस्त-व्यस्त, पर चेहरे पर एक ऐसा आत्मविश्वास कि जैसे सारी दुनिया को दिशा देने का भार उन्हीं के कंधों पर हो। बैठते ही उनका बोलना शुरू—बिना किसी प्रस्तावना के।
मैंने ये किया,वो किया मेरे बेटे ने विदेश में नाम कमाया,मेरी बेटी तो सबकी पसंदीदा है। मैं ही हूं जिसने सबको बनाया, वरना किसी में कुछ नहीं था।
हर बात में खुद की बड़ाई, और दूसरों की कमी।
अब की लड़कियां कुछ जानती ही नहीं, मेरी बहू तो जैसे अनपढ़ है। मैंने ही उसे सब सिखाया। डॉक्टर? अरे उनसे अच्छा तो मैं इलाज कर लूं।
उनकी बातें एकतरफा थीं—मैं बस मुस्कुरा रही थी। बीच-बीच में वो मुझे भी नसीहत दे देतीं—
तुम अभी छोटी हो,दुनिया नहीं देखी। जब कुछ करोगी, कुछ बनोगी, तब पता चलेगा। ऐसे ही थोड़ी सब कुछ हो जाता है।
मैंने धीरे-धीरे समझ लिया था कि यह महिला अपनी दुनिया में स्वघोषित विजेता हैं, जिन्हें खुद को बेहतर साबित करने के लिए हर किसी को नीचा दिखाना जरूरी लगता है। उनकी बातों में घमंड था,बेतरतीबी थी, और एक गहरी बेचैनी भी।
मैं बस सुनती रही—शांत,तटस्थ। ऐसा नहीं था कि उनके पास अनुभव नहीं थे। अनुभव थे—लेकिन घमंड से सने हुए। वो हर बात को ऐसे कहतीं मानो खुद ही सबसे ऊपर हों और बाकी सब को तो बस सुधरने की ज़रूरत हो।जब दिल्ली स्टेशन आया, मैं धीरे से उठ खड़ी हुई। प्लेटफॉर्म पर चार-पांच पुलिस अधिकारी पहले से मेरी अगवानी के लिए खड़े थे। मुझे देखते ही उन्होंने झुककर मेरा अभिवादन किया और मेरे बार-बार मना करने के बावजूद, बहुत ही विनम्रता से मेरा लगेज अपने हाथों में लेकर पूर्ण सम्मानपूर्वक मुझे अपने साथ चलने का आग्रह करने लगे।
कार्यक्रम सरकारी था, तो इस प्रकार के प्रोटोकॉल स्वाभाविक थे। वो महिला, जो अब तक मुझे समझाने और सिखाने में लगी थीं, अवाक् खड़ी रह गईं।
अरे…आपसे मिलकर तो लगा ही नहीं कि आपका कोई प्रोटोकॉल भी होता होगा, उन्होंने आश्चर्य से कहा।
मैंने बस मुस्कुरा कर सिर झुकाया और मन ही मन सोचा—
स्वयंसिद्धा आप हैं मैं नहीं।
और मैं?मैं बस चुपचाप मुस्कुरा कर अपने गंतव्य की ओर बढ़ चली। वे एक अनुभव बनकर पीछे छूट गईं—एक स्मृति, एक सीख, और एक मुस्कुराहट के साथ।कभी-कभी जीवन में कुछ ऐसे लोग भी मिलते हैं जो हमें यह भली-भांति सिखा जाते हैं कि हमें क्या नहीं बनना चाहिए, और कैसा व्यवहार नहीं करना चाहिए।उनसे मिले बिना हम यह नहीं जान पाते कि नम्रता, विनम्रता और मौन का अपना अलग ही तेज होता है।
प्रियंका अग्निहोत्री गीत
काशी,उत्तर प्रदेश
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